Monday, September 1, 2014

किताबों की दुनिया - 99

नर्म लहज़े में दर्द का इज़हार
गो दिसंबर में जून की बातें 
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जुर्म था पर बड़े मज़े का था 
जिसको चाहा वो दूसरे का था 
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ज़ेहन की झील में फिर याद ने कंकर फेंका 
और फिर छीन लिया चैन मिरे पानी का
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जब भी चाहें उदास हो जाएँ 
शुक्र है इतना इख़्तियार मिला 
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कोई मंज़िल न मुझको रोक सकी 
खुद मिरा घर भी मेरी राह में है 
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जो छुपाने की थी बात बता दी मुझको 
ज़िन्दगी तूने बहुत सख्त सज़ा दी मुझको 

हमारी "किताबों की दुनिया " श्रृंखला की ये पोस्ट इस लिहाज़ से अनूठी है कि हमारे आज के शायर के मशहूर वालिद साहब की किताब का जिक्र भी हम इस श्रृंखला में पहले कर चुके हैं। इस श्रृंखला में पिता के बाद उसके पुत्र की किताब का जिक्र पहली बार हो रहा है । मज़े की बात ये है कि इनके बड़े भाई भी आज हिन्दुस्तानी फिल्मों के बहुत बड़े लेखक और गीतकार हैं और साथ ही बेहतरीन शायर भी। इस शायर के नाम पर से पर्दा उठे उस से पहले आईये एक नज़र उनकी एक ग़ज़ल के इन शेरों पर डाल लें :

अंदर का शोर अच्छा है थोड़ा दबा रहे 
बेहतर यही है आदमी कुछ बोलता रहे 

मिलता रहे हंसी ख़ुशी औरों से किस तरह 
वो आदमी जो खुद से भी रूठा हुआ रहे 

बिछुडो किसी से उम्र भर ऐसे कि उम्र भर 
तुम उसको ढूंढो और वो तुम्हें ढूंढता रहे 

उस्ताद शायर जाँ निसार अख्तर के 31 जुलाई 1946 को लखनऊ में जन्में बेटे और जावेद अख्तर साहब के छोटे भाई "सलमान अख्तर" साहब की किताब "नदी के पास " का जिक्र हम आज इस श्रृंखला में करेंगे। ज़ाहिर सी बात है सलमान साहब को अदबी माहौल विरासत में मिला।


कौन समझा कि ज़िन्दगी क्या है 
रंज होता है क्यों, ख़ुशी क्या है 

जिन के सीनों पे ज़ख्म रोशन हों 
उनके रातों की तीरगी क्या है 

लोग, किस्मत, खुदा, समाज, फ़लक 
आगे इन सबके आदमी क्या है 

हम बहुत दिन जियें हैं दुनिया में 
हम से पूछो कि ख़ुदकुशी क्या है 

बहुत ज्यादा के हकदार इस बेहतरीन शायर की चर्चा बहुत कम हुई है क्यों की 'शायद उन्हें अपने आपको बेचने का हुनर नहीं आया। सलमान साहब पर उनकी माँ 'सफ़िया ' की बीमारी का बहुत गहरा असर हुआ शायद इसीलिए उन्होंने पांच साल की कच्ची उम्र में में डाक्टर बनने की ठान ली। पहले उन्होंने कॉल्विन तालुकदार कालेज से पढाई की और फिर अलीगढ विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान चिकित्सा में एम.डी की डिग्री हासिल की.

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते 
दीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देते 

तुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलता 
तुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देते 

बाहर की हवाओं का अगर खौफ है इतना 
जो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते 

सलमान साहब ने अपनी शायरी की शुरुआत अपने बड़े भाई जावेद से पहले ही कर दी थी तभी तो जावेद साहब ने उनकी इस हिंदी-उर्दू लिपि में छपी किताब की भूमिका में लिखा है कि "उम्र में तो ये मुझसे कोई ढेढ़ साल छोटा है लेकिन शायरी में मुझसे पूरे दस साल बड़ा है " इनकी पहली किताब जो सं 1976 में प्रकाशित हुई थी जिसका आमुख उनके वालिद जाँ निसार अख्तर साहब ने लिखा था।

तीर पहुंचे नहीं निशानों पर 
ये भी इल्ज़ाम है कमानों पर 

जिस ने लब सी लिए सदा के लिए 
उसका चर्चा है सब ज़बानों पर 

सर झुकाये खड़े हैं सारे पेड़ 
और फल सज गए दुकानों पर 

सच की दौलत न हाथ आई कभी 
उम्र कटती रही बहानों पर 

मनो विज्ञान विषय पर उनकी 13 किताबें और 300 से अधिक आलेख विभिन्न देशों के मेडिकल जर्नल्स में छप कर प्रसिद्धि पा चुके हैं। शायरी में 'नदी के पास' उनका तीसरा संकलन है जो "कूबकू " और 'दूसरा घर " के बाद शाया हुआ है। ये किताब देवनागरी और उर्दू दोनों लिपियों में प्रकाशित हुई है. इस किताब में सलमान साहब की कुछ नज़्में और पचास के ऊपर ग़ज़लें संग्रहित हैं।

थोड़े बड़े हुए तो हकीकत भी खुलगयी 
स्कूल में सुना था कि भारत महान है 

देखूं मिरे सवाल का देता है क्या जवाब 
सुनता हूँ आदमी बड़ा जादू बयान है 


गो देखने में मुझसे बहुत मुख्तलिफ है वो 
अंदर से उसका हाल भी मेरे समान है 

सन 2004 में स्टार पब्लिकेशन 4 /5 आसफ अली रोड नई दिल्ली -110002 द्वारा प्रकाशित इस किताब को मंगवाने के लिए आपके पास सिवा उन्हें पत्र लिखने के और कोई दूसरा रास्ता मुझे नहीं मालूम। मुझे ये किताब अलबत्ता उभरती शायरा और स्थापित कवयित्री "पूजा प्रीत भाटिया ' जी के सौजन्य से प्राप्त हुई थी बहुत ही दिलकश अंदाज़ में जावेद अख्तर द्वारा लिखी भूमिका और सलमान साहब की बेहतरीन ग़ज़लों को समेटे ये किताब हर शायरी के प्रेमी को पढ़नी चाहिए। आखिर में सलमान साहब की एक ग़ज़ल के ये शेर आपके हवाले कर मैं अब चलता हूँ अगली किताब की तलाश में। खुश रहें।

फर्क इतना है कि आँखों से परे है वर्ना 
रात के वक्त भी सूरज कहीं जलता होगा 

खिड़कियां देर से खोलीं, ये बड़ी भूल हुई 
मैं ये समझा था कि बाहर भी अँधेरा होगा 

कौन दीवानों का देता है यहाँ साथ भला 
कोई होगा मिरे जैसा तो अकेला होगा


18 comments:

शारदा अरोरा said...

bahut khoob...

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 03 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अच्छी रचनाएँ पढ़वाने का आभार।

नीरज गोस्वामी said...

Msg Received on e-mail :-

Dear neeraj ji-
Namstey, ur write up abt Salmaan Akhtar saab is very illustrative and worth reading-
congrats for the same.
And, especially these lines are worth quotable--
सर झुकाये खड़े हैं सारे पेड़
और फल सज गए दुकानों पर

सच की दौलत न हाथ आई कभी
उम्र कटती रही बहानों पर

again congrats --
--om sapra,
delhi-9
m- 9818180932

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

एक बार फिर से सफ़र शुरू किया है अब मुलाक़ात होती रहेगी . आपकी समीक्षा गागर में सागर ही है हमेशा से

v k jain said...

जो छुपाने की थी बात बता दी मुझको
ज़िन्दगी तूने बहुत सख्त सज़ा दी मुझको

तीर पहुंचे नहीं निशानों पर
ये भी इल्ज़ाम है कमानों पर

बिछुडो किसी से उम्र भर ऐसे कि उम्र भर
तुम उसको ढूंढो और वो तुम्हें ढूंढता रहे
बहुत ही सुन्दर शेर है
इतनी शानदार शायरी से रूवरू करने के लिए आपको साधूवाद

v k jain said...

जो छुपाने की थी बात बता दी मुझको
ज़िन्दगी तूने बहुत सख्त सज़ा दी मुझको

तीर पहुंचे नहीं निशानों पर
ये भी इल्ज़ाम है कमानों पर

बिछुडो किसी से उम्र भर ऐसे कि उम्र भर
तुम उसको ढूंढो और वो तुम्हें ढूंढता रहे
बहुत ही सुन्दर शेर है
इतनी शानदार शायरी से रूवरू करने के लिए आपको साधूवाद

Devendra Gehlod said...

kya baat hai Neeraj ji
ye shayar hai gumnam
par dusre shayro se bada hai naam

jakhira.com par bhi in par ek article hai pdhiyega
(Salman Akhtar lajawab shayar http://www.jakhira.com/2012/01/blog-post_12.html)

तिलक राज कपूर said...

मेरा निजि अनुभव तो यही कहता है कि शायरी से कठिन है किसी शायर को प्रस्‍तुत करना; और यह काम जिस खूबसूरती से आप करते हैं वह बेमिसाल है।

Asha Saxena said...

बहुत खूब |

Dr.NISHA MAHARANA said...

bahut badhiya ...bhawon se bharpoor .....

नीरज गोस्वामी said...

Received on mail :-

तुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलता
तुम दूर हो मुझसे तो सदा क्यों नहीं देते
जैसा कि शायरों के इन्तखाब में आप को महारत हासिल है इस बार भी आप ने एक दिलकश अंदाज़ वाले बेहतरीन शायर से आप ने हमें रूबरू कराया .अच्छी शायरी ,
हम बहुत दिन जियें हैं दुनिया में
हम से पूछो कि ख़ुदकुशी क्या है

जिस ने लब सी लिए सदा के लिए
उसका चर्चा है सब ज़बानों पर
सलमान अख्तर को दिलकश शायरी के लिए मुबारकबाद
और
आपको उनसे मिलवाने के लिए बधाई
रमेश 'कँवल'

रश्मि शर्मा said...

जुर्म था पर बड़े मज़े का था
जिसको चाहा वो दूसरे का था....बहुत सुंदर...

PRAN SHARMA said...

NEERAJ JI , AAPKEE JITNEE TAAREEF HO UTNEE KAM HAI . AAPNE EK AUR
ASHAAR KI KITAB SE PARICHAY KARWAAYAA HAI . ADHIKAANSH SHER UMDAA HAIN . PADH KAR LUTF AAYAA HAI .

Smita Singh said...

beautiful

ankur goswamy said...

Wah !!

Onkar said...

बहुत सुंदर