Monday, June 19, 2017

किताबों की दुनिया -130

आज आत्म प्रशंशा, आत्म मुग्धता और आत्म स्तुति के इस संक्रमक दौर में जहाँ हर बौना अपने आपको अमिताभ से ऊंचा और हर तुक्के बाज़ अपने को ग़ालिबो मीर से बेहतर मानता हो अगर कोई ताल ठोक कर सोशल मीडिया के सार्वजनिक मंच पर ये कहे कि "मैं बेतुका ,बेहूदा, बदतमीज़, वाहियात ,अनपढ़ ,गँवार,ज़ाहिल और मुँहफट हूँ " तो आप हैरान नहीं हो जायेंगे ?
हमारे आज के शायर अपने बारे में ऐसा बयान सनसनी फैलाने के कारण नहीं दे रहे बल्कि ऐसा कहना उनकी निराली शख्शियत का हिस्सा है।

फिर तुझे सोच लिया हो जैसे 
तार बिजली का छुआ हो जैसे 

धड़कनें तेज़ हुई जाती हैं 
कोई ज़ीने पे चढ़ा हो जैसे 

लाख अपने को समेटा हमने 
फिर भी कुछ छूट गया हो जैसे 

याद बस याद फ़क्त याद ही याद 
और सब भूल गया हो जैसे 

हमारे आज के शायर हैं जनाब "शमीम अब्बास" साहब जिनकी किताब "बाँट लें,आ कायनात" का जिक्र हम करेंगे। हिंदी पाठकों के लिए शमीम साहब का नाम शायद बहुत अधिक जाना पहचाना न हो लेकिन उर्दू शायरी से मोहब्बत करने वाले हर शख्श ने उन्हें पढ़ कर बिजली के तार को छू लेने जैसे अनुभव जरूर हासिल किये होंगे क्योंकि इनके शेर कभी कभी जोर का झटका धीरे से देते हैं । किताब के फ्लैप पर ब्रेकेट में लिखा है "उर्दू ग़ज़लें" जबकि इस किताब की ग़ज़लें न उर्दू और न हिंदी में बल्कि उस ज़बान में हैं जिसे हम रोजमर्रा की ज़िन्दगी में इस्तेमाल करते हैं।


प्यारे तेरा मेरा रिश्ता 
इक उड़ती तितली और बच्चा 

उस ने हामी भर ली आखिर 
बिल्ली के भागों छींका टूटा 

तेरी कहानी कहते कहते 
अच्छे अच्छे का दम फूला 

दुनिया भर के शग्ल पड़े हैं 
पर जिसको हो तेरा चस्का 

सन 1948 में फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश में जन्में शमीम साहब जब कुल 2 साल के थे तो परिवार के साथ मुंबई आ बसे और तब से अब तक मुंबई में भिंडी बाजार की जामा मस्जिद के पास बड़े ही सुकून से रह रहे हैं। हाईस्कूल के बाद मुंबई के ही महाराष्ट्र कॉलेज से उन्होंने तालीम हासिल की और वहीँ छुटपुट काम करते हुए शायरी करने लगे। पूछने पर वो हँसते हुए कहते हुए कहते हैं कि वो खालिस मुम्बइया टपोरी हैं। निहायत दिलचस्प शख्सियत के मालिक शमीम साहब न केवल अपने आचार व्यवहार में बल्कि शायरी करने में भी बेहद बिंदास हैं.

ये नहीं ये भी नहीं और वो नहीं वो भी नहीं 
दूसरा तुझसा कोई मिल जाए मुमकिन ही नहीं 

तू पसारे पाँव बैठा है मेरे लफ़्ज़ों में यूँ 
अब कोई आए कहाँ कोई जगह खाली नहीं 

इम्तेहां मेरा न ले इतना कि रिश्ता टूट जाए 
तू बहुत कुछ है ये माना कम मगर मैं भी नहीं 

क्या है तू और क्या नहीं जैसा है क्या वैसा है तू
बात हर पहलू से की तुझ पर मगर चिपकी नहीं 

इस तरह का लहज़ा, रंग और तेवर इस से पहले उर्दू शायरी में पढ़ा सुना नहीं गया। शमीम साहब ने अपनी खुद की ज़मीन तलाश की, वो ज़बान इस्तेमाल की जो सुनने पढ़ने वाले को अपनी लगी। उर्दू शायरी की सदियों पुरानी रिवायत को तोड़ना कोई आसान काम नहीं था लेकिन शमीम साहब ने ये काम बहुत दिलकश अंदाज़ में किया और छा गए। अपने चाहने वालों में 'दादा' के नाम से मशहूर और नौजवान शायरों के चहेते शमीम साहब की शिरकत के बिना मुंबई की कोई नशिस्त मुकम्मल नहीं मानी जाती

छाई रहती है घनी छाँव मुसलसल कहिये 
बेसमर पेड़ है इक याद का पीपल कहिये 

सर्दियाँ हों तो रज़ाई की जगह होता है 
गर्मियां हो तो उसी शख्स को मलमल कहिये 

छुइए उस को तो मरमर सा बदन होता है 
जब बरतीये तो यही लगता है दलदल कहिये 

शमीम साहब ने "रेख्ता" की साइट पर फ़रहत एहसास साहब को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि बचपन में बड़े और प्रसिद्द शायरों की शायरी पढ़ते या सुनते हुए उन्हें लगता था कि उर्दू शायरी की भाषा बहुत औपचारिक है, वो सोचते थे कि क्यों हम आम बोलचाल की भाषा में बेतकल्लुफी से जैसे हम अपने यार दोस्तों से या घर में भाई अम्मी से या बाजार में दुकानदार से या दुकानदार हम से बात करते हैं , शायरी नहीं कर सकते ?

इतने बखेड़े पाल लिए कब फुरसत मिलती है 
आज की तय दोनों में थी अब कल पर रख्खी है 

वो अपने झंझट में फंसा मैं अपने झमेले में 
वक्त न उसके पास है और न मुझको छुट्टी है 

अच्छे खासे लोगों से यह बस्ती है आबाद 
तेरे सिवा जाने क्यूँ अपनी सब से कट्टी है 

लगा तो तीर नहीं तो तुक्का सीधी सी है बात 
कोशिश वोशिश काहे की अंधे की लाठी है 

ये सोच उस वक्त बहुत क्रांतिकारी थी क्यूंकि इस तरह पहले किसी ने या तो सोचा नहीं था या फिर उसे अमल में लाने का जोखिम नहीं उठाया था हालाँकि कुछ हद तक अल्वी साहब ने ये कोशिश की जरूर लेकिन वो शमीम साहब की तरह बिंदास नहीं हो पाए .शमीम साहब ने ये ज़ोखिम उठाया और खूब उठाया जिसकी वजह से शुरू में उन्हें नकारा गया लेकिन धीरे धीरे दाद के साथ हौसला अफ़ज़ाही भी मिलने लगी और फिर तो वो खुल कर अपना जलवा दिखने लगे।

यूँ ही ये ज़िन्दगी चलती रही है
तवायफ़ भी कहीं बेवा हुई है 

किसी जानिब किसी जानिब बढूं मैं 
तुम्हारी याद रस्ता काटती है 

लगाए घात बैठी है तमन्ना 
जहाँ मौका मिले मुंह मारती है 

शमीम साहब के बड़े भाई शफ़ीक़ अब्बास साहब भी बहुत बड़े शायर हैं लेकिन उनकी शायरी की जो ज़बान है वो शमीम साहब से बिलकुल अलहदा है।"शमीम" साहब फरमाते है की जो ज़बान वो इस्तेमाल करते हैं वो उनकी माँ की ज़बान है जिसे वो अपने साथ रदौली उत्तरप्रदेश से ले आयीं और जो बरसों बरस मुंबई में रहने के बावजूद भी उनके होंठो पे रही। शमीम साहब कहते हैं कि उनकी शायरी में जो फ़िक्र आती है, ख्याल आते हैं वो उनकी ही ज़बान में जिसे वो रोजमर्रा की गुफ्तगू में इस्तेमाल करते हैं, आते हैं , उन्हें लफ्ज़ तलाशने नहीं पड़ते वो इसी ज़बान में सोचते हैं और कहते हैं।

मुद्दतों बाद रात दर्द उठा 
ज़िन्दगी तेरा कुछ पता तो चला 

तुम मदावे की शक्ल आ धमके 
मैं कुढ़न का मज़ा भी ले न सका 
मदावे : इलाज़ , कुढ़न : कष्ट , तकलीफ 

यह तो तय है कि रात था कोई 
तू नहीं था तो कौन था बतला 

आज किस मुंह से तुम को झुठलाएं 
हम को पहचानते नहीं ! अच्छा 

उर्दू में शमीम साहब की शायरी के शायद दो मज़मुए आ चुके हैं ,"बाँट लें, आ क़ायनात " शायद मेरी समझ में उनका हिंदी में पहला मज़्मुआ है जिसे "हलक फाउंडेशन ,12, इंद्रप्रस्थ, फ्लाईओवर ब्रिज अँधेरी (पूर्व) मुंबई ने शाया किया है. मुझे तो ये किताब जयपुर के बेजोड़ नामवर शायर और गीतकार जनाब लोकेश सिंह 'साहिल' साहब की मेहरबानी से पढ़ने को मिली है लेकिन आप इस किताब की प्राप्ति के लिए शमीम साहब को उनके घर 022-28113418 पर या उनके मोबाईल न 9029492884 पर संपर्क करके पूछ सकते हैं।दिल्ली में तुफैल साहब के यहाँ "लफ्ज़" के सन 2015 में हुए मुशायरे में उनसे एक बार बात हुई थी।बेहद हंसमुख दोस्ताना तबियत के मालिक शमीम साहब यकीनन किताब के बारे में आपकी जरूर मदद करेंगे।

लफ़्ज़ों चंगुल में फंस कर रह जाता है ख्याल 
बात उलझ कर रह जाती है हाय रे मज़बूरी 

तेरे कर्ब ने आनन् फानन मौसम बदला है 
हर सू पेड़ घनेरे हैं और सूरज में खुनकी 
कर्ब =निकटता , खुनकी =शीतलता 

जाने क्या है जब जब उस से नज़रें पलटी हैं 
सारे शहर की कोई गुल कर देता है बिजली 

पेपर बैक में छपी इस छोटी सी किताब में शमीम साहब की लगभग 84 ग़ज़लें और फुटकर शेर हैं। हिंदी में उनकी इन ग़ज़लों और शेरों का जिसने भी तर्जुमा किया है उसने या फिर प्रकाशक ने हिज्जों की बहुत सी गलतियां की हैं जो शमीम साहब की लाजवाब शायरी को पढ़ते वक्त अखरती हैं।हर कमी के बावजूद ये किताब हाथ में लेने के बाद किसी भी शायरी प्रेमी के लिए पूरी ख़तम किये बिना छोड़नी मुश्किल है। उनके बहुत से शेर पढ़ने वाले के दिलो दिमाग में हमेशा से बस जाने वाले हैं. आप इस किताब को मंगवाने का जतन करें तब तक मैं उनकी एक बहुत मकबूल ग़ज़ल के ये शेर पढ़वा कर अगली किताब की तलाश में निकलता हूँ.

मिल न मिल मर्ज़ी तेरी
चित तेरी पट भी तेरी 

बाँट ले आ कायनात 
तू मेरा बाकी तेरी 

उसके बिन ऐ ज़िन्दगी 
ऐसी की तैसी तेरी 

इक मेरी भी मान ले 
मैंने सब रक्खी तेरी 

मैं सभी पर खुल चुका 
बंद है मुठ्ठी तेरी