Monday, September 18, 2017

किताबों की दुनिया -143

कल मेरे लफ़्ज़ों में मेरी जान रहेगी 
दुनिया जब देखेगी तो हैरान रहेगी 

जब दिल से तस्वीर तेरी हट जाएगी 
जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी

रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा 
मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी 

हिज्र को शब् से ऐसी तो उम्मीद न थी 
पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी 
हिज्र =विरह , शब् =रात 

अब क्या लिखूं ? कैसे लिखूं ? कहाँ से लिखूं ? हमारे आज के शायर उर्दू साहित्य की वो कद्दावर शख्सियत रहे हैं जिनके के बारे में लिखने की सोचना ही बहुत बड़ी बात है। हिंदी पाठक भले ही उनके नाम से ज्यादा वाकिफ़ न हों लेकिन जिस किसी को भी उर्दू अदब में जरा सी दिलचस्पी है वो जनाब "मुग़न्नी तबस्सुम " के नाम से अनजान नहीं होगा। हम आज उनकी ग़ज़लों की किताब "मिटटी मिटटी मेरा दिल " पर बात करेंगे जिसका एक एक शेर रुक रुक कर पढ़ने, पढ़वाने और दिल में बसाने लायक है। इस किताब को वाणी प्रकाशन ने सन 2002 में शाया किया था।


मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया में खोया रहा 
कब रात ढली कब चाँद बुझा मालूम नहीं 

जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी 
क्यों मेरे दिल में दर्द उठा मालूम नहीं 

ये जान गए हंसने की सज़ा अब मिलती है 
इस रोने का अंजाम है क्या मालूम नहीं 

सच कहूं तो "जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी " जैसा सुरीला सरल मिसरा उर्दू शायरी में बड़ी मुश्किल से ढूंढें मिलता है और ऐसे मिसरे इस किताब के वर्क वर्क में बिखरे हुए हैं। आप सर धुनते रहिये और बस पढ़ते रहिये। शायरी की ज़बान ऐसी मीठी जैसे शहद और क्यों न हो आखिर मुग़न्नी तबस्सुम उस्मानिया विश्वविद्यालय , हैदराबाद के ऐसे होनहार तालिबे-इल्म थे जो बाद में उसी यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे।

बेमानी सा लगता है घर जाना भी 
दीवारों से टकराना मर जाना भी 

रस्ता तकते रहना सारी रात कभी 
आहट सुनकर क़दमों की डर जाना भी 

बादल अब जो खेल तमाशे करता है 
उसने मेरी नाव डुबो कर जाना भी

मोहम्मद अब्दुल गनी जो "मुग़न्नी तबस्सुम" के नाम से जाने जाते हैं का जन्म 19 जून 1930 को हैदराबाद में हुआ। मात्र 14 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने शायरी शुरू कर दी. मशहूर शायर अल्लामा इक़बाल साहब की शायरी से वो बहुत प्रभावित हुए। उर्दू की प्रगतिशील विचारधारा को अपनाते हुए उन्होंने ने लेखन कार्य किया और थोड़े समय तक आधुनिक विचारधारा के समर्थक भी रहे लेकिन बाद में फिर प्रगतिशील विचारधारा की और मुड़ गए.

आसमाँ पर है अजब चाँद सितारों का समां 
दिल में देखो तो यहाँ रात का मंज़र है अलग 

पास तेरे हूँ कि क़तरा है निहाँ दरिया में 
दूर तुझसे हूँ कि सहरा से समंदर है अलग 

फुर्सते उम्र है कम, हर्फ़े तमन्ना सुन लो 
बात शिकवों की न पूछो कि वो दफ्तर है अलग
फुर्सते उम्र =ज़िन्दगी की फुर्सत , हर्फ़े तमन्ना =इच्छा की बात 

ज़िन्दगी के तजुर्बों को सीधे सरल अंदाज़ में शायरी में ढालने का हुनर जैसा तबस्सुम साहब के यहाँ मिलता है वैसा और कहीं मिलना मुश्किल है। उनके बारे में प्रोफ़ेसर शमीम ईफानफ़ी फरमाते हैं की "मुग़न्नी साहब निहायत धीमे अंदाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए अपनी बात कहते हैं जो खरामा खरामा हमारे ज़ेहन में घर करती है और इसलिए न तो बोझ बनती है और न ही चौंकाती है , उनके अशआरों से अपनत्व का अहसाह उभरता है और हमें अपने आगोश में ले लेता है।"

तपते सहरा में ये खुशबू साथ कहाँ से आई
जिक्र ज़माने का था तेरी बात कहाँ से आई 

दिल मिटटी था आँखों में सौगात कहाँ से आई 
सावन बीत चला था ये बरसात कहाँ से आई 

बीते लम्हें टूटे भी तो याद बने या ख़्वाब 
परछाईं थी परछाईं फिर हाथ कहाँ से आई 

प्रोफ़ेसर तबस्सुम द्वारा "फ़ानी बदायूनी " पर किया गया शोध कार्य उर्दू में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की हैसियत से जाना जाता है। एक आलोचक के रूप में जैसी प्रतिष्ठा मुगन्नि साहब ने पायी उसकी मिसाल ढूंढनी मुश्किल है। उर्दू साहित्य को नयी दिशा और उसके मयार में लगातार इज़ाफ़ा करने के उद्देश्य के लिए वो मुईनुद्दीन क़ादरी ज़ोर साहब द्वारा 1930 में हैदराबाद में स्थापित "इदारा-ऐ-अदबियत-ऐ-उर्दू" के साथ आखरी सांस तक जुड़े रहे। उर्दू भाषा में उनके द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका "सबरस" बहुत लोकप्रिय हुई ,उन्होंने नए लेखकों को प्रोत्साहन देने की गरज़ से छमाही पत्रिका "शेर-औ-हिक़मत" का संपादन भी सफलता पूर्वक किया।

तरस गया हूँ मैं सूरज की रौशनी के लिए 
वो दी है सायए दीवार ने सज़ा मुझको 

जो देखिये तो इसी से है ज़िन्दगी मेरी
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझको 

उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया 
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझको 

एक बहुत लम्बी फेहरिस्त है उनकी विभिन्न विषयों जैसे शायरी , आलोचना , शोध ,जीवनी ,संकलन और संपादन पर प्रकाशित लगभग 23 किताबों की, जिनका नाम यहाँ देना संभव नहीं अलबत्ता शायरी पर उनकी ये किताबें बहुत मकबूल हैं जो उर्दू में हैं "'" : "नवा-ऐ-तल्ख़ (1946)", "पहली किरण का बोझ (1980)"' "मिटटी मिटटी मेरा दिल (1991) और " दर्द के खेमे के आसपास(2002)" .इसके अलावा देश विदेश के रिसालों में उनके लेखों की संख्या तो सैंकड़ों में है। लन्दन और अमेरिका की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटीज के तालिब-ऐ-इल्मों को वो उर्दू अदब के ढेरों विषयों पर हुए सेमिनारों में भाषण देने जाते थे।

तारे डूबें तो अच्छा है, चाँद बुझे तो बेहतर है 
कोई नहीं आएगा यहाँ, अब आँख लगे तो बेहतर है 

आइना वीरान खड़ा है ,अनजाना सा लगता है 
हमने चुप साधी है वो भी कुछ न कहे तो बेहतर है 

ख़्वाब में तुझसे मिलते हैं और बात दुआ में करते हैं 
तू भी हमको देखे और कुछ बोल सके तो बेहतर है 

उर्दू के इस खिदमतगार को उत्तर प्रदेश , बिहार , पश्चिमी बंगाल ,आंध्र प्रदेश , दिल्ली आदि अनेकों उर्दू अकादमियों के अलावा महाराष्ट साहित्य अकादमी ने भी पुरुस्कृत किया है। जनाब "स्वाधीन" जिन्होंने इस किताब को हिंदी में लिप्यांतर किया है लिखते हैं कि " इस शायर ने देश काल और इतिहास को अलग-थलग नहीं करते हुए अपने उस आदमी के साथ एकमेल कर दिया है जो रोज उसके भीतर जागा रहता है "

चढ़े हुए थे जो दरिया उतर गए अब तो 
मुहब्बतों के ज़माने गुज़र गए अब तो

न आहटें हैं, न दस्तक, न चाप क़दमों की 
नवाहे- जाँ से सदा के हुनर गए अब तो 
 नवाहे जाँ=प्राणो का विस्तार

सबा के साथ गयी बूए पैरहन उसकी 
ज़मीं की गोद में गेसू बिखर गए अब तो 
सबा=हवा , बुए पैरहन =गंध के वस्त्र गेसू =बाल 

उर्दू अदब का ये रौशन सितारा अपनी ज़िन्दगी के सत्तर से अधिक बरस तक अदब की खिदमत करते हुए आखिर 15 फरवरी 2012 की शाम को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुख़सत हो गया और पीछे छोड़ गया उनकी बसाई अदब की एक ऐसी पुरअसर दुनिया जो सदियों तक ज़िंदा रहेगी। डॉक्टर तबस्सुम जैसे शख्सियत कभी कहीं जाती नहीं हमेशा हमारे आसपास अपनी किताबों और रिसालों में मौजूद रहती है।
"मिटटी मिटटी मेरा दिल" में उनकी सिर्फ 60 ग़ज़लें संकलित हैं जिनमें कुल जमा 250-300 शेर होंगे लेकिन एक भी ऐसा शेर नहीं है जिसे यहाँ आपको पढ़वाने की मेरी इच्छा न हो, अफ़सोस ऐसा करना संभव नहीं। मेरी गुज़ारिश है कि आप इस किताब को वाणी प्रकाशन दिल्ली से मंगवा कर पढ़ें और देखें कि उर्दू शायरी का जादू किस तरह सर चढ़ कर बोलता है।
उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता हूँ और फिर आपसे अगली किताब की तलाश करने को रुखसत होता हूँ :

एक अहदे विसाल चार सू है 
और दर्दे फ़िराक़ कू-ब-कू है
अहदे विसाल =मिलान का वादा , चार सू =चरों तरफ़, दर्दे फ़िराक़=जुदाई का दर्द , कू-ब -कू =गली गली 

जो सो न सके वो आँख हूँ मैं 
जो टूट गयी वो नींद तू है  

मैं सोच रहा हूँ, तू नहीं है
मैं देख रहा हूँ और तू है 

दुनिया के सारे सवाल मुझ पर
चुप हूँ कि मेरा जवाब तू है