Monday, November 20, 2017

किताबों की दुनिया -152

अक्सर देखा गया है कि शायर सामाजिक जिम्मेवारियों को दरकिनार कर इश्क-मुश्क की रंगीन मिज़ाजी शायरी करते हुए मदमस्तियों और मौजों में अपनी ज़िन्दगी तमाम कर देते हैं और खो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इश्क-मुश्क या रंगीन मिज़ाजियाँ ज़िन्दगी की जरूरतें नहीं, हैं, लेकिन इनके इतर भी बहुत कुछ है जिस पर भी साथ साथ लिखा जाना चाहिए , जो लिखते हैं वो ही मुकम्मल शायर कहलाते हैं और बरसों बरस अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहते हैं। किसी भी शायर या रचनाकार को अपनी सामाजिक जिम्मेवारिओं को दर-किनार नहीं करना चाहिए बल्कि पूरी तरह निभाना चाहिए।

तबाही और होती है - तमाशा और होता है 
नगर कब से जलाया जा रहा है फिर खड़े क्यों हो 

मुसीबत कब तलक झेलोगे तुम दुःख झेलने वालों 
बग़ावत का तो वक़्त अब आ गया है फिर खड़े क्यों हो 

जो तूफ़ां से बचा कर तुम को लाया अपनी कश्ती में 
तुम्हारे सामने वो डूबता है फिर खड़े क्यों हो 

हमारे आज के शायर हसीं ख्वाबों को देखने वाले रचनाकार नहीं बल्कि एक खूबसूरत मानवीय ज़िन्दगी की रचना का ताना-बाना बुनने वाले संवेदनशील शायर हैं जो अपनी बात निहायत सादगी और सीधेपन से करते हैं। आज की पीढ़ी के लिए उनका नाम शायद अब जाना पहचाना न हो लेकिन एक समय था जब उनको हरियाणा,पंजाब और दिल्ली के मुशायरों, गोष्ठियों और नशिस्तों में बहुत आदर के साथ बुलाया जाता था।

इक तस्वीर के हट जाने से कैसा रूप बदल जाता है 
कितना बे-रौनक लगता है इतनी रौनक वाला कमरा 

जाने किस दिन आकर कोई एक महक सी छोड़ गया था
हर मौसम में रहता है अब कितना महका-महका कमरा 

रख जाता है तस्वीरों को जाने किस अंदाज़ से कोई 
कैसे रंगों से भर जाता है, खाली-खाली सा कमरा 

हरियाणा के रोहतक जिले के लाखनमाजरा गांव में अप्रैल 1933 को जन्में हमारे आज के तरक्की पसंद शायर हैं जनाब "बलबीर सिंह राठी" जिनकी रचनाओं को किताब की शक्ल में चयनित किया है डा. ओमप्रकाश करुणेश जी ने "बलबीर राठी की चुनिंदा ग़ज़लेँ व नज़्में " शीर्षक से। ये किताब 'आधार प्रकाशन -पंचकूला (हरियाणा) से सं 2010 में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में राठी जी की 110 ग़ज़लें, 10 कतआत और 31 नज़्में शामिल है। इस किताब के माध्यम से हम बलबीर जी के रचना संसार को अच्छी तरह से समझ सकते हैं :


झूट से मरऊब होकर हम बहक जाते हैं वरना 
सच अभी कायम है यारों लोग सच्चे भी बहुत हैं 
मरऊब =रौब में आना 

क्यों बुरा होने की तोहमत धर रहे हो हर किसी पर 
हमने देखा है यहाँ तो लोग अच्छे भी बहुत हैं 

यूँ अगर देखें तो दुनिया खूबसूरत भी बहुत है 
बदनुमा इस को मगर हम लोग करते भी बहुत हैं 

राठी साहब बातचीत के लहज़े में पूरी सादगी से अपने पाठकों से संवाद करते हैं। वे जटिल संकेतों , उलझे हुए बिम्बों-दृश्यों, रूपकों,प्रतीकों से अपनी बात कहने में परहेज बरतते हैं. गहरी-से-गहरी बातें सादे और साफ़ ढंग से करना उनकी रचनाओं की फितरत है। उनकी ग़ज़लें जिस सरलता से अपना मुकाम हासिल करती है वो कबीले तारीफ़ है। वो दिल की जुबान में बोलते हैं आँखों की खिड़कियों को खुला रखते हैं और हर तरफ चौकस निगाहें डालते हैं। उनकी जद्द से कोई भी नहीं बचता ,यहाँ तक कि वे खुद को भी लपेट लेते हैं।

जुगनुओं ने आज माँगा है उजालों का हिसाब 
ये बताओ , उनको सूरज का पता किस ने दिया 

रंजो-ग़म तो ख़ूब हमको उस ख़ुदा ने दे दिए 
इतना पत्थर दिल मगर हम को खुदा किसने दिया 

कारवां को रोक लेता है वो हर इक मोड़ पर 
हम को घबराया हुआ ये रहनुमा किसने दिया 

बलबीर जी सं 1950 से साहित्य सृजन में जुट गए , मूल रूप से उर्दू में लेखन 'प्रताप' और 'मिलाप' जैसी उच्च स्तरीय पत्रिकाओं से प्रारम्भ किया। ग़ज़ल लेखन से ख्याति अर्जित की। उनके अजीज दोस्त,डा हरिवंश अनेजा उर्फ़ 'जमाल कायमी ' जो सं 2008 से "दरवेश भारती" के नाम से लिखते हैं और 'ग़ज़ल के बहाने " पत्रिका निकालते हैं,ने उनपर हुई बातचीत में बताया कि "राठी बहुत संकोची और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं , मैंने ही उनकी रचनाओं को सब से पहले रोहतक शहर की साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजा। मैं उन्हें अपनी साईकिल पर बिठा कर शहर में जहाँ कहीं कोई नशिस्त होती वहां ले जाता। उस वक्त राठी जी जाट कालेज रोहतक में पढ़ाते थे।उनकी झिझक मिटाने के लिए मैंने पत्रकारों को एक कवि सम्मलेन के लिए मनाया और राठी साहब को शायरे-ख़सूसी की हैसियत से बुलाया। रोहतक में उनकी प्रसिद्धि के लिए मैंने अपने और उनके चुनिंदा कलाम को 'ज़ज़्बात' नाम से एक किताब की शक्ल में छपवाया। इस किताब के मंज़र-ऐ-आम पर आने के बाद राठी जी का नाम बतौर शायर लिया जाने लगा।"
आज के इस दौर में जहाँ लोग एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं और पूरा प्रयास करते हैं कि कोई दूसरा शायर उनसे आगे न जा पाए 'दरवेश भारती जी द्वारा अपने साथी शायर को प्रसिद्धि दिलाने को किये गए ये प्रयास किसी अजूबे से कम नहीं। ऐसे सच्चे और खरे लोग अब ढूंढें नहीं मिलते।

यही खुशफ़हमियाँ मुझ को यहाँ तक खींच लाईं
तुम्हारे शहर में अब तक वही मन्ज़र मिलेँगे

न मंज़िल की खबर जिनको न राहों का पता है 
जिधर भी जाओगे तुमको वही रहबर मिलेंगे 

चले आना किसी दिन उसको अपना घर समझ कर 
तुम्हारे सब पुराने ख्वाब मेरे घर मिलेंगे 

दिल्ली के ज़दीद शायरी के लिए मशहूर शायर जनाब 'राजेंद्र मनचंदा " बानी" ने इस किताब में राठी जी के लिए लिखा है कि "राठी के पूरे कलाम से सच्ची शायरी की खुशबू आती है। मैं उनके शे 'अरों की तशतर आमेज़ सादगी से घायल हुआ हूँ। सच कह रहा हूँ कि ऐसा लहजा काश मुझे नसीब होता " .'बानी' साहब जिनके प्रशंकों में डा. गोपी चंद नारंग साहब का नाम भी शामिल है , दिल्ली में एक मासिक पत्रिका 'तलाश" निकालते थे जिसमें  ग़ज़ल का छपना किसी भी शायर के लिए फ़क्र की बात हुआ करती थी. दरवेश भारती जी के प्रयास से 'बानी" साहब ने अपनी पत्रिका में राठी जी ग़ज़लों को विशेष जगह दी। धीरे धीरे डा. दरवेश भारती , मनचंदा बानी , मख्मूर सईदी, अमीक हनफ़ी और सलाम मछली शहरी जैसे शायरों के साथ राठी जी को गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा। दरवेश भारती जी के कारण ही उनके रिश्ते नरेश कुमार 'शाद' साहब के साथ मजबूत हुए। अपनी जनवादी सोच के कारण राठी साहब ने अपनी अलग पहचान बनाई।

छेड़ न किस्से अब वुसअत के दीवारों की बातें कर 
बस्ती में सब सौदागर हैं, बाज़ारों की बातें कर 
वुसअत=फैलाव 

दिल वालों के किस्से आखिर तेरे किस काम आएंगे
ख़ुदग़रज़ों की , अय्यारों की, मक्कारों की बातें कर 

लोग जो पत्थर फेंक रहे हैं इस पे खफ़ा क्यों होता है 
किस ने कहा था वीरानों में गुलज़ारों की बातें कर 

राठी साहब किस्मत वाले हैं तभी उन्हें डा.दरवेश भारती जैसे दोस्त , महावीर सिंह 'दुखी', डा.सुभाष चंद्र -रीडर, हिंदी विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और डा.ओमप्रकाश करुणेश जैसे प्रशंसक मिले जिन्होंने न केवल उनकी उर्दू रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका भी निभाई। मशहूर शायर स्व. जनाब नरेश कुमार 'शाद' साहब ने राठी साहब के कलाम के बारे में कहा है कि " बलबीर राठी के लबो-लहजे में बड़ा ख़ुशगवार और सेहतमंद रसीलापन है और इस रसीले पन के परदे से जब इनके समाजी शऊर का नूर छान-छनकर आता है तो इसकी ज़ात में छिपी हुई शे'अरी सलाहतों का ऐतराफ़ करते ही बनती है।"

मेरे पीछे सूनी राहें और मेरे आगे चौराहा 
मैं ही मंज़िल का दीवाना मुझको ही रोके चौराहा 

हर कोई अपनी मंज़िल के ख्वाब सजा कर तो चलता है 
क्या कर ले जब वक्त किसी के रस्ते में रख दे चौराहा 

जिन दीवानो के क़दमों में मंज़िल अपनी राह बिछा दे 
'राठी' ऐसे दीवानों को खुद रास्ता दे दे चौराहा 

राठी साहब के पहले ग़ज़ल संग्रह " क़तरा-क़तरा" को भाषा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रथम पुरूस्कार दिया गया था जबकि उनके दूसरे ग़ज़ल संग्रह "लहर-लहर" को सन 1992-93 में उर्दू अकादमी हरियाणा सरकार ने पुरुस्कृत किया। उन्हें हरियाणा और दूसरे प्रदेशों में वहां की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। राठी जी का असली सम्मान तो उनके लाखों मेहनतकश पाठकों श्रोताओं ने किया है जिन्होंने उनकी ग़ज़लों नज़्मों के माध्यम से एक मुकम्मल ज़िन्दगी को जीने का हुनर सीखा है और सीखा है कि किसतरह निराशा के काले घटाघोप अँधेरे से आशा के उजाले की और बढ़ना चाहिए किसतरह अपने हक़ के लिए लड़ना चाहिए और किसतरह अपनी मंज़िल का रस्ता खुद तलाशना चाहिए .
किताब की प्राप्ति के लिए जैसा ऊपर बताया है आप आधार प्रकाशन को उनके पते "आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिट , एस.सी.एफ. 267,सेक्टर -16 पंचकुला -134113 (हरियाणा) को लिखें या वहां से ऑन लाइन मंगवाए या उन्हें aadhar_prakashan@yahoo.com पर इ-मेल करें।
"राठी जी " को उम्र के इस दौर में सुनाई नहीं देता इसलिए उनका मोबाईल नम्बर यहाँ नहीं दे रहा अलबत्ता अगर उनके बारे में कुछ कहना सुनना चाहें तो उनके अज़ीज़ दोस्त "दरवेश भारती " जी से उनके मोबाईल नंबर 9268798930 पर संपर्क कर सकते हैं.
अगली किताब की खोज से पहले प्रस्तुत हैं उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर :

गुज़र तो हो ही जाती है संभल कर चलने वालों की 
मगर फिर ज़िन्दगी में ज़िन्दगी बाकी नहीं रहती 

तुम्हें अच्छी नहीं लगतीं मेरी बेबाकियाँ लेकिन 
तक़ल्लुफ़ में भी अक्सर दोस्ती बाकी नहीं रहती 

कई लम्हात ऐसे भी तो आते हैं मोहब्बत में 
कि दिल में दर्द , आँखों में नमी बाकी नहीं रहती