Monday, March 28, 2016

किताबों की दुनिया -121

दहलीज़ मेरे घर की अंधेरों से अट न जाय 
पागल हवा चराग़ से आकर लिपट न जाय 

हमसाये चाहते हैं मिरे घर को फूंकना 
और ये भी चाहते हैं घर उनके लपट न जाय

पा ही गया मैं इश्क़ के मकतब में दाखिला 
दुनिया संभल, कि तुझसे मिरा जी उचट न जाय 

एक दुबले पतले सांवले से लड़के ने, जो दूर से देखने पर किसी स्कूल का विद्यार्थी लगता है, जब ये शेर मुझे सुनाये तो हैरत से मुँह खुला ही रह गया " दुनिया संभल। कि तुझसे मिरा जी उचट न जाय " मिसरा दसों बार दोहराया और अहा हा हा कहते हुए उस से पूछा कि ये शेर किसके हैं बरखुरदार ? जवाब में लड़के ने अपना चश्मा ठीक करते हुए शरमा कर सर झुकाया और बोला " मेरे ही हैं नीरज जी " सच कहता हूँ एक बार तो उसकी बात पे बिलकुल यकीन नहीं हुआ और जब हुआ तो उसे गले लगते हुए मैंने भरे गले से कहा - जियो ! 

तुम्हें जिस पर हंसी आई मुसलसल 
वो जुमला तो अखरना चाहिए था 

वहां पर ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी थी 
उसी कूचे में मरना चाहिए था 

किसी की मुस्कराहट छीन बैठे 
सलीक़े से मुकरना चाहिए था 

समझ आया है ये बीनाई खो कर 
उजालों से भी डरना चाहिए था 

आज 'किताबों की दुनिया' में हम चर्चा कर रहे हैं नौजवान शायर जनाब ' इरशाद ख़ान 'सिकंदर' साहब की किताब 'आंसुओं का तर्जुमा' की जो 2016 के दिल्ली विश्व पुस्तक मेले के दौरान मंज़र-ए-आम पर आयी और आते ही छा गयी। लोकप्रियता की नयी मिसाल कायम करने वाली इस किताब के पीछे इरशाद की हर हाल में ज़िंदा रहने और होने की जिद के साथ-साथ ज़िन्दगी के सच्चे खरे तज़ुर्बे छुपे हुए हैं।


फिर उसके बाद सोच कि बाकी बचेगा क्या 
तू सिर्फ कृष्ण भक्ति से रसखान काट दे 

महफ़िल की शक्ल आपने देखी है उस घडी 
दानां की बात जब कोई नादान काट दे 

कमतर न आंकिए कभी निर्धन के अज्म को 
अपनी पे आये पानी तो चट्टान काट दे 

गंगा जमुनी तहजीब की नुमाइंदगी करती इरशाद की ग़ज़लें सीधे पढ़ने सुनने वालों के दिल में उत्तर जाती है। ये तय करना मुश्किल है कि इरशाद उर्दू के शायर हैं या हिंदी के। 8 अगस्त 1983 को जन्मे इरशाद ने शायरी की राह अपने आप चुनी बकौल इरशाद शायरी ऐसी विधा थी जिससे उनके पूरे खानदान में किसी का भी दूर दूर तक कोई नाता नहीं रहा था। पूरे कट्टर धार्मिक परिवेश में पले -बढे इरशाद के पीछे शायरी की बला कब और कैसे पड़ गयी ये उन्हें खुद भी नहीं मालूम। अब उनके नक़्शे कदम पर उनकी छोटी बहन परवीन खान बहुत सधे हुए क़दमों से चल रही है। 

हौसला भले न दो उड़ान का 
तज़करा तो छोड़ दो थकान का 

ईंट उगती देख अपने खेत में 
रो पड़ा है आज दिल किसान का 

मुझमें कोई हीरे हैं जड़े हुए 
सब कमाल है तेरे बखान का 

मैं चराग से जला चराग हूँ 
रौशनी है पेशा खानदान का 

 'लफ्ज़' पत्रिका के संपादक संचालक जनाब 'तुफैल चतुर्वेदी' साहब ने उर्दू के बेहतरीन युवा शायरों की पूरी खेप तैयार करने में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है और आज भी कर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन और उस्तादी में जनाब 'विकास राज' और ' स्वप्निल तिवारी' जैसे बहुत से शायरों ने अपने हुनर को संवारा और धार दी। इन दो शायरों की तरह इरशाद भी खुद फ़ारिगुल-इस्लाह ही नहीं हुए बल्कि बहुत अच्छे शेर कहने वाले कई शायरों की रहनुमाई भी कर रहे हैं। 

कल तेरी तस्वीर मुकम्मल की मैंने 
फ़ौरन उस पर तितली आकर बैठ गयी 

रोने की तरकीब हमारे आई काम 
ग़म की मिटटी पानी पाकर बैठ गयी 

वो भी लड़ते लड़ते जग से हार गया 
चाहत भी घर बार लुटा कर बैठ गयी 

तुफैल साहब के अलावा इरशाद की शायरी को सजने संवारने में उर्दू के बहुत बड़े शायर जनाब फ़रहत एहसास और डॉ अब्दुल बिस्मिल्लाह साहब का भी बहुत बड़ा हाथ रहा है। इरशाद भाई ने इस किताब में अपनी बात कहते हुए लिखा भी है कि "तक़दीर जब-जब मुझे मेरी हार गिनवाती है मैं अपनी जीत के तीन नाम, याने 'तुफैल साहब , फरहत एहसास और जनाब अब्दुल बिस्मिल्लाह साहब , गिनवाकर तक़दीर की बोलती बंद कर देता हूँ। 

जिस्म दरिया का थरथराया है 
हमने पानी से सर उठाया है 

अब मैं ज़ख्मों को फूल कहता हूँ 
फ़न ये मुश्किल से हाथ आया है 

जिन दिनों आपसे तवक़्क़ो थी 
आपने भी मज़ाक़ उड़ाया है 

हाले -दिल उसको क्या सुनाएँ हम 
सब उसी का किया-कराया है 

प्रसिद्ध शायर 'ज्ञान प्रकाश विवेक' जी ने लिखा है कि 'सिकंदर की ग़ज़लों में सादगी की गूँज हमें निरंतर महसूस होती है , उनकी ग़ज़लों में बड़बोलेपन का कोई स्थान नहीं है। विनम्रता इन ग़ज़लों को ऐसे संस्कार में रचती है कि दो मिसरे कोई शोर नहीं मचाते। शायरी का अगर दूसरा नाम तहज़ीब है तो उसे यहाँ महसूस किया जा सकता है। 

तेरी फ़ुर्क़त का अमृत पिया 
और उदासी अमर हो गयी 
फुरकत -जुदाई 

यूँ हुआ फिर करिश्मा हुआ 
मिटटी ही कूज़ागर हो गयी

मुझको मिटटी में बोया गया 
मेरी मिटटी शजर हो गयी 

इरशाद की शायरी की ये तो अभी शुरुआत ही है हमें उम्मीद है कि आने वाले वक्त में वो और भी बेहतरीन शायर बन के मकबूल होगा, जिसकी शायरी में इश्क के अलावा दुनिया के रंजों ग़म खुशियां मजबूरियां घुटन टूटन बेबसी के रंग भी नुमायां होंगे। उर्दू शायरी को इस नौजवान शायर से बड़ी उम्मीदें जगी हैं. और क्यों न जगें ? जिस शायर की पहली ही किताब चर्चा में आ जाय उस से भविष्य में और अच्छे की उम्मीद बंध ही जाती है। अब इरशाद का मुकाबला खुद इरशाद से होगा उसे अब अपनी हर कहन को अपने पहले कहे से बेहतर कहना होगा ये काम जितना आसान दिखता है उतना है नहीं लेकिन हमें यकीन है कि इरशाद के बुलंद हौसले उसे सिकंदर महान बना कर ही छोड़ेंगे। 

मैं भी कुछ दूर तलक जाके ठहर जाता हूँ 
तू भी हँसते हुए बच्चे को रुला देती है 

ज़ख्म जब तुमने दिए हों तो भले लगते हैं 
चोट जब दिल पे लगी हो तो मज़ा देती है 

दिन तो पलकों पे कई ख्वाब सज़ा देता है 
रात आँखों को समंदर का पता देती है 

इस किताब के प्रकाशन के लिए एनीबुक डॉट कॉम की जितनी तारीफ की जाय कम है। बड़े प्रकाशक जहाँ नए और कम प्रचलित लेखकों कवियों या शायरों को छापने से बचते हैं वहीँ एनीबुक ने न केवल इरशाद खान 'सिकंदर' की किताब को छापा बल्कि बहुत खूबसूरत अंदाज़ में छापा। इसके पीछे 'पराग अग्रवाल' जी - जो इसके करता धर्ता हैं, का शायरी प्रेम झलकता है। किताब की प्राप्ति के लिए आप एनीबुक को उनके हाउस न। 1062 , ग्राउंड फ्लोर , सेक्टर 21 , गुड़गांव पर लिखे या contactanybook@gmail.com पर मेल करें। सबसे आसान है की आप इरशाद भाई को उनके मोबाईल 9818354784 पर बधाई देते हुए किताब प्राप्ति का आसान रास्ता पूछें या फिर पराग अग्रवाल जी से उनके मोबाईल फोन 9971698930 पर बात कर किताब मंगवा लें। चाहे जो करें लेकिन इस होनहार शायर की किताब आपकी निजी लाइब्रेरी में होनी ही चाहिए। अगली किताब की तलाश से पहले आपको पढ़वाते हैं इरशाद की एक ग़ज़ल के ये शेर 

क्या किसी का लम्स फिर इंसा बनाएगा मुझे 
उसके जाते ही समूचा जिस्म पत्थर हो गया 

कारवां के लोग सारे गुमरही में खो गए
मैं अकेली जान लेकर तनहा लश्कर हो गया 

क्या करूँ ग़म भी छुपाना ठीक से आता नहीं 
 दास्ताँ छेड़ी किसी ने मैं उजागर हो गया

36 comments:

parul singh said...

ज़ख्म जब तुमने दिए हों तो भले लगते हैं
चोट जब दिल पे लगी हो तो मज़ा देती है
इरशाद भाई जी की इस किताब में हर एक ग़ज़ल हर एक शेर कॉट करने लायक है। मैं आसानी से अन्दाज़ा लगा सकती हूँ आपको भी बहुत मुश्किल आई होगी शेर यंहा पोस्ट करने के लिए चुनने मे । इरशाद भाई जितने सादादिल इन्सान हैं उतनी ही सादा और ज़हीन पर गजलियत लिये उनकी ग़ज़ले । ये किताब पहले ही पढ चुके हैं और शायर से उनके कलाम भी सुन चुके है। जो अविश्मरणीय अनुभव रहा। यंहा पर फिर से इस किताब और इरशाद जी से रूबरू हों बहुत अच्छा लगा ।

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

बिला शक ........एक बेशकीमती किताब ................परिपक्व शायरी

Pramod Kumar
Delhi

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

लगता है इरशाद साहब ने सारे रंग भरे हैं इस किताब में लेकिन सामाजिक समरसता वाला शे'र "कृष्ण की भक्ति में से रसखान काट दे" लाजवाब लगा।

Dharmender Giri

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

नीरजसाहब, इरशाद की किताब से आपके चुने तमाम शेर मेरे भी पसंदीदा हैं. कई साल से इरशाद को पढ़ सुन रहा हूँ... मिलता भी रहा हूँ.. वो इस दौर का एक नायाब शायर और शानदार इंसान है.. उसकी किताब पर इतना अच्छा लिखने के लिए मेरी बधाई लें..

Kamlesh Pandey

Delhi

vikas sharma raaz said...

एक अच्छे इंसान की अच्छी किताब और एक अच्छे इंसान का अच्छा तब्सरा ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-03-2016) को "सूरज तो सबकी छत पर है" (चर्चा अंक - 2296) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pooja bhatiya said...

नीरज जी
नमस्कार
इरशाद जी और उनकी क़िताब पर आपके कहे हर इक लफ़्ज़ से इत्तिफ़ाक़ रखती हूँ। रेख़्ता के सालाना कार्यक्रम के दौरान उनसे मिलना हुआ और वहीँ से ली उनकी किताब उनके दस्तख़त के साथ ।आपने बहुत खूबसूरती से समीक्षा कही। और उतना ही ख़ूबसूरत अनुभव रहा आंसुओं के तर्जुमे से गुजरने का।
आपका शुक्रिया
इरशाद जी को उनकी किताब के लिए ढेरों दुआएं
सादर
पूजा

Kavita Rawat said...

इरशाद ख़ान 'सिकंदर' साहब की किताब 'आंसुओं का तर्जुमा' की सार्थक समीक्षा प्रस्तुति हेतु आभार!

shorya Malik said...

Ahhhhh wahh ji wah irshad bhai behad hi shandar.alfaj bhi kam pad rhe h tarif ke liye.
Kya karu gam bhi chupana thik se aata nhi
dasta chedi kisi ne main ujagar ho gya wah bhai wah dil ki anthin gahrahiyo tak ye sher pahucha h dhero shubhkamnaye aapki lekhni ko . Aap yuhi likhte rahe aur ham padhte rahe.

Anonymous said...

क्या कहने.. इरशाद खान साहब कमाल के शेर कहते हैं ..मैं खास तौर पर इनके काफ़िये बरतने के हुनर का मुरीद हूँ ..बकौल तुफ़ैल साहब
मुसहफी हूँ मैं बदलता हूँ हज़ारों चेहरे
कभी इरशाद बना तो कभी स्वप्निल हुआ मैं
आपको और उनको बहुत बधाई
कान्हा

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:

कारवां के लोग सारे गुमरही में खो गए
मैं अकेली जान लेकर तनहा लश्कर हो गया
Adbhut🙏🏻
Bas ab to puri kitaab ko padhe bina dil manega nahi


Shubham Mishra Vats
Delhi

नीरज गोस्वामी said...

मैं भी कुछ दूर तलक जाके ठहर जाता हूँ
तू भी हँसते हुए बच्चे को रुला देती है

ज़ख्म जब तुमने दिए हों तो भले लगते हैं
चोट जब दिल पे लगी हो तो मज़ा देती है

दिन तो पलकों पे कई ख्वाब सज़ा देता है
रात आँखों को समंदर का पता देती है
वाह नीरज जी !! बहुत बहुत शुक्रिया आपका। एक अनूठे शायर से रूबरू कराया आपने। मैंने इरशाद भाई को पहले नही पढ़ा था कभी। आज आपकी इस प्रस्तुति से एक उम्दा शायर को जान पाया।
गंगा शरण सिंह
मुम्बई

तिलक राज कपूर said...

दहलीज़ मेरे घर की अंधेरों से अट न जाय 

पागल हवा चराग़ से आकर लिपट न जाय 


हमसाये चाहते हैं मिरे घर को फूंकना 

और ये भी चाहते हैं घर उनके लपट न जाय


पा ही गया मैं इश्क़ के मकतब में दाखिला 

दुनिया संभल, कि तुझसे मिरा जी उचट न जाय 

आज की पोस्ट में मात्र आरंभिक शेर पढ़कर भी इरशाद ने जिन बुलंदियों को छूना है उनका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इस उम्र में शायरी की आत्मा से रू-ब-रू होना और इस स्तर के शेर कहना कि एक अनुभवी शायर का अहसास दें।
वाह वाह और वाह।

Kunwar Kusumesh said...

इरशाद जी के अशआर पहली बार मेरी नज़र से गुज़र रहे हैं.... बड़ी सादगी से अपने बात कहने का हुनर है उनमे....बहुत प्यारे अशआर लगे मुझे.....अल्लाह उन्हें सुखी रक्खे और ऐसे ही कामयाबी की सीढ़ियाँ चढ़ते जायें ,यही दुआ है।

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

फिर उसके बाद सोच की, बाकी बचेगा क्या ।
तू सिर्फ, कृष्ण भक्ति से, रसखान काट दे । लाजवाब सोच
महफ़िल की शक्ल आपने देखि है, उस घडी।
दानां की बात जब कोई नादान काट दे ।। वाह
वहाँ पर, ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी थी ।
उसे कूचे में, मरणा चाहिए था ।।बहुत खूबसूरत
किस किस शेर का ज़िक्र करूँ, हर शेर बाकमाल नजरिया लिए हुए है । बहुत खूब सोच के मालिक जनाब इरशाद साहिब को मेरी तरफ से ढेरों दाद पेश है । क्या इनका कोई ऑनलाइन सन्दर्भ है ताकि इन्हें और पढ़ा जा सके ।
नीरज जी आपने इनसे मुलाक़ात करवा के मुझ पर तो एहसान ही किया है । मैं आपका शुक्रगुजार हूँ ।

शशि मेहरा
पंजाब

Unknown said...

मेरा पसंदीदा शे'र..

उन इलाक़ों में क्या रहा साहब,
जिन इलाक़ों में शाइरी न रही !

इस ख़ूबसूरत किताब पर लिखने का लंबे वक़्त से मन है..देखें कब हो पाता है.

इरशाद भाई के बारे में क्या कहूं !बेहद प्यारे इंसान..ख़ूबसूरत शाइर.

बकुल देव

dsangep said...

परिचित (known) और कम परिचित (lesser known) शायरों की शायरी से लोगों को अवगत अवगत कराने का आपका निरंतर प्रयास प्रशंसनीय है जिसके लिए आप को बधाई. इरशाद जी की कुछ रचनाएँ मैंने एक अलग ब्लॉग पर हाल ही में पढ़ी थी. जिसमे से एक एक ग़ज़ल शायरी के प्रेमियों के लिए प्रस्तुत करना चाहता हूँ. आशा है सब को पसंद आएगी.

इरशाद खान 'सिकंदर'
बंद दरवाज़े खुले रूह में दाख़िल हुआ मैं
चंद सज्दों से तिरी ज़ात में शामिल हुआ मैं
खींच लायी है मुहब्बत तिरे दर पर मुझको
इतनी आसानी से वर्ना किसे हासिल हुआ मैं
मुद्दतों आँखें वुज़ू करती रहीं अश्कों से
तब कहीं जाके तिरी दीद के क़ाबिल हुआ मैं
जब तिरे पांव की आहट मिरी जानिब आई
सर से पा तक मुझे उस वक्त लगा दिल हुआ मैं
जब मैं आया था जहां में तो बहुत आलिम था
जितनी तालीम मिली उतना ही जाहिल हुआ मैं
फूल से ज़ख्म की खुशबू से मुअत्तर ग़ज़लें
लुत्फ़ देने लगीं और दर्द से ग़ाफ़िल हुआ मैं
मोजिज़े इश्क़ दिखाता है ’सिकंदर’साहब
चोट तो उसको लगी देखिये चोटिल हुआ मैं ... इरशाद खान ‘सिकंदर’

नीरज गोस्वामी said...

इरशाद जी के जो शेर इस समीक्षा में पढ़े उससे मुझे वो आसमान दिख गया जो वो आसानी से छू लेते हैं। 1983 में जन्में शायर का शेर कहने का तरीका एक उम्रदराज़ शायर जैसा परिपक्व है। इरशाद जी आपका मुकाम बहुत आगे है , यूँ ही मेहनत करते रहें।

आतिश इंदौरी
+91 9406630247

नीरज गोस्वामी said...

चन्द अशआर पढ़कर महसूस हुआ कि इरशाद खान सिकंदर बाकमाल शायर हैं। उनके पास फ़िक्र है, नजरिया है और सलीका है. इस दौर में अच्छे उस्ताद बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। इस मामले में इरशाद भाई खुशकिस्मत हैं। मेरी दुआ है कि वो इसीतरह कामयाबी का सफर तय करते रहें

देवमणि पांडेय
मुंबई

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

मैं चराग़ से जला चराग़ हूँ
रौशनी है पेशा खानदान का
इरशाद भाई का ये शेर कितना सच्चा है। रौशनी रौशनी है इस शख़्स में इस किताब में। आप के लम्स ने चमक में और रंग भर दिए हैं। लगता है सिर्फ़ आप के ब्लॉग पे आने के लिए अपनी किताब देवनागरी में लानी होगी। :)


स्वप्निल तिवारी
मुंबई

alam khurshid said...

जीवन की विद्रूपता से उपजी हुई स्वाभाविक, सहज, सच्ची और अच्छी शायरी है इरशाद की शायरी !
शायर को शेर कहने के लिए कोशिश नहीं करनी पड़ती बल्कि अशआर उस से खुद को कहलवा लेते हैं . इसी लिए लहजे में बला की बरजस्तगी पाई जाती है. इरशाद के लिए ढेरों दुआएं
आप की पारखी नज़र ने बिला शुबहा एक अच्छे शायर को पहचाना है और इसीलिए आप की समीक्षा भी अपनी खूबसूरती के लिए ढेरों दाद चाहती है .

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...


इरशादखान सिकंदर साहब की गज़लें
ज़िंदगी के उजालों के पैग़म्बर ग़ज़लें हैँ।
रौशनी ही रौशनी, ज़िंदगी ही ज़िंदगी है उनके यहाँ।

वहाँ पर ज़िन्दगी ही ज़िंदगी थी
उसी कूचे में मरना चाहिए था।

और

तज़किरा तो छोड़ दो थकान का

क्या बात है बहुत ख़ूब।

मैं मुरीद हूँ उनका,उनकी शायरी का
और
आप जैसे गोहर शनास का भी।

हर शे'र हमेशा के लिए ज़बानज़द होने की खूबसूरत सलाहियत रखता है।

ज़िंदाबाद शायरी के लिए इरशाद भाई को और ज़िंदाबाद अंदाज़ में उसका ज़िक्र करने के लिए आपको बहुत बहुत मुबारकबाद भी और ढेरों दाद भी|

नीरज गोस्वामी said...

RECEIVED ON Fb :-

बेशक इरशाद ख़ान सिकन्दर हमारी पीढ़ी के महत्त्वपूर्ण शायर हैं। शायर के साथ-साथ एक बेहतर इंसान होना सोने पे सुहागा। आपकी blog पर जाके मैंने समीक्षा पढ़ी। आप जिस तरह से पुस्तक समीक्षाएं लिखकर पाठकों को किताबों की तरफ़ आकृष्ट करते हैं वो दुहरे फ़ायदे की कोशिश है। इस सिलसिले में आपकी किताब भी अपने आप में एक उदाहरण है। इरशाद भाई को बधाई और आपको भी।

Deepak Ruhani
LUCKNOW

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

Mujhe umeed hi nahin ab yaqeen bhi hai umeed to usi din bandh gayi thi jab pehli baar bhai Tufail Chaturvaidi ke yaha'n ek adabi nashisht mein suna
Kal teri tasveer mukammal ki main ne
Foran us per titli aa kar baith gayi.....

Aaj jab us ki kitaab Ansuo'n ka tarjuma meri mez per hai to mujhe chaahiye ke muhabbat ke saath padho'n jald hi apni raay ka izhaar karo'n ga deir ki to dusri kitaab aa jaaye gi jis Raftaar se us ne ye safar tai kiya ye mumkin ho sakta hai.. Irshad Khan Sikandar ne aaj ke insaan ki nabz per haath rakh diya hai Un ke un kahey dukh dard ko sun raha hai aur apni zabaan (jo Urdu Hindi ka aameza hai) mein nayi shayri ke supurd kar raha hai us ki kitaab Achhey logo'n tak punhchey aur sachhi aara us tak punhche;n Rauf Raza ... Khoob duaaye'n

Rauf Raza

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

Sabse pahle to bhai Irshad Khan Sikandar ko mubarakbaad
Neeraj bhai ka likha maiN pahle bhi padhta raha hooN ..un ke likhe meiN sab se achchi baat ye hai k wo aik qaari ki imaandaar raaye ya pratikriya hai ....jaisa paaya waisa kaha .....

Kitaab kyuN ki maiN ne padhi nahiN hai ..is liye us par kuch keh pana mumkin nahiN .
Neeraj Goswamy sb ne ba khubi jaayaza liya hai ...mubarakbaa


Aadil Raza Mansoori
Jaipur

नीरज गोस्वामी said...

Received on Mail:-


Neeraj Bhai kya kamaal ke shayar se tarruf karvaya hai aapne. Ghazab ke sher kehne wala ye shayar yun hi kehta rahe ye hi dua karta hoon.
Aap ka bemisaal andaaz-e-bayan aur Irshad ki khoobsurat shayri ne is post ko yaadgaar bana diya hai .
Bahut bahut mubarakbaad aap dono ko .

Chand Shukla haidiyabadi
Denmark

नीरज गोस्वामी said...

Received on mail :-

Neeraj Bhai maza aagaya Irshad bhai ki shayri padh kar ...Lajawab shayri, bemisaal sher. Aapki post ka isiliye to intezaar karte hain , hamesha ki tarah aapne ghazab ke shayar aur uski shayri se parichay karvaya hai.

Hamara poora group aapka tahedil se ehsaanmand hai, aapki badaulat hum jaise vatan se itni door baithe shayri ke divaane ye sab padh pa rahe hain.
Duaon ke saath

Rahul

Newzealand

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

Achchhi kitab hai mai padh chuka hu mobarakbad

Shakeel Azmi
Mumbai

Ankit Joshi said...

इरशाद भाई को जबसे पढ़ना शुरू किया है, तब ही से उनका मुरीद हूँ। वो अपनी ग़ज़लों में हर रंग समेटे हुए हैं, और कुछ शेर तो ऐसे कहे हैं जो आने वाले वक़्त में मुहावरे बन जाएंगे।

नीरज गोस्वामी said...

received on WhatsApp:-


एक बहुत पुराना माकूला है। "बाअदब बानसीब बेअदब बेनसीब " ये माकूला इरशाद खान सिकंदर पर खरा उतरता है। इरशाद के मिज़ाज़ में अथाह सहार है, नतीजन वो अपने बड़ों से खातिरखाह इल्म इस तरह से खुद में समो लेते हैं, जिस तरह तितली फूल से रस उठा लेती है। लगातार की इस सलीकामन्दी ने इरशाद की शायरी को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है कि नज़्म और नस्र फर्क नहीं रह गया है। जिस तरह चाबुकदस्ती से इरशाद मफ़हूम को अशआर में तब्दील करते हैं, वो उस्तादों का ही हिस्सा है। उन्हें फरिगुल-इस्लाह हुए ज़माना हुआ ओर अब तो वो खुद कई अच्छा कहने वाले शागिर्दों की तरबियत कर रहे हैं. उन सभी शागिर्दों की शायरी अहसास कराती है कि हज़रते-मुसहफ़ी का आँगन उनके सबब जगमगाता रहेगा।

तुफैल चतुर्वेदी

प्रदीप कांत said...

जिस्म दरिया का थरथराया है
हमने पानी से सर उठाया है

अब मैं ज़ख्मों को फूल कहता हूँ
फ़न ये मुश्किल से हाथ आया है

वाह
क्या ग़ज़लें हैं भाई

वाह

नीरज गोस्वामी said...

बहुत सुंदर

रमेश कँवल
पटना

Onkar said...

बहुत गहरे शेर

सज्जन धर्मेन्द्र said...

इरशाद बहुत अच्छे शायर हैं। इनको बहुत दिनों से पढ़ रहा हूँ। अच्छी समीक्षा की है आपने। बधाई स्वीकार कीजिए।

सज्जन धर्मेन्द्र said...

इरशाद बहुत अच्छे शायर हैं। इनको बहुत दिनों से पढ़ रहा हूँ। अच्छी समीक्षा की है आपने। बधाई स्वीकार कीजिए।

nakul gautam said...

तुम्हें जिस पर हंसी आई मुसलसल
वो जुमला तो अखरना चाहिए था

वहां पर ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी थी
उसी कूचे में मरना चाहिए था

किसी की मुस्कराहट छीन बैठे
सलीक़े से मुकरना चाहिए था

समझ आया है ये बीनाई खो कर
उजालों से भी डरना चाहिए था

Irshaad भाई का मैं बहुत बड़ा fan हूँ
उनकी शायरी एक सच्ची शायरी लगती है और हम जैसे नौसिखियों के लिए एक text book की तरह है।

मैं उनका शुभचिंतक हूँ। इस कामयाब पुस्तक के लिए इरशाद जी को बहुत बहुत।बधाई।

नकुल