Monday, June 15, 2015

किताबों की दुनिया - 104

ठीक उस वक्त जब मैं किताबों की दुनिया श्रृंखला बंद करने की सोच रहा था मेरी नज़र पोस्ट के उन आंकड़ों पर पड़ी जिसमें बताया गया था कि फलां पोस्ट को कितने लोगों ने विजिट किया या यूँ कहें कि पढ़ा और किस जगह से। मेरे ख्याल से ये आंकड़े चौकाने वाले थे। पहली "किताबों की दुनिया" में पोस्ट की किताब से अब तक (103 ) किताबों में से 12 % किताबों को एक हज़ार से अधिक ,36 % किताबों को दो हज़ार से अधिक , 15 % किताबों को तीन हज़ार से अधिक, 18 % किताबों को चार हज़ार से अधिक और 8 % किताबों को दुनिया भर से पांच हज़ार से अधिक पाठकों ने पढ़ा या देखा। मजे की बात ये भी देखी कि पाठक पुरानी पोस्ट्स को अब भी विजिट कर रहे हैं. किताबों की दुनिया की पहली और पांचवी पोस्ट को कल ही क्रमश: चार और सात लोगों ने विजिट किया।  दुनिया के 27 देशों से लोगों का इन पोस्ट्स पर आना सुखद अहसास भर गया.    

इन आंकड़ों ने एक नयी ऊर्जा  का संचार किया और इस श्रृंखला को आगे बढ़ाने की चाह मेंअगली किताब की औरमेरे हाथ अपने आप उठ गए। इस किताब और शायर का पता मुझे तब चला था जब इस वर्ष के दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में मेरे प्रिय मित्र और शायरी के जबरदस्त दिवाने जनाब प्रमोद कुमार मुझे लगभग घसीटते हुए अंजुमन प्रकाशन स्टाल पर ले जाकर खुद ही इस किताब को शेल्फ से निकाल कर बोले भाई साहब इन्हें पढ़ो।     

आज हम उसी शायर "एहतराम इस्लाम " साहब की किताब " है तो है "  का जिक्र करेंगे और देखें कि क्यों उनका नाम उर्दू ग़ज़ल के छंद शास्त्र का निर्वाह बेहतरीन तरीके से करने वाले हिंदी ग़ज़ल के शायर के रूप में इज़्ज़त से लिया जाता है।  




आये न आये आपकी तस्वीर मन-पसन्द 
मिलते ही कैमरे से नयन, मुस्कुराइए 

नेवले के दाँत सांप की गर्दन में धँस गए 
बोला मदारी भीड़ से, ताली बजाइए 

मैं डूबने की चाह में बैठा हूँ 'एहतराम
मेरे करीब आप नदी बन के आईये 

हिंदी और उर्दू ज़बान में ग़ज़ल को तकसीम वाले लोगों को जनाब एहतराम साहब का कलाम पढ़ना चाहिए और समझना चाहिए कि ग़ज़ल भाषा की नहीं भाव की विधा है , जिसके पास भाव हैं वो ही अच्छी और कामयाब ग़ज़ल कह सकता है। 

आँखों में भड़कती हैं आक्रोश की ज्वालायें 
हम लाँघ गए शायद संतोष की सीमाएं 

सीनों से धुआँ उठना कब बंद हुआ कहिये 
कहने को बदलती ही रहती हैं व्यवस्थाएँ 

तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दो 
कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएँ 

" है तो है " किताब का पहला संस्करण 1994 में छपा था फिर उसके बीस साल बाद याने 2014 में इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ। ये शायर के हुनर और कहन का विलक्षण अंदाज़ ही है जिसकी वजह से ये ग़ज़लें आज भी मौलिक और ताज़ा लगती हैं।  

देश क्या अब भी नहीं पहुंचेगा उन्नति के शिखर पर 
नित्य ही दो-चार उद्घाटन कराये जा रहे हैं 

छिड़ गया है स्वच्छता अभियान शायद शहर भर में 
गन्दगी के ढेर सड़कों पर सजाये जा रहे हैं 

झूठ, तिकड़म, लूट, रिश्वत, रहज़नी, हत्या, डकैती 
ज़िन्दा रहने के हमें सब गुर सिखाये जा रहे हैं          

5 जनवरी 1949 को मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) में जन्मे एहतराम इस्लाम ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। एहतराम इस्लाम अब महालेखाकार कार्यालय के वरिष्ठ लेखा परीक्षक पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वर्ष 1965 से हिन्दी-उर्दू-अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में एहतराम इस्लाम की रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं

देता रहता है तू सफाई क्या 
तेरे दिल में है कुछ बुराई क्या 

आपने पर क़तर दिए मेरे 
अब मेरी कैद क्या, रिहाई क्या 

पाँव पड़ते नहीं हैं धरती पर 
हो गयी आपसे रसाई क्या 

तू जो रहज़न दिखाई देता है 
मिल गयी तुझको रहनुमाई क्या 

ज्ञान प्रकाश विवेक जी ने राष्ट्रीय सहारा के 22 मार्च 1994 अंक में पत्रिका में लिखा था कि " हिंदी के पहले दस महत्वपूर्ण ग़ज़लकारों में एहतराम इस्लाम का नाम शुमार होता है।  उनकी ग़ज़लें अपने हिन्दीपन से पहचानी जाती हैं। एहतराम की ग़ज़लों का चेहरा खुरदुरा है।  आप इन ग़ज़लों को पढ़ सकते हैं , बैचेन हो सकते हैं लेकिन गा नहीं सकते क्यूंकि ये ग़ज़लें 'ड्राइंग रूम का सुख' नहीं कर्फ्यूग्रस्त शहर की बैचेनी का मंज़र है। 

पीर की आकाश-गंगा पार करती है ग़ज़ल 
कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है ग़ज़ल 

आप इतना तिलमिला उठते हैं आखिर किसलिए 
आपकी तस्वीर ही तो पेश करती है ग़ज़ल 

हाथ में मेंहदी रचाती है न काजल आँख में 
मांग में अफसां नहीं अब धूल भरती है ग़ज़ल  

एहतराम इस्लाम को उर्दू वाले अपना शायर और हिन्दी वाले अपना कवि मानते हैं। क्रांतिकारी विचारों वाले कवि एहतराम इस्लाम एजी आफिस यूनियन में कई बार साहित्य मंत्री भी रह चुके हैं ।

हिंदी ग़ज़ल के नाम पर नाक भों सिकोड़ने वाले लोगों को बता दूँ कि उनकी खालिस उर्दू ग़ज़लों का संग्रह ' हाज़िर है एहतराम' भी अंजुमन प्रकाशन द्वारा मंज़रे आम पर लाया जा चुका है। 

वार तो भरपूर था ढीला न था 
हाँ मगर खंज़र ही नोकीला न था 

ज़हर के आदी पे होता क्या असर     
लोग समझे साँप ज़हरीला न था 

चूस डाला ग़म की जोंकों ने लहू 
वर्ना मेरा भी बदन पीला न था 

ठोकरें लगती रहीं हर गाम पर 
रास्ता कहने को पथरीला न था    

आकर्षक आवरण साथ पेपर बैक में छपी इस किताब में एहतराम साहब की 91 ग़ज़लें संग्रहित हैं। इन खूबसूरत ग़ज़लों के लिए आप एहतराम साहब को उनके मोबाईल न 9839814279 पर बात कर मुबारक बाद दे सकते हैं और किताब प्राप्ति के लिए अंजुमन प्रकाशन से 9235407119 /9453004398 पर सम्पर्क कर सकते हैं। 

अंत में मैं अपने मित्र प्रमोद कुमार जी को मुझे इस किताब तक पहुँचाने के लिए तहे दिल से धन्यवाद देते हुए , एहतराम साहब की एक ग़ज़ल के शेरों को पेश करता हूँ और अगली किताब की तलाश में निकलता हूँ 

मूर्ती सोने की निरर्थक वस्तु है, उसके लिए 
मोम की गुड़िया अगर बच्चे को प्यारी है तो है 

हैं तो हैं दुनिया से बे-परवा परिंदे शाख पर 
घात में उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है 

आप छल बल के धनी हैं , जितियेगा आप ही 
आपसे बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है 

'एहतराम' अपने ग़ज़ल लेखन को कहता है कला 
आप कहते हैं उसे जादू निगारी है, तो है  

12 comments:

GYANDUTT PANDEY said...

यह तो बहुत ही रोचक है कि लोग पुस्तक समीक्षा को इतना महत्वपूर्ण मानते हैं।

एक ही भय है कि आपकी इतनी शानदार समीक्षा के बाद पाठक को यह न लगता हो कि पुस्तक तो 'लगभग पढ़ ही ली"।

vandana gupta said...

ये किताबों की दुनिया है आप बंद कैसे कर सकते हैं बहुत बड़ी है ये दुनिया .........बस चलाते रहिये श्रृंखला ..........एक बार फिर एक नायाब मोती ढूंढ कर लाये हैं आप .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (16-06-2015) को "घर में पहचान, महानों में महान" {चर्चा अंक-2008} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Vandana Ramasingh said...

इस श्रृंखला की हर पोस्ट का इंतज़ार रहता है पाठकों को आदरणीय सर

नीरज गोस्वामी said...

Received on mail:-

bhai neeraj ji
namsatye
janab aap ki yeh baat durast nahi lagi ki aap kitabon ke is column ko band karne ki soch rahe the-
yeh urdu aur hindi gazalon ke kadra-danon ke saath behad na-insaafi hogi--
janab ehatram ki is kitab ka jikra karke unki cchipi hui rachnayon ki hamare saamne lane
ka bahtareen kaam aap ne kiya hai--
iske liye aap tareef ke kabil hain- janab--

wese to saari ghazalen acchi hain- umda hain-- par
yeh khastore par se pasand aayi-

पीर की आकाश-गंगा पार करती है ग़ज़ल
कल्पनाओं के क्षितिज पर तब उभरती है ग़ज़ल

आप इतना तिलमिला उठते हैं आखिर किसलिए
आपकी तस्वीर ही तो पेश करती है ग़ज़ल

हाथ में मेंहदी रचाती है न काजल आँख में
मांग में अफसां नहीं अब धूल भरती है ग़ज़ल

dobara se shukriya-
aur janab ehataam ji ko badhai- mubarak vaad--
-- om sapra
delhi-
m-09818180932

शारदा अरोरा said...

बहुत सरस अभिव्यक्ति, अहतराम साहेब ने क्या खूब लिखा है। आप लिखना बंद न करें ,जैसे ही ये सज्ञान में आता है कि 'किताबों की दुनिया ' में कुछ पोस्ट हुआ ,हम तो फ़ौरन पहुँच जाते हैं ,आंकड़े गवाह हैं ,विजिटर्स के।

रचना दीक्षित said...

बहुत ही लाजवाब प्रस्तुती है सरे शेर एक से बढ़ कर एक है मेरा पसंदीदा

वार तो भरपूर था ढीला न था
हाँ मगर खंज़र ही नोकीला न था

ज़हर के आदी पे होता क्या असर
लोग समझे साँप ज़हरीला न था

चूस डाला ग़म की जोंकों ने लहू
वर्ना मेरा भी बदन पीला न था

ठोकरें लगती रहीं हर गाम पर
रास्ता कहने को पथरीला न था
आभार

Digamber Naswa said...

रोचक समीक्षा और कमाल के शेर ढूंढ के लिखे हैं आपने ... हर शेर बस दिली दाद को मजबूर कर देता है ...

Onkar said...

बहुत सुन्दर शेर पेश किए हैं आपने

नीरज गोस्वामी said...

Received on Mail :-

Neeraj Bhai

Kya kamaal ki charcha ki hai aapne..maza aa gaya...ehtaram sahab se baat kar unhen mubarak baad bhi dedi humne...bahut kamaal ke shayar hain aur aap bhi kisi se kam nahin jo aese heere talash kar hamare saamne laate hain...aapke is zazbe ko salaam karta hoon...dil se.


Chad Shukla "Hadiabadi"
Denmark

Saurabh said...

प्रणाम !
दो बातें साझा हुई हैं, नीरजभाई. एक तो महा वाहियात, दूसरी मेरे मन की ! भला हो, कि वाहियात का झोंका आया और माइक्रो-सेकेण्ड वाली तीव्रता के साथ निकल गया. अव्वल, जाने आ कैसे गया था ? अब समीक्षा का क्रम बदस्तूर बना रहेगा, यह आश्वस्तिकारक है ! मतलब, यह बात भी मेरे मन के अनुसार ही हो गयी.
अच्छी बात यह हुई है कि बड़े भाई एहतराम साहब की ’है तो है’ पर आपके तब्सिरे से मन प्रसन्न है.

इस किताब के कई शेर अब आमजन की ज़ुबान पर चढ़े मसल हो चुके हैं. एहतराम भाईसाहब के साथ बैठ कर उनसे एक ख़ास अंदाज़ में उनकी ग़ज़लों को सुनना एक अनुभव है. सुनाते वक़्त सीधा कहते हैं आप, आँखों में आँखें डाल कर. और फिर अश’आर चंद शब्दों के सुन्दर जमावड़े भर नहीं रह जाते, पारे की गुरुतर बूँद की तरह हृदय की ज़मीन में लगातार धँसते चले जाते हैं, भावनाओं के साथ अमलगमेशन बनाते हुए !

'एहतराम' अपने ग़ज़ल लेखन को कहता है कला
आप कहते हैं उसे जादू निगारी है, तो है !
इसे कहते हैं आत्मविश्वास !

भाईजी, आपने बड़े दिल से इस किताब को छूआ है. हमलोग भी इसे ऐसे ही महसूस करते हैं.
सादर शुभ-शुभ

निवेदिता श्रीवास्तव said...

रोचक समीक्षा श्रृंखला हैं .....