Monday, August 21, 2017

किताबों की दुनिया - 139

गर्दने खिदमत में हाज़िर हैं हमारी लीजिये 
भोंतरे ही ठीक हैं, चाकू न पैने कीजिये 

दाना-पानी तक को ये पिंजरा नहीं खोला गया 
जब से मैंने कह दिया है -मेरे डैने दीजिये 

हम हुए सुकरात सारे दोस्तों के बीच में
'एक प्याला और' कोई कह रहा था लीजिये 

आपको चेहरे नहीं बिखरी मिलेंगी बोटियाँ 
आदमी को आदमी के सामने तो कीजिये 

जब कभी भी हिंदी ग़ज़ल की बात होती है तो सिर्फ एक नाम सबसे पहले हमारे ज़ेहन में आता है और वो है -दुष्यंत कुमार का जबकि उनकी तरह ही कानपुर का एक युवा शायर ऐसी ही धारदार तल्ख़ ग़ज़लें हिंदी में निरंतर कह रहा था। दुष्यंत उस उस वक्त हिंदी की लोकप्रिय पत्रिका 'सरिता' में छपने के साथ साथ अपनी चुटीली भाषा के कारण, जो उनसे पहले हिंदी ग़ज़लों में बहुत कम या न के बराबर नज़र आयी थी , चर्चित हो गए । आज हम किताबों की दुनिया में हिंदी ग़ज़ल के एक उसी तरह के बागी तेवरों वाले सशक्त हस्ताक्षर 'विजय किशोर मानव' की ग़ज़लों की किताब "आँखें खोलो " की बात करेंगे जिसे किताब घर प्रकाशन वालों ने सन 2005 में प्रकाशित किया था।


कुनबों के दरबार हमारी बस्ती में 
उनके ही अखबार हमारी बस्ती में 

आज राजधानी जाने की जल्दी में 
मिलता हर फनकार हमारी बस्ती में 

सुनें हवा की या आँखों की फ़िक्र करें 
तिनके हैं लाचार हमारी बस्ती में 

घास फूस के घर अलाव दरवाज़े पर 
आंधी के आसार हमारी बस्ती में 

रवायती और रोमांटिक शायरी जिसमें गुलशन फूल खुशबू तितली झील नदी पहाड़ समंदर दिल चाँद सितारे रात नींद ख़्वाब जैसे मखमली लफ़्ज़ों का भरपूर इस्तेमाल होता है से किनारा करते हुए विजय किशोर जी ने अपनी ग़ज़लों में ज़िन्दगी और समाज की तल्ख़ हकीकतों पर सीधे चोट करते हुए खुरदरे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया और लाजवाब शायरी की। उनकी शायरी हमारे समाज का आईना हैं।

बारूद, नक़ाबें , सलीब, माचिसें तमाम 
क्या क्या जमा किये हैं हमारे शहर में लोग 

पांवों पे पेट, पीठ पर निशान पाँव के 
कंधे पर घर लिए हैं हमारे शहर में लोग 

इंसान गुमशुदा है फरेबों के ठिकाने 
फिर होंठ क्यों सिये हैं हमारे शहर में लोग 

जनाब शेर जंग गर्ग ने किताब के फ्लैप पर लिखा है कि "आँखें खोलो की ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मानव ने ग़ज़ल की प्रचलित बहरों के साथ साथ नए अंदाज़ एवं नए रंग में भी कई ग़ज़लें कही हैं। इस लिहाज़ से उन्होंने ग़ज़ल को भी घिसे-पिटे ढांचे से एक हद तक बाहर निकाला है। उनकी ग़ज़लों में ऐसी अनेक पंक्तियाँ हैं जो उनके भाषाई बांकपन, गहन संवेदनशीलता एवं सहज कथन कौशल को उजागर करती है।"

बेड़ी न हथकड़ी है, दिखती नहीं सलाखें 
हर मोड़ पर जेलें हैं हम किस शहर में हैं 

सच कह के चूर होते आईने खौफ में हैं 
हर हाथ में ढेले हैं हम किस शहर में हैं 

ये कौन से जलवे हैं ये कैसा उजाला है 
सब आग से खेले हैं हम किस शहर में हैं 

9 अक्टूबर 1950 को कानपूर के रामकृष्ण नगर मुहल्ले में जन्में विजय जी ने भौतिकी रसायन शास्त्र और गणित विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और प्रिंट मिडिया से जुड़ गए और लगभग 25 वर्षों तक हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की प्रसिद्ध पत्रिका कादम्बिनी के एग्जीक्यूटिव एडिटर रहे। उनका लेखन इस दौरान सतत चलता रहा। अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर उन्होंने गीत ग़ज़ल कहानी तथा समीक्षा जैसी विधाओं पर दक्षता हासिल की जिसके फलस्वरूप उनकी हर विधा की रचनाओं का देश की लगभग सभी छोटी बड़ी पत्र -पत्रिकाओं में लगभग तीन दशकों से अब तक प्रकाशन होता आ रहा है।

युग का सच बारूदी गंधें 
खुशबू के फव्वारे झूठे 

सब के मुंह पर पूंछ लगी है 
इंकलाब के नारे झूठे 

अब सच्चे लगते बाज़ीगर 
गाँधी गौतम सारे झूठे 

नौकरी के झमेले से मुक्त हो कर विजय जी ने अपनी प्रतिभा का झंडा एस्ट्रोलॉजी के क्षेत्र में गाड़ दिया। मैंने किताबों की दुनिया की श्रृंखला के लिए कम से कम 200 -300 शायरों के बारे में तो पढ़ा ही होगा लेकिन मेरी नज़र में ऐसा कोई शायर नहीं गुज़रा जिसने शायरी के अलावा इंसान की बीमारी, नौकरी, शिक्षा , पारिवारिक समस्याओं ,व्यापार या रिश्तों के सुधार के लिए भविष्यवाणियां की हों और उनसे निबटने के रास्ते सुझाये हों। विजय जी ने हिंदी साहित्य के अध्ययन के अलावा वेदों पुराने और रहस्यमय विज्ञान का गहन अध्ययन किया और ज्योतिष विज्ञान में महारत हासिल कर ली।

बगुले चलें यहाँ हंसो की चाल सुना तुमने 
लोहे की तलवार काठ की ढाल सुना तुमने 

दांव-पेच के दाम बढे कौड़ी में दीन-धरम 
लोग कि जैसे धेले में हर माल सुना तुमने 

बेशुमार फुटपाथ घूम आये अपने चूल्हे 
कारिंदों के महल बनें हर साल सुना तुमने

"आँखे खोलो" ग़ज़ल संग्रह की भूमिका में विजय जी का हिंदी ग़ज़ल पर लिखा आलेख भी पढ़ने लायक है। उन्होंने बहुत सारगर्भित ढंग से हिंदी ग़ज़ल की यात्रा की विवेचना की है।अपनी ग़ज़लों के बारे में उनका कहना है कि " मेरी ग़ज़लें हिंदी की हैं। इस अर्थ में भी कि इनमें मैट्रिक छंद का अनुशासन है, पूरी रवानी है काफियों का निर्वाह हिंदी गीतों की तर्ज़ पर है और इन ग़ज़लों में विषय वस्तु के अनेक प्रयोग हैं।

बौने हुए विराट हमारे गाँव में 
बगुले हैं सम्राट हमारे गाँव में 

घर घर लगे धर्म कांटे लेकिन 
नकली सारे बाँट हमारे गाँव में 

मुखिया का कुरता है रेशम का 
भीड़ पहनती टाट हमारे गाँव में 

आपको ऐसी अनेक अलग मिज़ाज़ की ढेरों ग़ज़लें इस संग्रह में पढ़ने को मिलेंगी , इस किताब को पढ़ने के लिए आपको किताब घर प्रकाशन को उनके अंसारी रोड दरियागंज वाले पते पर लिखना पड़ेगा या फिर उन्हें उनके फोन न (+91) 11-23271844 पर पूछना पड़ेगा , आप किताब घर वालों को पर ईमेल करके भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ,सबसे बढ़िया तो ये है कि आप विजय जी को उनके मोबाईल न. 098107 43193 पर संपर्क इन लाजवाब ग़ज़लों के लिए पहले बधाई दें और फिर किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। चलते चलते उनकी एक और ग़ज़ल के चंद शेर आपको पढ़वाता चलता हूँ :

कब से ये शोर है शहर भर में 
हो रही भोर है शहर भर में 

सलाम, सजदे हाँ हुज़ूरी का 
आज भी जोर है शहर भर में 

एक मादा है कोई भी औरत 
मर्द हर ओर है शहर भर में

Monday, August 14, 2017

किताबों की दुनिया - 138

मेरा चेहरा वही ,वही हूँ मैं 
बात इतनी है वक्त दुश्मन है 

आ गयी फिर ख़ुशी मिरे दिल में 
ये मेरी शायरी की सौतन है 

चंद कतरे हैं मेरी आँखों में 
मेरा सावन भी कितना निर्धन है 

ये तो इत्तेफ़ाक़ ही है -आप इसे हसीन कहें तो आपकी मर्ज़ी लेकिन ये है इत्तेफ़ाक़ ही। आपको बताऊंगा तो आप भी कहेंगे क्या ग़ज़ब का इत्तेफ़ाक़ है। बताइये आज तारीख़ क्या है ? जी हाँ चौदह अगस्त सोमवार और चौदह अगस्त के दिन याने आज ,मैं जिस शायर की किताब की चर्चा मैं करने वाला हूँ वो भी चौदह अगस्त को पैदा हुए थे ,बात यहीं रुक जाती वहां तक भी ठीक था लेकिन रुकी नहीं आज याने चौदह अगस्त को ख़ाकसार का भी जनम दिन है। यूँ जन्मदिन का जीवन में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता ,जिसने जनम लेना है वो आज नहीं तो कल लेगा ही, जनम लेने और जनम देने वाले का इस क्रिया में कोई विशेष योगदान नहीं होता। ये सब प्रकृति के नियमानुसार होता है। पर इस पोस्ट की तिथि का पोस्ट के शायर की जन्म तिथि और ब्लॉग लेखक की जनम तिथि के साथ पड़ना महज एक संजोग है जो पहली बार इस 8 साल पुरानी श्रृंखला में हो रहा है।

इस तथ्यहीन बात को यहीं छोड़ आईये आज उनकी ग़ज़लों की किताब से कुछ और ग़ज़लों के शेर पढ़ते हैं :-

थोड़ी सस्ती है थोड़ी महंगी है 
ज़िन्दगी भी तो खीर टेढ़ी है 

जब लिपटता है चाँद से सूरज 
बर्फ जलती है आग बुझती है 

एक जुगनू बता गया मुझको 
तीरगी उससे खौफ खाती है 

तुझसे बिछुड़ा तो हो गया शायर 
तुझसे बेहतर तेरी जुदाई है 

जुदाई को वस्ल से बेहतर बताने वाले हमारे आज के अलबेले शायर हैं जनाब 'शाहजहाँ 'शाद' साहब जिनकी किताब 'हम' की बात आज हम करेंगे। 14 अगस्त 1961 को शाहजहाँ शाद साहब सूबा-ए-उत्तर प्रदेश में मर्दुम-खेज जिला गाज़ीपुर के महेंद्र गाँव में पैदा हुए ,इल्मो- अदब के शहर आज़मगढ़ में पल-बढ़ एवम लिख कर रोजी रोटी की तलाश में सूबा-ए-गुजरात के हीरों की मंडी वाले शहर सूरत में बस गए और हीरे की तरह तराशे चमकदार शेर कहने लगे।


वो सलीके से जान लेते हैं 
हम जिन्हें अपना मान लेते हैं 

एक डाली पे फिर नहीं रहते 
जब परिंदे उड़ान लेते हैं 

लोग झूठी अना की इक चादर 
ओढ़ लेते हैं तान लेते हैं

'शाद' इन्साफ यूँ भी होता है 
बेजुबां से बयान लेते हैं 

जनाब 'अहद प्रकाश' ने इस किताब की एक भूमिका में उनके लिए लिखा है कि " किसी किसी पर ग़ज़ल मेहरबान होती है और खुदा का शुक्र है कि शाहजहाँ 'शाद' पर भी ग़ज़ल मेहरबान है। 'शाद' मोहब्बत और इंसानियत के शायर हैं। उनके शेरों में आम आदमी का दिल धड़कता है, सच्चे और मीठे शेर कहने में उनका शुमार होता है। उनके शेरों में हमारी आप बीती मिलती है।

सपनों की जागीर हमारी 
इतने भी कंगाल नहीं हम 

ये मौसम ही रोने का है 
मत समझो, खुशहाल नहीं हम 

जो भी चाहे पकडे, झूले 
उन पेड़ो की डाल नहीं हम 

'शाद' अपने बारे में कहते हैं की ' शायरी भी अजीब शै या बीमारी है। कब, कहाँ और कैसे अपनी जुल्फों का असीर बना ले कुछ कहा नहीं जा सकता। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैं तकरीबन उम्र के 45 साल पूरे करने के बाद इस खूबसूरत बीमारी में मुब्तिला हुआ और अब तो ऐसा महसूस हो रहा है कि यह मर्ज़ आखिरी उम्र तक मेरे साथ ही रहेगा "

आप कहते हैं छोड़ दूँ पीना 
आप क्या मयकशी समझते हैं 

क्यों बुलाते हो प्यार से उनको 
वो जुबाँ दूसरी समझते हैं 

हम भटकते रहे हैं सहरा में 
'शाद' हम तिश्नगी समझते हैं 

 भले ही शाद साहब ने 45 साल की उम्र से शेर कहना शुरू किया हो लेकिन मुझे लगता है कि शायरी उनके जहन में होश सँभालते ही पनपने लग गयी होगी , अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो महज चार पांच साल के छोटे से वक़्फ़े में उनके चार शेरी मजमुए 'वो' सन 2013 में 'तुम' सन 2014 में 'हम' सन 2015 में और 'कागज़ी फूल' सन 2016 में मन्ज़रे आम पर नहीं आ पाते। चार सालों में चार मजमुए इस बात का सबूत हैं कि बरसों से रुकी हुई शायरी की नदिया एक दिन बाँध तोड़ कर जबरदस्त रफ़्तार से बह निकली। हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा उनके शेरी मजमुए 'तुम' को सन 2014 के गुजरात साहित्य अकादमी के प्रथम पुरूस्कार के लिए चुना गया है ये सम्मान उन्हें अगले हफ्ते याने 22 अगस्त को अहमदाबाद में प्रदान किया जायेगा।

तेरे निज़ाम को जब चाहेगा बदल देगा 
मियां ये वक्त है , बिगड़ा तो फिर कुचल देगा 

जहाँ भी जाओ मोहब्बत के बीज बो देना 
कहीं तो पेड़ उगेगा कहीं तो फल देगा 

कभी न कहना 'शाद' उससे राज की बातें 
यहाँ सुनेगा वहां जा के वो उगल देगा

'शाद' साहब की फितरत में ही शेर कहना है उनकी कहने की रफ़्तार हैरत में डाल देती है वो इंटरनेट फेसबुक व्हाट्सअप और ट्वीटर पर नियमित रूप से अपने नए नए मयारी शेर पोस्ट करते रहते हैं इसका नतीजा ये है कि अदब की दुनिया में उनका नाम बहुत इज़्ज़त से लिया जाता है । ज़िन्दगी का शायद ही कोई पहलू हो जिसपर 'शाद' साहब ने शेर न कहा हो।

इतनी कुर्बत हो इस मोहब्बत में 
तुम जुबाँ दो मगर निभाएं हम 

इतना रिश्ता रहे बिछड़ के भी 
तुम पुकारो तो लौट आएं हम 

वक्त आएगा 'शाद' वो कब तक 
बेसबब तुम को याद आये हम

'हम' को 'शेरी' अकादमी, भोपाल ने प्रकाशित किया है। आप इस किताब की प्राप्ति के लिए शेरी अकादमी को उनके पते '४-आम वाली मस्जिद रोड , जहांगीर बाद , भोपाल -462008 पर लिखें या 9425377323 पर संपर्क करें। इस किताब के लिए आप शाद साहब को उनके मोबाइल न 9879506884 पर बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। हमेशा की तरह अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वा कर आपसे विदा लेता हूँ :

मेरी खुशियों की एक चाबी है 
जो तेरे पास कबसे गिरवी है 

फिर कभी प्यार-प्यार खेलेंगे 
आज जाने दे पेट खाली है 

तेरी चौखट पे मर गए कितने 
ऐ मोहब्बत तू कितनी भूकी है

'शाद' हासिल नहीं अगरचे कुछ 
पास रहने से बस तसल्ली है

Monday, August 7, 2017

किताबों की दुनिया - 137

ब्याह तो मेरा हुआ, पर दे रहा था हर कोई 
मेरे दुश्मन को बधाई रात के बारह बजे 

तब हुआ एहसास मुझको हो गयी बेटी जवान 
कंकरी जब घर पे आयी रात के बारह बजे 

और 

कहा था मैंने गंगाजल का लाया बोतल 'रम' की 
अब ढक्कन क्यों लगा रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

अभी तो तेरे पूज्य पिताजी अस्पताल पहुंचे हैं 
अभी से सर क्यों मुंडा रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

बहुत जल्द अपने भारत से होगी दूर गरीबी 
किसको उल्लू बना रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

सामान्य स्तिथि में, मुझे यकीन है कि, ऊपर पोस्ट किये शेर पढ़ कर आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर आयी होगी। ये भी हो सकता है कि आपने सोचा हो कि आज "किताबों की दुनिया" में किसी मज़ाहिया ग़ज़लों की किताब का जिक्र होने वाला है। अफ़सोस ऐसा नहीं है , हमारे आज के शायर हिंदुस्तान के मशहूर हास्य कवि जरूर हैं लेकिन उनकी शायरी संजीदा और कुछ अलग से मिज़ाज़ की है। आज भले युवा पीढ़ी में उनका नाम अधिक जाना पहचाना न हो लेकिन कभी कवि सम्मेलनों में उनकी तूती बोलती थी। उनकी कुछ एक हास्य व्यंग से सरोबार ग़ज़लें अलबत्ता इस किताब में आपको पढ़ने को जरूर मिल सकती हैं ,जिसका जिक्र मैं करने वाला हूँ। शायर और उनकी किताब का नाम बताने से पहले आईये मैं आपको उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता हूँ : 

हमने मांगी थी ज़रा सी रोशनी घर के लिए 
आपने जलती हुई बस्ती के नज़राने दिए 

ज़िन्दगी खुशबू से अब तक इसलिए महरूम है 
हमने जिस्मों को चमन, रूहों को वीराने दिए 

हाथ में तेज़ाब के फ़ाहे थे मरहम की जगह 
दोस्तों ने कब हमारे ज़ख्म मुरझाने दिए 

गंभीर ग़ज़लें कहने वाले हमारे आज के शायर " माणिक वर्मा " को जब लगा कि अनेक उदगार ऐसे भी हैं जिन्हें उनके मन की बेचैनी और तल्ख़ तजुर्बतों को ग़ज़लों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता तब उन्होंने अपनी दिशा बदल ली और हास्य सृजन करने लगे। हास्य कविताओं के माध्यम उन्होंने अनेक गंभीर सामाजिक समस्याओं, राजनीति की बुराइयों और इंसांन की कमज़ोरियों को उजागर किया। "किताबों की दुनिया " श्रृंखला में चूँकि सिर्फ ग़ज़लों की बात होती है इसलिए हम उनकी किताब "ग़ज़ल मेरी इबादत है" में प्रकाशित ग़ज़लों की ही बात करेंगे.


सिर्फ दिखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं 
आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखो 

ज़िन्दगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं 
पत्थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो 

आपको महसूस होगी तब हरिक दिल की जलन 
जब किसी धागे-सा जलकर मोम के भीतर दिखो 

मुझे माणिक जी की ग़ज़ल के बारे में कही ये बात सौ प्रतिशत सही लगती है कि " ग़ज़ल कोशिशों का नाम नहीं है ! ग़ज़ल नाम है उस पके हुए फ़ल का जो पत्थरों की चोट से नहीं अपनी मर्ज़ी से अपने आप टपकता है " माणिक जी की ग़ज़लें पढ़ते वक्त उनकी इस बात का हमें ऐतबार होने लगता है। सहज सरल भाषा में किसी अल्हड़ नदी सा बहाव लिए उनकी ग़ज़लें सीधी दिल में उतर जाती हैं। उनकी ग़ज़लों में मुश्किल लफ़्ज़ों का जमावड़ा और घुमावदार दर्शन आपको ढूंढें नहीं मिलेगा।

धूप के पौधे लगा कर लोग अपने बाग़ में 
चाहते हैं गुलमुहर की छाँव रमजानी चचा 

ये भटकते पंछी मुझसे पूछते हैं क्या कहूं 
क्यों कटे बरगद के बूढ़े पाँव रमजानी चचा 

आप कहते हैं किसी के पास भी माचिस नहीं 
जल गया फिर कैसे अपना गाँव रमजानी चचा 

माणिक जी को लेखन विरासत में मिला उनके पिता स्व. प्यारे लाल वर्मा हिंदी के अतिरिक्त उर्दू फ़ारसी और अंग्रेजी के विद्वान ही नहीं बल्कि धार्मिक एवं राष्ट्रिय धारा के प्रखर कवि भी थे लेकिन दुर्भाग्य से माणिक जी जब मात्र छै वर्ष के ही थे तभी उनका देहावसान हो गया। खंडवा में जन्में माणिक जी ने शिक्षण के अतिरिक्त उर्दू की शिक्षा सेठ हारून रशीद साहब से और शायरी की मुकम्मल तालीम उस्ताद जेहन खान 'नूर' से हासिल की। बाद के दिनों में जनाब बशीर बद्र साहब ने भी उनकी रहनुमाई की।

प्रतीक्षा क्यों दधीची की करें हम 
हमारे तन में भी तो हड्डियां हैं 

जलाने हैं कई नफ़रत के रावण 
तुम्हारे पास कितनी तीलियाँ हैं 

हज़ारों इन्कलाब आये हैं लेकिन 
अभी तक झोपडी में सिसकियाँ हैं 

माणिक जी की ग़ज़लें हमें कभी कभी दुष्यंत कुमार और अदम गौंडवी साहब जैसी लगती जरूर हैं लेकिन अगर उन्हें समग्र पढ़ें तो पता लगता है कि उनके पास विषयों की अधिकता है और प्रस्तुति करण में मौलिकता है। उनकी ग़ज़लों में हिंदी अपने स्वाभाविक रूप में नज़र आती है और मुहावरों का प्रयोग भी वो अद्भुत ढंग से करते हैं. बशीर बद्र साहब फरमाते हैं कि " माणिक वर्मा जी की ग़ज़लें पुरानी यादों को ताज़ा करती हैं नए ज़माने की खूबसूरत शायराना तजुर्बों से रची बसी होती है और ऐसी ग़ज़ल बन जाती है जो ग़ज़ल हिंदी -उर्दू के सरमाये इज़ाफ़ा करती है

सूरज हुआ फकीर तुम्हारी ऐसी तैसी 
जुगनू को जागीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

झूठे आंसू बने तुम्हारे सच्चे मोती 
हम रोयें तो नीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

खाक मुहब्बत करें रोटियों के लाले हैं 
कहाँ के रांझा-हीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

जनता का है देश मगर तुमने समझा है 
अब्बा की जागीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

दरअसल 'ग़ज़ल मेरी इबादत है ' पारम्परिक ग़ज़लों की किताब से इस मायने में अलग है कि इसमें माणिक जी की ग़ज़लों के अलावा हज़लों और एक आध नज़्मों का भी समावेश है। अगर हम हज़लों की बात करें तो उसपर एक अलग से पोस्ट लिखनी होगी। ग़ज़लों में भी वो बहुत चुटीली भाषा का प्रयोग करते हैं। डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित इस पेपर बैक में छपी इस किताब को आप अमेजन से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं वैसे डायमंड बुक्स की किताबें आपको किसी भी अच्छे बुकस्टोर से आसानी से मिल जाएँगी। गूगल ने माणिक जी तक पहुँचने में मेरा सहयोग नहीं दिया वरना मैं उनका नंबर या पोस्टल अड्रेस आप तक जरूर पहुंचा देता ,हाँ अगर किसी पाठक के पास उनका नंबर हो तो मुझे बता दे मैं उसे पोस्ट में जोड़ दूंगा। आप माणिक जी की लगभग 94 ग़ज़लों और 28 के लगभग हज़लों से सजी इस किताब को पढ़ने की जुगत करें और मैं निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में , चलते चलते उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर आप सब के लिए प्रस्तुत हैं :-

हमें दुनिया का नक्शा मत दिखाओ 
हमारा घर कहाँ है , ये बता दो 

गुलामी का असर बच्चों पे होगा 
ये पिंजरे में रखा पंछी उड़ा दो 

गरीबी देन है परमात्मा की 
जो ये पोथी कहे उसको जला दो 

और अब ये पढ़िए सोचिये मुस्कुराइए और इन शेरो को रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मुहावरों की तरह इस्तेमाल करिये।

वो तो चस्का लग गया था जाम का 
वरना मैं भी आदमी था काम का 

हैसियत सड़ियल से बैंगन की नहीं 
पूछता है भाव लंगड़े आम का 

मत करे तू इश्क मुझको देख ले 
एक क्विन्टल से हुआ दस ग्राम का 

हुक्म है सरकार का जल्दी भरो 
आज उद्घाटन है मुक्तिधाम का