Monday, February 13, 2012

किताबों की दुनिया - 66

भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार...ये शब्द आजकल हर तरफ गूँज रहा है...सदियों से सहते आ रहे भ्रष्टाचार से अचानक लोग मुक्ति पाने के लिए तड़प रहे हैं...नारे लगा रहे हैं, अनशन कर रहे हैं, मुठ्ठियाँ हवा में लहरा रहे हैं...और भ्रष्टाचार है के वहीँ का वहीँ अपनी मजबूत स्तिथि का फायदा उठाते हुए मंद मंद मुस्कुरा रहा है. क्यूँ? जवाब के लिए मुंबई से प्रकाशित साहित्य पत्रिका "कथा बिम्ब" के ताज़ा अंक में श्री "घनश्याम अग्रवाल" जी की ये कविता पढ़ें:-
"बेताल के सवाल पर
विक्रम से लेकर अन्ना तक
सभी मौन हैं
कि जब सारा देश
भ्रष्टाचार के खिलाफ है
तब स्याला
भ्रष्टाचार करता कौन है?"

सीधी सी बात है भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले हम लोग ही भ्रष्टाचार को फ़ैलाने में सहयोग देते हैं.इसी बात को उस शायर ने जिसकी किताब का जिक्र हम करने जा रहे हैं किस खूबसूरत अंदाज़ में कहा है पढ़िए :-

ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम है
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते


गज़ब के तेवर लिए इस छोटी सी प्यारी सी शायरी की किताब " जन गण मन " के लेखक हैं ब्लॉग जगत के अति प्रिय, स्थापित युवा शायर जनाब "द्विजेन्द्र द्विज" साहब. द्विजेन्द्र जी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं ,ब्लॉग जगत के ग़ज़ल प्रेमी इस नाम से बखूबी परिचित हैं. ब्लॉग पर उनकी सक्रियता अधिक नहीं रहती लेकिन वो जब भी अपनी ग़ज़लों से रूबरू होने का मौका देते हैं अपने पाठकों को चौंका देते हैं.

अँधेरे चंद लोगों का अगर मकसद नहीं होते
यहांके लोग अपने आप में सरहद नहीं होते

फरेबों की कहानी है तुम्हारे मापदंडों में
वगरना हर जगह 'बौने' कभी 'अंगद' नहीं होते

चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर घने बरगद नहीं होते

बौनों के अंगद होने की बात कहने वाला शायर किस कोटि का होगा ये पता लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है. ऐसी सोच और ऐसे अशआर यक़ीनन शायर के अन्दर धड़कते गुस्से के लावे को बाहर लाते हैं. द्विज जी की बेहतरीन ग़ज़लें रिवायती ग़ज़लों की श्रेणी में नहीं आतीं, उनकी ग़ज़लों में महबूबा के हुस्न और उसकी अदाओं में घिरे इंसान का चित्रण नहीं है उनकी ग़ज़लों में आम इंसान की हताशा, दुखी जन के प्रति संवेदनाएं और समाज के सड़े गले नियमों के खिलाफ गुस्सा झलकता है. द्विज जी अपनी ग़ज़लों से आपको झकझोर कर जगाते हैं.

अगर इस देश में ही देश के दुश्मन नहीं होते
लुटेरा ले के बाहर से कभी लश्कर नहीं आता

जो खुद को बेचने की फितरतें हावी नहीं होतीं
हमें नीलाम करने कोई भी तस्कर नहीं आता

अगर जुल्मों से लड़ने की कोई कोशिश रही होती
हमारे दर पे जुल्मों का कोई मंज़र नहीं आता

10 अक्तूबर,1962. को जन्में द्विज जी, बेहतरीन ग़ज़ल कहने की उस पारिवारिक परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं जिसकी नींव उनके स्वर्गीय पिता श्री "सागर पालनपुरी" जी ने डाली थी. श्री ‘सागर पालनपुरी’ जी का नाम आज भी हिमाचल के साहित्यिक हलकों बहुत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है. कालेज के दिनों से ही वो अपने पिता के सानिध्य में ऐसी ग़ज़लें कहने लगे जिसे सुन कर उस्ताद शायर भी दंग हो जाया करते थे. तारीफों की हवा से अक्सर इंसान गुब्बारे की तरह अपनी ज़मीन को छोड़ कर ऊपर उड़ने लगते हैं और एक दिन अचानक धरातल पर आ गिरते हैं, लेकिन द्विज जी के साथ ऐसा नहीं हुआ. प्रशंशा की सीढियों से उन्होंने नयी ऊँचाइयाँ छूने की कोशिशें की.

कटे थे कल जो यहाँ जंगलों की भाषा में
उगे हैं फिर वही तो चम्बलों की भाषा में

सवाल ज़िन्दगी के टालना नहीं अच्छा
दो टूक बात करो, फ़ैसलों की भाषा में

फ़रिश्ता है कहीं अब भी जो बात करता है
कड़कती धूप तले, पीपलों की भाषा में

हज़ार दर्द सहो, लाख सख्तियां झेलो
भरो न आह मगर, घायलों की भाषा में

द्विज जी चूँकि हिमाचल से हैं इसलिए उनकी ग़ज़लों में पहाड़ नदियाँ बादल झरने रूमानी अंदाज़ में नहीं बल्कि ज़िन्दगी की हकीकत बन कर कर उभरे हैं. इस संग्रह की संक्षिप्त सी भूमिका में मशहूर ग़ज़ल कार जनाब 'ज़हीर कुरैशी' जी ने क्या खूब लिखा है के " द्विज जी की ग़ज़लों में व्यक्त उनका पहाड़ हिमाचल तक सिमित नहीं है. जाती मज़हब रंग नस्लों और फिरकापरस्ती की सियासत के खिलाफ भी उनका ग़ज़लकार तन कर खड़ा है. पहाड़ की कठिन ज़िन्दगी में खून-पसीने से सींचे गए खेतों की उपज का बंटवारा ठीक-ठाक होने की चेतावनी भी उनके शेरों में है." आप खुद पढ़ें:

बंद अंधेरों के लिए ताज़ा हवा लिखते हैं हम
खिड़कियाँ हो हर तरफ ऐसी दुआ लिखते हैं हम

आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया
ऐसी साजिश के लिए हर बद्दुआ लिखते हैं हम

रौशनी का नाम दे कर आपने बाँटे हैं जो
उन अंधेरों को कुचलता हौसला लिखते हैं हम

अँग्रेज़ी साहित्य में सनातकोत्तर डिग्री प्राप्त द्विज जी 'अनुप्रयुक्त विज्ञानं एवं मानविकी राजकीय पोलिटेक्निक', सुन्दर नगर , जिला मंडी में विभागाध्यक्ष के पद पर कार्य रत हैं , ग़ज़ल लेखन उनका शौक भी है और समाज में हो रही असंगतियों को देख मन के अन्दर उठते लावे को बाहर लाने का ज़रिया भी. उनकी ग़ज़लें आपसे दार्शनिक अंदाज़ में बातें नहीं करती बल्कि सीधे सपाट शब्दों में अपनी बात कहती हैं और अपना पक्ष प्रस्तुत करती हैं.

आपके अंदाज़, हमसे पूछिए तो मोम हैं
अपनी सुविधा के सभी सांचों में ढल जाते हैं आप

कुश्तियां, खेलों के चस्के आपके भी खूब हैं
शेर बकरी को पटकता है बहल जाते हैं आप

सिद्धियाँ मिलने पे जैसे मन्त्र साधक मस्त हों
शहर में होते हैं दंगे, फूल फल जाते हैं आप

"जन-गण-मन" गागर में सागर को चरितार्थ करती हुई छोटी सी किताब है जिसमें द्विज जी की लगभग साठ ग़ज़लें संगृहीत हैं. इसे आप श्री सतपाल ख्याल जी के ब्लॉग "आज की ग़ज़ल" या फिर स्वयं द्विज जी के ब्लॉग "द्विजेन्द्र ‘द्विज’" पर आन लाइन भी पढ़ सकते हैं. लेकिन साहब आन लाइन पढने में वो मज़ा नहीं आता जो मज़ा किताब को हाथ में उठाकर पढने में आता है. हालाँकि इस किताब को 'दुष्यंत-देवांश-प्रकाशन, अशोक लॉज, मारण्डा, हिमाचल प्रदेश द्वारा प्रकाशित किया गया है लेकिन इसे प्राप्त करने का आसान तरीका है द्विज जी को इस संग्रह के लिए उनके मोबाइल +919418465008 पर बात कर बधाई देते हुए उनसे किताब की प्राप्ति के लिए आग्रह करना।

मेरा सौभाग्य है के मैं पिछले पांच सालों से उनसे संपर्क में हूँ .ये संपर्क अभी तक आभासी है याने सिर्फ मोबाइल पर ही उनसे बात होती है लेकिन मुझे उनसे बात करके कभी लगा ही नहीं कि मैं इनसे अभी तक नहीं मिला हूँ. मैंने ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र में उनसे बहुत कुछ सीखा है और सीख रहा हूँ. इस क्षेत्र में आदरणीय पंकज सुबीर जी और प्राण साहब के साथ साथ वो भी मेरे गुरु हैं. अपनी सोच में एक दम स्पष्ट और जीवन के प्रति सकारात्मक विचार रखने वाले इस शख्श की प्रशंशा के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द नहीं हैं. मैं दुआ करता हूँ के वो इसी तरह अपनी शायरी से हमें हमारे जीवन में फैले अंधियारों से लड़ने की ताकत देते रहें.

रास्तों पर 'ठीक शब्दों' के
दनदनाती ' वर्जनाएं ' हैं

मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
सामने 'संभावनाएं' हैं

आदमी के रक्त में पलतीं
आज भी 'आदिम-प्रथाएं' हैं

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्यूंकि ये ग़ज़लें 'व्यथाएं' हैं

41 comments:

Shiv said...

बहुत-बहुत सुन्दर! द्विज जी की शायरी पाठकों से बतियाती है.

एक से बढ़कर एक बढ़िया गजलें.

सदा said...

रास्तों पर 'ठीक शब्दों' के
दनदनाती ' वर्जनाएं ' हैं

मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
सामने 'संभावनाएं' हैं
बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...आभार

vidya said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति...

आभार.
सादर.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह इतना सारा माल एक ही जगह ☺

रश्मि प्रभा... said...

ये चाँद ख़ुद भी तो सूरज के दम से काइम है
ये ख़ुद के बल पे कभी चांदनी नहीं देते... यूँ न रुसवा करो चाँद को , चाँदनी है तो उसी की - फिर एक कमाल व्याख्या

GYANDUTT PANDEY said...

1. भ्रष्टाचार की जागरूकता में इतनी कवितायें लिखी जा रही हैं, पर यह अनाचार जाने का नाम नहीं लेता। :-(

2. आपके ब्लॉग पर आने पर पता चलता है कि लोग वास्तव में कविता में कितना बढ़िया बढ़िया लिखते-प्रयोग करते हैं। धीरे धीरे ही सही, इस बहाने कविता की पुस्तकें घर में आ रही हैं!

शारदा अरोरा said...

bahut khoob ,
हमें नीलम करने कोई भी तस्कर नहीं आता
me aa ki matra ka prayog choot gaya hai ...
हमें नीलाम करने कोई भी तस्कर नहीं आता

वन्दना said...

क्या कहूँ …………मौन कर दिया…………एक बार फिर आपका आभार इतने उम्दा शायर की शायरी से मिलवाने केलिये।

राजेश उत्‍साही said...

द्विज से मिलकर अच्‍छा लगा।

ऋता शेखर मधु said...

मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
सामने 'संभावनाएं' हैं
बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आभार|

इमरान अंसारी (عمران انصاری) said...

बहुत खूब सभी शेर वज़नदार है ।

Bharat Bhushan said...

शायर-शायरी परिचय का एक और सुंदर आयाम. बहुत खूब.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

द्विज जी के अशार और आपकी समीक्षा पढ़ना सुखद अनुभूति है. सादर आभार.

रविकर said...

बहुत सुन्दर |
बधाई ||

Kailash Sharma said...

द्विज जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचय कराने के लिये आभार..

आशा जोगळेकर said...

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्यूंकि ये ग़ज़लें 'व्यथाएं' हैं ।

द्विजेन्द्र द्विज की गज़ल का ये शेर उनकी गजलों की बखूबी व्याख्या कर रहा है ऐसे उम्दा फनकार से मिलवाने का शुक्रिया । जब जाब आपके ब्लॉग पर आई हूँ एक सुखद अहसास हुआ है ।

अनुपमा पाठक said...

आदमी को आदमी से दूर जिसने कर दिया
ऐसी साजिश के लिए हर बद्दुआ लिखते हैं हम

बहुत खूब!

बहुत बहुत सुन्दर!
आभार!

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

मैं भ्रष्टाचारी हूं क्योंकि शिष्टाचार निभाने के लिए मुझे घूस देनी पडी :) द्विज जी की इस पुस्तक पर मैंने भी समीक्षा लिखी, किसी भ्रष्ट उद्देश्य से नहीं :)

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द तो दमदार चोट करते हैं, काश कोई इन्हें अपना भी ले..

तिलक राज कपूर said...

द्विजेन्‍द्र भाई तो खदान हैं आज के समय की उम्‍दा ग़ज़लों के, लेकिन आपका प्रस्‍तुत करना सोने पर सुहागा।

मनोज कुमार said...

द्विजेन्द्र जी की इस ग़ज़ल की किताब में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं, जैसा कि आपकी समीक्षा से पता चलता है।

नीरज गोस्वामी said...

Msg received from mail:-

Neeraj ji
namaskar
dwej ji ki gazalen achchi lagin
tanaks
yours
sajeevan
mo 09425043627>

Rachana said...

itne achchhe shayar ki shayari se parichaya karaya bahut bahut babhar man prasan huaa kya gazlen hai bhavon se bhari
badhai
rachana

lokendra singh rajput said...

द्विज जी के काव्य संग्रह की जानकारी के लिए धन्यवाद..

mridula pradhan said...

wah....kya baat hai.

दीपिका रानी said...

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्यूंकि ये ग़ज़लें 'व्यथाएं' हैं
इन्हें और पढ़ने की चाह जग गई...

dheerendra said...

भ्रस्टाचार कभी समाप्त नही हो सकता, क्योकि जो
लोग हल्ला कर रहे है वही भ्रष्टाचार में शामिल है,.

वाह!!!!!!क्या बात है बहुत अच्छी प्रस्तुति,

MY NEW POST ...कामयाबी...

यादें....ashok saluja . said...

द्विज जी,अपनी स्पष्ट सोच के लिए बधाई के पात्र हैं
रूबरू करने के लिए .....
आपका आभार!

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...

आदरणीय नीरज भाई साहब
आपने मेरी शायरी का ज़िक्र करके उसे सचमुच मधुर बनाने का प्रयास किया है.
और क्या कहूँ ? बस आपके स्नेह के प्रति नतमस्तक हूँ.
यहाँ आकर टिप्पणी देने वाले मित्रों का भी हार्दिक आभार.

आदरणीय भाई चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी भी इस संकलन की समीक्षा कर चुके हैं .

डॉ. जेन्नी शबनम said...

sabhi ghazlen behtareen. bahut umda shayari...

रास्तों पर 'ठीक शब्दों' के
दनदनाती ' वर्जनाएं ' हैं


मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
सामने 'संभावनाएं' हैं


आदमी के रक्त में पलतीं
आज भी 'आदिम-प्रथाएं' हैं

ये मनोरंजन नहीं करतीं
क्यूंकि ये ग़ज़लें 'व्यथाएं' हैं

saargarbhit aur sashakt rachnaaon ke liye Dvijendra ji ko badhai.

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...

आदरणीय नीरज भाई साहब
आपने मेरी शायरी का ज़िक्र करके उसे सचमुच मधुर बनाने का प्रयास किया है.
और क्या कहूँ ? बस आपके स्नेह के प्रति नतमस्तक हूँ.
यहाँ आकर टिप्पणी देने वाले मित्रों का भी हार्दिक आभार.

आदरणीय भाई चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी भी इस संकलन की समीक्षा कर चुके हैं .

दिगम्बर नासवा said...

सबसे पहले देरी से आने की क्षमा .. फिर हठीला पुरूस्कार की बधाई ... ये तो होना ही था ...
और अब शुक्रिया द्विज जी की पुस्तक से परिचय करवाने का ... सक्के चाहेते गज़लकार की ये किताब लानी ही पढेगी ... देखिये कब नसीब होता है ...

mark rai said...

रास्तों पर 'ठीक शब्दों' के
दनदनाती ' वर्जनाएं ' हैं

मूक जब 'संवेदनाएं' हैं
सामने 'संभावनाएं' हैं...........
sargarbhit panctiyan......

veerubhai said...

लाज़वाब करती बेहतरीन प्रस्तुति तारीफ के अनुरूप काबिले दाद भी दीद भी .

Udan Tashtari said...

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ जी को हमेशा ही पढ़ते आये हैं..आनन्द लेते आये हैं..आज उनकी पुस्तक के बारे में जानकर अच्छा लगा...शायद हासिल कर पायें तो अवश्य इच्छा रहेगी ....कि पढ़ पायें और मेरी खास लायब्रेरी का हिस्सा बने.

SATISH said...

Respected Neeraj Ji,

Waah waah...bahut khoob

"चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर घने बरगद नहीं होते"

maza aa gaya...

Hardik aabhaar.

Satish Shukla 'Raqeeb'

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

सभी रचनाएं एक से बढकर एकहैं। आभार।

------
..की-बोर्ड वाली औरतें।

akash lalwani said...

hamesh ki tarah
LAJAWAAB

pramod kumar said...

very very good

pramod kumar said...

behtreen

Pra_ras said...

nice