Monday, November 20, 2017

किताबों की दुनिया -152

अक्सर देखा गया है कि शायर सामाजिक जिम्मेवारियों को दरकिनार कर इश्क-मुश्क की रंगीन मिज़ाजी शायरी करते हुए मदमस्तियों और मौजों में अपनी ज़िन्दगी तमाम कर देते हैं और खो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इश्क-मुश्क या रंगीन मिज़ाजियाँ ज़िन्दगी की जरूरतें नहीं, हैं, लेकिन इनके इतर भी बहुत कुछ है जिस पर भी साथ साथ लिखा जाना चाहिए , जो लिखते हैं वो ही मुकम्मल शायर कहलाते हैं और बरसों बरस अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहते हैं। किसी भी शायर या रचनाकार को अपनी सामाजिक जिम्मेवारिओं को दर-किनार नहीं करना चाहिए बल्कि पूरी तरह निभाना चाहिए।

तबाही और होती है - तमाशा और होता है 
नगर कब से जलाया जा रहा है फिर खड़े क्यों हो 

मुसीबत कब तलक झेलोगे तुम दुःख झेलने वालों 
बग़ावत का तो वक़्त अब आ गया है फिर खड़े क्यों हो 

जो तूफ़ां से बचा कर तुम को लाया अपनी कश्ती में 
तुम्हारे सामने वो डूबता है फिर खड़े क्यों हो 

हमारे आज के शायर हसीं ख्वाबों को देखने वाले रचनाकार नहीं बल्कि एक खूबसूरत मानवीय ज़िन्दगी की रचना का ताना-बाना बुनने वाले संवेदनशील शायर हैं जो अपनी बात निहायत सादगी और सीधेपन से करते हैं। आज की पीढ़ी के लिए उनका नाम शायद अब जाना पहचाना न हो लेकिन एक समय था जब उनको हरियाणा,पंजाब और दिल्ली के मुशायरों, गोष्ठियों और नशिस्तों में बहुत आदर के साथ बुलाया जाता था।

इक तस्वीर के हट जाने से कैसा रूप बदल जाता है 
कितना बे-रौनक लगता है इतनी रौनक वाला कमरा 

जाने किस दिन आकर कोई एक महक सी छोड़ गया था
हर मौसम में रहता है अब कितना महका-महका कमरा 

रख जाता है तस्वीरों को जाने किस अंदाज़ से कोई 
कैसे रंगों से भर जाता है, खाली-खाली सा कमरा 

हरियाणा के रोहतक जिले के लाखनमाजरा गांव में अप्रैल 1933 को जन्में हमारे आज के तरक्की पसंद शायर हैं जनाब "बलबीर सिंह राठी" जिनकी रचनाओं को किताब की शक्ल में चयनित किया है डा. ओमप्रकाश करुणेश जी ने "बलबीर राठी की चुनिंदा ग़ज़लेँ व नज़्में " शीर्षक से। ये किताब 'आधार प्रकाशन -पंचकूला (हरियाणा) से सं 2010 में प्रकाशित हुई थी। इस किताब में राठी जी की 110 ग़ज़लें, 10 कतआत और 31 नज़्में शामिल है। इस किताब के माध्यम से हम बलबीर जी के रचना संसार को अच्छी तरह से समझ सकते हैं :


झूट से मरऊब होकर हम बहक जाते हैं वरना 
सच अभी कायम है यारों लोग सच्चे भी बहुत हैं 
मरऊब =रौब में आना 

क्यों बुरा होने की तोहमत धर रहे हो हर किसी पर 
हमने देखा है यहाँ तो लोग अच्छे भी बहुत हैं 

यूँ अगर देखें तो दुनिया खूबसूरत भी बहुत है 
बदनुमा इस को मगर हम लोग करते भी बहुत हैं 

राठी साहब बातचीत के लहज़े में पूरी सादगी से अपने पाठकों से संवाद करते हैं। वे जटिल संकेतों , उलझे हुए बिम्बों-दृश्यों, रूपकों,प्रतीकों से अपनी बात कहने में परहेज बरतते हैं. गहरी-से-गहरी बातें सादे और साफ़ ढंग से करना उनकी रचनाओं की फितरत है। उनकी ग़ज़लें जिस सरलता से अपना मुकाम हासिल करती है वो कबीले तारीफ़ है। वो दिल की जुबान में बोलते हैं आँखों की खिड़कियों को खुला रखते हैं और हर तरफ चौकस निगाहें डालते हैं। उनकी जद्द से कोई भी नहीं बचता ,यहाँ तक कि वे खुद को भी लपेट लेते हैं।

जुगनुओं ने आज माँगा है उजालों का हिसाब 
ये बताओ , उनको सूरज का पता किस ने दिया 

रंजो-ग़म तो ख़ूब हमको उस ख़ुदा ने दे दिए 
इतना पत्थर दिल मगर हम को खुदा किसने दिया 

कारवां को रोक लेता है वो हर इक मोड़ पर 
हम को घबराया हुआ ये रहनुमा किसने दिया 

बलबीर जी सं 1950 से साहित्य सृजन में जुट गए , मूल रूप से उर्दू में लेखन 'प्रताप' और 'मिलाप' जैसी उच्च स्तरीय पत्रिकाओं से प्रारम्भ किया। ग़ज़ल लेखन से ख्याति अर्जित की। उनके अजीज दोस्त,डा हरिवंश अनेजा उर्फ़ 'जमाल कायमी ' जो सं 2008 से "दरवेश भारती" के नाम से लिखते हैं और 'ग़ज़ल के बहाने " पत्रिका निकालते हैं,ने उनपर हुई बातचीत में बताया कि "राठी बहुत संकोची और सरल स्वभाव के व्यक्ति हैं , मैंने ही उनकी रचनाओं को सब से पहले रोहतक शहर की साप्ताहिक और मासिक पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजा। मैं उन्हें अपनी साईकिल पर बिठा कर शहर में जहाँ कहीं कोई नशिस्त होती वहां ले जाता। उस वक्त राठी जी जाट कालेज रोहतक में पढ़ाते थे।उनकी झिझक मिटाने के लिए मैंने पत्रकारों को एक कवि सम्मलेन के लिए मनाया और राठी साहब को शायरे-ख़सूसी की हैसियत से बुलाया। रोहतक में उनकी प्रसिद्धि के लिए मैंने अपने और उनके चुनिंदा कलाम को 'ज़ज़्बात' नाम से एक किताब की शक्ल में छपवाया। इस किताब के मंज़र-ऐ-आम पर आने के बाद राठी जी का नाम बतौर शायर लिया जाने लगा।"
आज के इस दौर में जहाँ लोग एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं और पूरा प्रयास करते हैं कि कोई दूसरा शायर उनसे आगे न जा पाए 'दरवेश भारती जी द्वारा अपने साथी शायर को प्रसिद्धि दिलाने को किये गए ये प्रयास किसी अजूबे से कम नहीं। ऐसे सच्चे और खरे लोग अब ढूंढें नहीं मिलते।

यही खुशफ़हमियाँ मुझ को यहाँ तक खींच लाईं
तुम्हारे शहर में अब तक वही मन्ज़र मिलेँगे

न मंज़िल की खबर जिनको न राहों का पता है 
जिधर भी जाओगे तुमको वही रहबर मिलेंगे 

चले आना किसी दिन उसको अपना घर समझ कर 
तुम्हारे सब पुराने ख्वाब मेरे घर मिलेंगे 

दिल्ली के ज़दीद शायरी के लिए मशहूर शायर जनाब 'राजेंद्र मनचंदा " बानी" ने इस किताब में राठी जी के लिए लिखा है कि "राठी के पूरे कलाम से सच्ची शायरी की खुशबू आती है। मैं उनके शे 'अरों की तशतर आमेज़ सादगी से घायल हुआ हूँ। सच कह रहा हूँ कि ऐसा लहजा काश मुझे नसीब होता " .'बानी' साहब जिनके प्रशंकों में डा. गोपी चंद नारंग साहब का नाम भी शामिल है , दिल्ली में एक मासिक पत्रिका 'तलाश" निकालते थे जिसमें  ग़ज़ल का छपना किसी भी शायर के लिए फ़क्र की बात हुआ करती थी. दरवेश भारती जी के प्रयास से 'बानी" साहब ने अपनी पत्रिका में राठी जी ग़ज़लों को विशेष जगह दी। धीरे धीरे डा. दरवेश भारती , मनचंदा बानी , मख्मूर सईदी, अमीक हनफ़ी और सलाम मछली शहरी जैसे शायरों के साथ राठी जी को गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा। दरवेश भारती जी के कारण ही उनके रिश्ते नरेश कुमार 'शाद' साहब के साथ मजबूत हुए। अपनी जनवादी सोच के कारण राठी साहब ने अपनी अलग पहचान बनाई।

छेड़ न किस्से अब वुसअत के दीवारों की बातें कर 
बस्ती में सब सौदागर हैं, बाज़ारों की बातें कर 
वुसअत=फैलाव 

दिल वालों के किस्से आखिर तेरे किस काम आएंगे
ख़ुदग़रज़ों की , अय्यारों की, मक्कारों की बातें कर 

लोग जो पत्थर फेंक रहे हैं इस पे खफ़ा क्यों होता है 
किस ने कहा था वीरानों में गुलज़ारों की बातें कर 

राठी साहब किस्मत वाले हैं तभी उन्हें डा.दरवेश भारती जैसे दोस्त , महावीर सिंह 'दुखी', डा.सुभाष चंद्र -रीडर, हिंदी विभाग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और डा.ओमप्रकाश करुणेश जैसे प्रशंसक मिले जिन्होंने न केवल उनकी उर्दू रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाने में अहम् भूमिका भी निभाई। मशहूर शायर स्व. जनाब नरेश कुमार 'शाद' साहब ने राठी साहब के कलाम के बारे में कहा है कि " बलबीर राठी के लबो-लहजे में बड़ा ख़ुशगवार और सेहतमंद रसीलापन है और इस रसीले पन के परदे से जब इनके समाजी शऊर का नूर छान-छनकर आता है तो इसकी ज़ात में छिपी हुई शे'अरी सलाहतों का ऐतराफ़ करते ही बनती है।"

मेरे पीछे सूनी राहें और मेरे आगे चौराहा 
मैं ही मंज़िल का दीवाना मुझको ही रोके चौराहा 

हर कोई अपनी मंज़िल के ख्वाब सजा कर तो चलता है 
क्या कर ले जब वक्त किसी के रस्ते में रख दे चौराहा 

जिन दीवानो के क़दमों में मंज़िल अपनी राह बिछा दे 
'राठी' ऐसे दीवानों को खुद रास्ता दे दे चौराहा 

राठी साहब के पहले ग़ज़ल संग्रह " क़तरा-क़तरा" को भाषा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रथम पुरूस्कार दिया गया था जबकि उनके दूसरे ग़ज़ल संग्रह "लहर-लहर" को सन 1992-93 में उर्दू अकादमी हरियाणा सरकार ने पुरुस्कृत किया। उन्हें हरियाणा और दूसरे प्रदेशों में वहां की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। राठी जी का असली सम्मान तो उनके लाखों मेहनतकश पाठकों श्रोताओं ने किया है जिन्होंने उनकी ग़ज़लों नज़्मों के माध्यम से एक मुकम्मल ज़िन्दगी को जीने का हुनर सीखा है और सीखा है कि किसतरह निराशा के काले घटाघोप अँधेरे से आशा के उजाले की और बढ़ना चाहिए किसतरह अपने हक़ के लिए लड़ना चाहिए और किसतरह अपनी मंज़िल का रस्ता खुद तलाशना चाहिए .
किताब की प्राप्ति के लिए जैसा ऊपर बताया है आप आधार प्रकाशन को उनके पते "आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिट , एस.सी.एफ. 267,सेक्टर -16 पंचकुला -134113 (हरियाणा) को लिखें या वहां से ऑन लाइन मंगवाए या उन्हें aadhar_prakashan@yahoo.com पर इ-मेल करें।
"राठी जी " को उम्र के इस दौर में सुनाई नहीं देता इसलिए उनका मोबाईल नम्बर यहाँ नहीं दे रहा अलबत्ता अगर उनके बारे में कुछ कहना सुनना चाहें तो उनके अज़ीज़ दोस्त "दरवेश भारती " जी से उनके मोबाईल नंबर 9268798930 पर संपर्क कर सकते हैं.
अगली किताब की खोज से पहले प्रस्तुत हैं उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर :

गुज़र तो हो ही जाती है संभल कर चलने वालों की 
मगर फिर ज़िन्दगी में ज़िन्दगी बाकी नहीं रहती 

तुम्हें अच्छी नहीं लगतीं मेरी बेबाकियाँ लेकिन 
तक़ल्लुफ़ में भी अक्सर दोस्ती बाकी नहीं रहती 

कई लम्हात ऐसे भी तो आते हैं मोहब्बत में 
कि दिल में दर्द , आँखों में नमी बाकी नहीं रहती

Monday, November 13, 2017

किताबों की दुनिया -151

जो लोग बनारस में रहते हैं वो बनारस का गुणगान क्यों करते हैं ,ये बात अभी हाल ही में संपन्न बनारस यात्रा के बाद ही पता लगी। हालाँकि बनारस में हमारा सामना भीड़, धूल ,गर्मी, उमस ,पसीना ,गन्दगी और प्रदूषण जैसी अनेकों विपदाओं से रोज ही हुआ और उस पर ऊबड़खाबड़ टूटी फूटी जगह जगह खुदी सड़कों पर उछलते कूदते ऑटो ने शरीर में मौजूद सभी अंगों को झुनझुने सा बजा कर कोढ़ में खाज का काम किया लेकिन पता नहीं क्यों मन कर रहा है कि एक बार फिर से वहाँ जाया जाए , वहां क्यों जाया जाय इसका कोई संतोष जनक जवाब नहीं है मेरे पास बस जाया जाए ये मन कर रहा है। कुछ तो है जो आपको अपने मोहपाश में बांध लेता है , कुछ तो है जो हमारे आज के शायर से ये लिखवाता है :

मैं बनारस का निवासी काशी नगरी का फ़क़ीर
हिन्द का शायर हूँ ,शिव की राजधानी का सफ़ीर 

लेके अपनी गोद में गंगा ने पाला है मुझे 
नाम है मेरा नज़ीर और मेरी नगरी बेनज़ीर 

शायरी से मोहब्बत करने वाले मेरे जैसे जिनके बाल सफ़ेद चुके हैं या हो रहे हैं शायद इस मुक्तक से शायर के नाम तक पहुँच जाएँ लेकिन युवा पाठकों के लिए उनका नाम पता करना आसान नहीं होगा क्यूंकि वो फेसबुक या ट्वीटर पर सक्रिय होने की सम्भावना से परे जा चुके हैं। उनकी शायरी को जन-जन तक फैलाने वाला कोई ग्रुप भी किसी सोशल मिडिया पर उपस्थित नहीं है वरना गंगा पर उनकी एक लम्बी रचना की ये पंक्तियाँ आपको याद रहतीं :

मिला है गंगा का जल जो निर्मल ,उतरके उषा नहा रही है 
हवा है या रागिनी है कोई ,टहलके वीणा बजा रही है 
अँधेरे करते हैं साफ़ रस्ता ,सवारी सूरज की आ रही है
किरण-किरण अब कलश-कलश को सुनहरी माला पिन्हा रही है 

हुई है कितनी हसीन घटना नज़र की दुनिया संवर रही है 
किरण चढ़ी थी जो बन के माला वो धूप बन कर उतर रही है 

सबसे दुखद बात ये है कि जिस शायर ने बनारस में बहने वाली गंगा की ख़ूबसूरती का इस तरह बखान किया है उसी शायर को अपने ही जीवन काल में इसी गंगा के प्रदूषण पर ऐसी बात भी लिखनी पड़ी जिसे लिखते वक्त उसके दिल पर न जाने क्या गुज़री होगी.

डरता हूँ रुक न जाए कविता की बहती धारा 
मैली है जबसे गंगा , मैला है मन हमारा 

कब्ज़ा है आज इसपर भैंसों की गन्दगी का 
स्नान करने वालो जिस पर है हक़ तुम्हारा 

किस आईने में देखें मुंह अपना चाँद-तारे 
गंगा का सारा जल हो जब गन्दगी का मारा 

बूढ़े हैं हम तो जल्दी लग जायेंगे किनारे 
सोचो तुम्हीं जवानो क्या फ़र्ज़ है तुम्हारा 

हमारे शायर ने गंगा की स्वच्छता की बात आज के सरकारी "स्वच्छता अभियान" के शुरू होने के 25-30 साल पहले ही छेड़ दी थी ,अगर उनकी बात पर तब ध्यान दिया जाता तो आज गंगा का जल निर्मल होता। शायर वही होता है जो अवाम को चेताये झकझोरे सोते से उठाये और ये काम हमारे आज के शायर ने भरपूर किया। प्रदूषण ,फ़िरक़ापरस्ती ,आतंकवाद के साथ साथ उन्होंने समाज की हर बुराई पर कलम चलाई।

बाज़ार के हर शीशे को दर्पण नहीं कहते 
बिन प्यार के दीदार को दर्शन नहीं कहते 
उपवन से परे पुष्प को उपवन नहीं कहते 
गुलशन से अलग फूल को गुलशन नहीं कहते 

राहत भी उठाएंगे मुसीबत भी सहेंगे 
सब अहद करें आज कि हम एक रहेंगे 

हमारे आज के शायर का कविता शायरी की दुनिया में उर्दूमुखी हिंदी और हिंदीमुखी उर्दू के अकेले कवि के रूप में सबसे अधिक जाना हुआ और ग़ज़ल, रुबाई और कविताओं के क्षेत्र में भाषा और रचना की बारीकियों के लिए चर्चित ,नाम है और एक ऐसा नाम जो साहित्यिक दुनिया में भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है। अब चूँकि आज के शायर का मिज़ाज़ ग़ज़ल का है इसलिए उनकी ग़ज़लों के अलग अलग रंगों से आपको रूबरू करवाने का इरादा है ,लिहाज़ा पोस्ट अगर लम्बी हो जाय तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा और इसे तभी पढियेगा जब आपके पास फुरसत हो।

मैं हूँ और घर की उदासी है ,सुकूते शाम है 
ज़िन्दगी ये है तो आखिर मौत किसका नाम है 
सुकूते शाम =सन्नाटा भरी शाम 

मेरी हर लग़ज़िश में थे तुम भी बराबर के शरीक़ 
बन्दा परवर सिर्फ़ बन्दे ही पे क्यों इलज़ाम है 
लग़ज़िश =ग़लती 

ख़ुशनसीबी ये कि ख़त से ख़ैरियत पूछी गयी 
बदनसीबी ये कि ख़त भी दूसरे के नाम है 

जिस प्रकार गौतम बुद्ध को ये ज्ञान हुआ था कि वीणा के तार इतने भी नहीं कसने चाहियें कि वो टूट जाएँ और इतने ढीले भी नहीं छोड़ने चाहियें कि उनमें से संगीत ही न निकले उसी तरह मुझे भी अभी ये ज्ञान हुआ कि पोस्ट में शायर के नाम को इतनी देर तक भी नहीं छुपाना चाहिए कि पाठक को उसका नाम जानने कि रूचि ही ख़तम हो जाय और न इतनी जल्दी बताना चाहिए कि पाठक की जिज्ञासा ही खतम हो जाय। समय आ गया है कि आपको बता दूँ कि हमारे आज के शायर हैं जनाब "नज़ीर बनारसी " जिनकी रचनाओं का संकलन पेपर बैक में राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ने "नज़ीर बनारसी की शायरी " के नाम से किया है। इस किताब का प्रकाशन सन 2010 में किया गया था। किताब का संपादन जनाब "मूलचंद सोनकर" साहब ने किया है जो स्वयं भी प्रसिद्ध शायर,कवि,समीक्षक और दलित चिंतक हैं।


परदे की तरह मुझको पड़ा रहने दीजिये
उठ जाऊँगा तो साफ़ नज़र आइयेगा आप

दर पर हवा की तरह से दीजेगा दस्तकें
कमरे में आहटों की तरह आइयेगा आप

मेरे लिए बहुत है ये ज़ादे सफ़र 'नज़ीर'
वो पूछते हैं लौट के कब आईयेगा आप
ज़ादे सफ़र=सफ़र का सामान 

नज़ीर बनारसी साहब की पैदाइश बनारस के एक मध्यवर्गीय परिवार में 25 नवम्बर 1909 को हुई। ये परिवार हक़ीमों का परिवार कहलाता था। 'नज़ीर' साहब के पिता, दादा, परदादा सभी हकीम थे। इनके बड़े भाई 'मुहम्मद यासीन' तिब्बिया कॉलेज लखनऊ के पढ़े हुए सुप्रसिद्ध हकीम होने के साथ ही साथ एक अच्छे शायर भी थे। नज़ीर साहब ने रूचि न होते हुए भी जबरदस्ती पढ़ते हुए उस्मानिया तिब्बिया कॉलेज से जैसे तैसे हकीम की डिग्री हासिल की। कहा जाता है कि नज़ीर साहब बहुत पढ़े लिखे नहीं थे, उनके पास किसी डिग्री का दुमछल्ला भी नहीं था उन्होंने जो सीखा अपने घरेलू माहौल से सीखा।

तिरि मौजूदगी में तेरी दुनिया कौन देखेगा 
तुझे मेले में सब देखेंगे मेला कौन देखेगा 

अदाए मस्त से बेख़ुद न कीजे सारी महफ़िल को 
तमाशाई न होंगे तो तमाशा कौन देखेगा 

मुझे बाज़ार की ऊँचाई-नीचाई से क्या मतलब
तिरे सौदे में सस्ता और महँगा कौन देखेगा 

तुम्हारी बात की ताईद करता हूँ मगर क़िब्ला 
अगर उक़्बा ही सब देखेंगे तो दुनिया कौन देखेगा 
उक़्बा =परलोक

'नज़ीर' आती है आने दो सफेदी अपने बालों पर 
जवानी तुमने देखी है बुढ़ापा कौन देखेगा 

नज़ीर साहब की प्रतिभा विलक्षण थी ,उन्होंने उस वक्त शायरी करनी शुरू की जिस वक्त उन्हें लिखना भी नहीं आता था। बचपन से ही वो श्रोता की हैसियत से शायरी की महफ़िलों में जाने लगे थे ,वहीँ उस्तादों को सुनते सुनते उनमें शेर कहने का सलीका आने लगा जिसे उनके ख़ालाज़ाद भाई 'बेताब' बनारसी ने उस्ताद की हैसियत से और संवारा। अपने शायराना मिज़ाज़ के चलते उन्होंने अपने शेर कहने के हुनर में इतनी महारत हासिल कर ली कि वो बिना किसी पूर्व तैयारी के हाथों हाथ महफिलों में शेर कहने लगे। उनकी एक ग़ज़ल के जरा ये शेर देखें और उनके हिंदी लफ़्ज़ों को बरतने के खूबसूरत ढंग पर दाँतों तले उँगलियाँ दबाएं :

है जो माखनचोर वो नटखट है हृदयचोर भी 
इक नज़र में लूट कर पूरी सभा ले जायेगा 

अपने दर पर तूने दी है जिसको सोने की जगह
वो तिरि आँखों से नींदें तक उड़ा ले जाएगा 

हद से आगे बढ़ के मत दो दान हो या दक्षिणा 
वरना तुमको वक्त का रावण उठा ले जायेगा 

सहज सरल बोधगम्य भाषा नज़ीर साहब की बहुत बड़ी विशेषता है। अगर उर्दू के सभी शायर नज़ीर की बनाई राह पर चलते तो शायद उर्दू को आज ये दिन ना देखने पड़ते। सहज सरल भाषा में शेर कहना आसान नहीं होता तभी अपनी कमज़ोरी को छुपाने के लिए शायर मुश्किल लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हैं। नज़ीर साहब की सबसे बड़ी खूबी उनकी हिंदी उर्दू की मिलीजुली भाषा है जो सुनने वाले को अपनी सी लगती है.

तुम हाल पूछते हो इनायत का शुक्रिया 
अच्छा अगर नहीं हूँ तो बीमार भी नहीं 

जो बेख़ता हों उनको फरिश्तों में दो जगह 
इंसान वो नहीं जो ख़तावार भी नहीं 

जीने से तंग आ गया हर आदमी मगर 
मरने के वास्ते कोई तैयार भी नहीं 

तेज तर्रार पत्रकार "भास्कर गुहा नियोगी " अपने ब्लॉग "भड़ास 4 मिडिया " में लिखते हैं कि "नज़ीर की शायरी उनकी कविताएं धरोहर है, हम सबके लिए। संकीर्ण विचारों की घेराबन्दी में लगातार फंसते जा रहे हम सभी के लिए नज़ीर की शायरी अंधरे में टार्च की रोशनी की तरह है, अगर हम हिन्दुस्तान को जानना चाहते है, तो हमे नज़ीर को जानना होगा, समझना होगा कि उम्र की झुर्रियों के बीच इस साधु, सूफी, दरवेश सरीखे शायर ने कैसे हिन्दुस्तान की साझी रवायतों को जिन्दा रखा। उसे पाला-पोसा, सहेजा। अब बारी हमारी है, कि हम उस साझी विरासत को कैसे और कितना आगे ले जा सकते है "

मिरे सर क़र्ज़ है कुछ ज़िन्दगी का 
नहीं तो मर चुका होता कभी का 

न जाने इस ज़माने के दरिंदे 
कहाँ से लाये चेहरा आदमी का 

क़ज़ा सर पर है लब पर नाम उनका 
यही लम्हा है हासिल ज़िन्दगी का 

वहां भी काम आती है मुहब्बत 
जहां कोई नहीं होता किसी का

 'नज़ीर' आती है बालों पर सफेदी 
सवेरा हो रहा है ज़िन्दगी का 

23 मार्च 1996 को दुनिया से रुखसत होने वाले नज़ीर साहब के कुल जमा छह काव्य संग्रह "गंगो जमन ", "जवाहर से लाल तक", ग़ुलामी से आज़ादी तक", "चेतना के स्वर", "किताबे ग़ज़ल " और "राष्ट्र की अमानत राष्ट्र के हवाले" मंज़र-ऐ-आम पर आये है , दुःख की बात है कि इन में से हिंदी में शायद ही कोई संग्रह उपलब्ध हो. हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए राजकमल प्रकाशन और सोनकर साहब के संयुक्त प्रयास का जिसकी बदौलत हमें नज़ीर साहब की चुनिंदा 51 लाजवाब ग़ज़लें और 36 नज़्में इस किताब के माध्यम से पढ़ने को मिल रही हैं।

दुनिया है इक पड़ाव मुसाफिर के वास्ते
इक रात सांस लेके चलेंगे यहाँ से हम

आवाज़ गुम है मस्जिदो-मंदिर के शोर में 
अब सोचते हैं उनको पुकारें कहाँ से हम 

है आये दिन 'नज़ीर' वफ़ा का मुतालबा 
तंग आ गए हैं रोज के इस इम्तिहाँ से हम
वफ़ा=निष्ठा , मुतालबा=मांग

इस किताब को आप अमेजन से ऑन लाइन तो मंगवा ही सकते हैं इसके अलावा राजकमल की साइट पर जाकर भी आर्डर कर सकते हैं। आपका कोई मित्र परिचित दिल्ली रहता हो तो वो आपको राजकमल प्रकाशन 1-बी नेताजी सुभाष मार्ग ,नयी दिल्ली से इसे ला कर भी दे सकता है। किताब का मूल्य इतना कम है कि जान कर आप हैरान हुए बिना नहीं रह पाएंगे। यूँ समझिये कि ये वो खज़ाना है जो सिर्फ 'खुल जा सिम सिम " बोलने मात्र से आप को हासिल हो सकता है. इस किताब की सभी रचनाएँ न केवल आज के सन्दर्भ में प्रासंगिक हैं बल्कि भविष्य के सन्दर्भों से भी संवाद करने में सक्षम हैं।
आप इस किताब को हासिल करने का कोई सा भी तरीका सोचें लेकिन मंगवा लें , अब मैं चलता हूँ उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर आपके हवाले करके किसी नयी किताब की तलाश में :

जाओ मगर इस आने को एहसाँ नहीं कहते 
जो दर्द बढ़ा दे उसे दरमाँ नहीं कहते 
दरमाँ=इलाज़ 

जो रौशनी पहुंचा न सके सबके घरों तक 
उस जश्न को हम जश्ने चराग़ाँ नहीं कहते 

हर रंग के गुल जिसमें दिखाई नहीं देते 
हम ऐसे गुलिस्तां को गुलिस्तां नहीं कहते

Monday, November 6, 2017

किताबों की दुनिया -150

तुमसे पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था 
उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यकीं था 

ये उस शायर का शेर है जिसके इंतकाल के 15 साल बाद याने 2008 की फरवरी के अंतिम सप्ताह में मुशर्रफ़ समर्थक पाकिस्तान मुस्लिम लीग की हार के बाद पेशावर से कराँची तक लाखों लोगों ने दोहराया। ये कालजयी शेर है जिसे किसी एक मुल्क की हदों में नहीं बाँधा जा सकता। ये शेर हर उस मुल्क के हुक्मरां पर लागू होता है जो सत्ता के नशे में अपने अवाम को भूल जाता है और एक दिन अर्श से फ़र्श पर औंधे मुँह आ गिरता है।जिस ग़ज़ल का ये शेर है उस ग़ज़ल के बाकी शेर भी इसी मिज़ाज़ के हैं ,गौर फरमाएं :

कोई ठहरा है जो लोगों के मुकाबिल तो बताओ 
वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था 

आज सोये हैं तरे-ख़ाक न जाने यहाँ कितने 
कोई शोला, कोई शबनम कोई मेहताब-जबीं था 
तरे-ख़ाक=ज़मीन के नीचे , मेहताब-जबीं=चाँद जैसे माथे वाला

ये वो शायर था जिसने अपनी शायरी ही नहीं, अपनी ज़िन्दगी भी अवाम के लिए वक़्फ़ कर दी थी और जो मरते मरते मर गया लेकिन न तो कैदो-बंद से उसके इरादे डाँवाडोल हुए और न ही तानाशाही के अत्याचार उसे अपनी राह से हटा सके। इस शायर ने बेख़ौफ़ हो कर अय्यूब खान,याह्या खान,ज़िआउल-हक़ और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकारों के खिलाफ लिखा। पाकिस्तान के 70 सालों के इतिहास में शायद ही कोई दूसरा ऐसा शायर होगा जिसने इतने बरस जेल की सलाखों के पीछे काटे,जितने कि इस शायर ने।

हर रोज़ क़यामत ढाते हैं तेरे बेबस इंसानों पर
ऐ ख़ालिक़े-इन्सां, तू समझा अपने खूनी इंसानों को 
ख़ालिक़े-इन्सां=इंसान के सृष्टा (खुदा )

दीवारों से सहमे बैठे हैं, क्या खूब मिली है आज़ादी 
अपनों ने बहाया खूं इतना, हम भूल गए बेगानों को 

 इक-इक पल हम पर भारी है ,दहशत तकदीर हमारी है 
घर में भी नहीं महफूज़ कोई , बाहर भी है खतरा जानों को 

 इस हर-दिल-अज़ीज़ और अवाम के मशहूर शायर का नाम था 'हबीब जालिब" जिनकी ग़ज़लों नज़्मों और गीतों के संकलन "प्रतिनिधि शायरी" श्रृंखला के अंतर्गत "राधा कृष्ण प्रकाशन " ने पेपर बैक में सन 2010 में प्रकाशित किया था। आज हम इसी किताब और इसके शायर की बात करेंगे जिसकी शायरी में ले-देकर कुल एक पात्र नज़र आता है और उस पात्र का नाम जनता है -सिर्फ पाकिस्तान की जनता नहीं, पूरे संसार की जनता। और ठीक यही वो जनता है जिसके हक़ में वे बार बार अपनी किताबें ज़ब्त कराते हैं और बार बार जेल जाते हैं।


और सब भूल गए हर्फ़े-सदाक़त लिखना 
रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना 
हर्फ़े-सदाक़त=सच्चाई का अक्षर 

लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना 
हमने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना 
ब-इजाज़त=किसी के आदेश पर 

न सिले की न सताइश की तमन्ना मुझको 
हक़ में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना 
सताइश=पुरस्कार 

हमने जो भूल के भी शह का क़सीदा न लिखा 
शायद आया इसी खूबी की बदौलत लिखना 
शह =बादशाह 

कुछ भी कहते हैं, कहें शह के मुसाहिब 'जालिब' 
रंग रखना यही अपना, इसी सूरत लिखना 

हबीब अहमद के नाम से 24 मार्च 1928 को होशियार पुर पंजाब में जन्में जालिब साहब अपनी किशोरावस्था और चढ़ती जवानी के दिनों में, मुस्लिम लीग के एक सरगर्म कार्यकर्ता रह चुके थे और उन्हें आशा थी कि पाकिस्तान के बनते ही मुस्लिम जनता के सारे दुःख-दर्द दूर हो जायेंगे और यही कारण था कि वो पाकिस्तान बनने के साथ ही याने 14 अगस्त 1947 को अपनी पैतृक धरती छोड़ कर इस नए देश में पहुँच गए। लेकिन फिर वहां जो कुछ उन्होंने देखा उससे उनका मोहभंग होते देर नहीं लगी- ठीक उसी तरह जैसे भारत में भी आज़ादी के बाद जल्द ही बहुत से वतनपरस्तों के सपने चूर-चूर होकर बिखर गए।

वतनपरस्तों को कह रहे हो वतन के दुश्मन,डरो ख़ुदा से  
जो आज हमसे ख़ता हुई है ,यही ख़ता कल सभी करेंगे 

वज़ीफ़ाख़्वारों से क्या शिकायत हज़ार दें शाह को दुआएं  
मदार जिनका है नौकरी पर, वो लोग तो नौकरी करेंगे 
वज़ीफ़ाख़्वारों=वज़ीफ़ा पाने वाले , मदार=निर्भरता 

लिए, जो फिरते हैं तमग़-ए-फ़न, रहे हैं जो हमख़याले-रहज़न 
हमारी आज़ादियों के दुश्मन हमारी क्या रहबरी करेंगे 
तमग़-ए-फ़न=कला का तमगा ,हमख़याले-रहज़न=लुटेरों की सोच वाले 

जालिब की शायरी सीधी दिल से निकली हुई शायरी है वो अपनी रचनाओं में बेहद आसान लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते थे उन्होंने इस बात का इज़हार अपने एक शेर में यूँ किया है :
जालिब मेरे शेर समझ में आ जाते हैं 
इसलिए कम-रुतबा शायर कहलाता हूँ 
दरअसल सच्चाई ये है कि सीधी-सादी भाषा को लोग घटियापन की अलामत मानते हैं। सदियों पहले दार्शनिक कुमारिल भट ने कहा था कि कुछ लोग मूढ़ता को छिपाने के लिए जान-बूझकर जटिल और दुरूह भाषा का प्रयोग करते हैं। लेकिन बात यहीं तक नहीं रहती , जो लोग 'मीर' की सीधी-सादी और दिल को छू लेनेवाली शायरी की दाद देते हैं और आहें भरते हैं वे भी अपने समकालीनों पर वैसे ही मानदंड लागू करने से इंकार करते हैं।

जिसकी आँखें ग़ज़ल, हर अदा शेर है 
वो मिरि शायरी है ,मिरा शे'र है 

अपने अंदाज़ में बात अपनी कहो
'मीर' का शे'र तो मीर का शे'र है 

मैं जहाने-अदब में अकेला नहीं 
हर क़दम पर मिरा हमनवा शे'र है 
जहाने-अदब=साहित्य का संसार, हमनवा=साथी 

इक क़यामत है 'जालिब' ये तनक़ीदे नौ 
जो समझ में न आये बड़ा शे'र है 
तनक़ीदे नौ=नयी आलोचना 

1959 की बात है अय्यूब खान को सत्ता हथियाये एक साल बीत चुका था इस एक साल के डिक्टेटरशिप वाले मिलेट्री शासन में हर सच बोलने वाले और शासक से अलग सोच वाले को जेल की दीवारों के पीछे बंद कर दिया गया था. सेंसरशिप लागू हो गयी थी। शायर, अय्यूब खान और मिलेट्री शासन के गीत गा रहे थे और तमाम अखबारें , रिसाले उसकी प्रशंशा में रँगे जा रहे थे। एक साल बीत जाने की ख़ुशी में पाकिस्तान रेडिओ से लाइव मुशायरा ब्रॉडकास्ट किया जा रहा था जिसमें सभी शायरों को महबूबा या देश की ख़ूबसूरती पर पढ़ने का फरमान जारी किया गया था। तभी एक दुबले पतले शायर ने सरकारी फरमान की धज्जियाँ उड़ाते हुए ये नज़्म पढ़ी जिसका एक बंद कुछ यूँ था :
बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा 
गौहर, सहगल, आदमजी 
बने हैं बिरला और टाटा 
मुल्क के दुश्मन कहलाते हैं 
जब हम करते हैं फ़रियाद 
सद्र अय्यूब ज़िन्दाबाद 
 फिर क्या था सन्नाटा छा गया ,वर्दीधारी सैनिकों के मुंह सफेद हो गए मुशायरा बीच में ही बंद कर दिया गया , रेडिओ स्टेशन के उच्च अधिकारी को फ़ौरन सस्पेंड कर दिया गया और शायर को जेल में बंद कर दिया , लेकिन जो होना था हो गया , लोगों की जबान पर "20 रुपैय्या मन आटा ,इस पर भी है सन्नाटा " चढ़ गया। ये शायर था "हबीब जालिब" जो सबक हुक्मरां उसे जेल भेज कर देना चाहते थे जालिब साहब ने उसका उल्टा ही समझा। जब जब वो जेल जाते बाहर आ कर दुगने जोश से सत्ता के ख़िलाफ़ लिखने लगते।

जीने की दुआ देने वाले ये राज़ तुझे मालूम नहीं 
तख़लीक़ का इक लम्हा है बहुत, बेकार जिए सौ साल तो क्या 
तख़लीक़ -रचना 

हर फूल के लब पर नाम मिरा, चर्चा है चमन में आम मिरा 
शोहरत की ये दौलत क्या कम है गर पास नहीं है माल तो क्या 

हमने जो किया महसूस , कहा ,जो दर्द मिला हंस हंस के सहा 
भूलेगा न मुस्तक़बिल हमको, नालां है, जो हमसे हाल तो क्या 
मुस्तकबिल=भविष्य , नालां =नाराज़ ,हाल =वर्तमान 

1964 में अचानक मोहतरमा फ़तिमाः जिन्ना ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के चुनाव में लड़ने का फैसला किया। अपने भाषणों में उन्होंने हबीब साहब की नज़्म "सद्र अय्यूब ज़िंदाबाद "को शुमार कर लिया। वो जीत भी जातीं लेकिन उनके खिलाफ सत्ता धारियों द्वारा रचे षड्यंत्र के चलते उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनके चुनाव हारते ही हबीब साहब पर सत्ता धारी गिद्ध की मानिंद टूट पड़े ,आये दिन उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। उनका पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया लेकिन हबीब जालिब , हबीब जालिब ही रहे जरा सा भी नहीं बदले।

दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है 
दोस्तों ने भी क्या कमी की है 

अपनी तो दास्ताँ है बस इतनी
ग़म उठाये हैं, शायरी की है 

अब नज़र में नहीं है एक ही फूल
फ़िक्र हमको कली कली की है 

 पा सकेंगे न उम्र भर जिसको 
जुस्तजू आज भी उसी की है 

हबीब साहब ने उस दौर में सत्ता धारियों से लोहा लिया जिस दौर में नासिर काज़मी और हफ़ीज़ जालंधरी जैसे शायर हुक्मरानो के कसीदे पढ़ रहे थे। सुना है कि एक बार पाकिस्तान के राष्ट्रकवि हफ़ीज़ साहब जब अपनी चमचमाती सरकारी कार से कहीं जा रहे थे तो उनको जालिब साहब फ़टे पुराने कपड़ों में राह पर चलते मिले उन्होंने कार रुकवाई और कहा की उन्होंने हुक्मरानों से बात कर ली है अगर वो अपना सुर बदल दें तो उनके भी वारे न्यारे हो सकते हैं ,हबीब साहब मुस्कुराये और आगे बढ़ गए। उन्होंने इस वाकये पर बिना हफ़ीज़ साहब का नाम लिए एक तन्ज़िया नज़्म "मुशीर " लिखी जिसका अर्थ होता है 'सलाहकार' जो आगे चल कर बहुत प्रसिद्ध हुई। ये नज़्म आपको इस संकलन में पढ़ने को मिलेगी , यहाँ नहीं।

लाख कहते रहें वो चाक गिरेबां न करूँ
कभी दीवाना भी पाबंद हुआ करता है

इज़्न से लिखने का फ़न हमको न अब तक आया
वही लिखते हैं जो दिल हमसे कहा करता है 
इज़्न =आदेश 

उसके ममनून ही हो जाते हैं दरपै उसके 
क्या बुरा करता है जो शख़्स भला करता है 
उसके ममनून ही हो जाते हैं दरपै उसके=उसके कृतज्ञ ही उसे कष्ट देने पर आमादा हो जाते हैं 

हबीब साहब जैसा खुद्दार शायर शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। उनकी बीमारी में एक बार बेनज़ीर भुट्टो उनकी मिजाज़पुर्सी को हॉस्पिटल तशरीफ़ लाईं तो उन्होंने किसी भी तरह की सरकारी मदद के लिए साफ़ मना कर दिया और कहा कि अगर आप को मदद ही करनी है मेरे इस वार्ड के और ऐसे ही दूसरे वार्डों के मरीज़ों की मदद करें जिनकी मदद को कोई नहीं है। मुल्क में हो रहे हर अन्याय के खिलाफ उन्होंने कलम उठाई। ये हरदिल अज़ीज़ शायर जब 12 मार्च 1993 को दुनिया से रुख़्सत हुआ तो पूरे शहर में इनकी मैय्यत को कांधा देने वालों में होड़ मच गयी और "शायरे अवाम हबीब जालिब ज़िंदाबाद " के नारों से फ़ज़ायें गूँज उठी।

बीत गया सावन का महीना ,मौसम ने नज़रें बदली 
लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आंसू बहते हैं 

एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इलज़ाम नहीं 
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं 

वो जो अभी इस राहगुज़र से चाक-गरेबाँ गुज़रा था 
उस आवारा दीवाने को जालिब-जालिब कहते हैं 

आखिर इस बेमिसाल शायर को पाकिस्तान की सरकार ने पहचाना और उन्हें 23 मार्च 2009 को पाकिस्तान का सर्वश्रेष्ठ सिविलियन अवार्ड दिया गया.हबीब साहब की शायरी का ये अनूठा संकलन हर इन्साफ पसंद इंसान के पास होना चाहिए। इस संकलन में जालिब साहब की 80 ग़ज़लें 65 नज़्में और 12 गीत हैं। ये सभी रचनाएँ बार बार पढ़ी जाने लायक हैं। उनकी बेजोड़ नज़्मों को पढ़े बिना हबीब साहब की शायरी को नहीं समझा जा सकता। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित ये किताब अमेजन पर भी उपलब्ध है और इसके 209 पेज वाले पेपरबैक संस्करण की कीमत इतनी कम है कि आप विशवास नहीं करेंगे।
चलते चलते हबीब साहब की एक छोटी सी नज़्म आपको पढ़वाता हूँ जो उन्होंने लता मंगेशकर पर ,हैदराबाद ,सिंध की दमघोटूं जेल में लिखी - कौन कहेगा ये एक पाकिस्तानी शायर की रचना है ? 

तेरे मधुर गीतों के सहारे 
बीते हैं दिन रैन हमारे 
तेरी अगर आवाज़ न होती 
बुझ जाती जीवन की ज्योति 
तेरे सच्चे सुर हैं ऐसे 
जैसे सूरज-चाँद-सितारे 

क्या क्या तूने गीत हैं गाये
सुर जब लागे मन झुक जाए 
तुमको सुनकर जी उठते हैं 
हम जैसे दुःख-दर्द के मारे 

मीरा तुझमें आन बसी है 
अंग वही है रंग वही है 
जग में तेरे दास हैं इतने 
जितने हैं आकाश में तारे 
तेरे मधुर गीतों के सहारे 
बीते हैं दिन रैन हमारे

Monday, October 30, 2017

किताबों की दुनिया -149

घिरती हुई है बाढ़ भी आँखों के गाँव में 
फैला हुआ चारों तरफ़ सूखा भी देखिये 

ये धूल के बादल भी छुएँ आसमान को 
मिटटी में ये रुला हुआ सोना भी देखिये 

बेमौसमी खिले हुए 'सुमन' भी हैं कई 
बेमौसमी ये रूप पिघलता भी देखिये 

16 नवम्बर 1942 को जन्में बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री लक्ष्मी खन्ना 'सुमन' हमारे आज के शायर हैं जिनकी किताब 'ग़ज़लों की नाव में ' की बात हम करेंगे। लक्ष्मी जी ये का ये पाँचवा ग़ज़ल संग्रह है जिसे 'हिन्द युग्म' प्रकाशन ,नयी दिल्ली ने सन 2014 में प्रकाशित किया था। इस से पहले उनके "दायरों के पार" , "इस भरे बाज़ार में" , "ग़ज़लों की छाँव में" और "याद भी ख्वाब भी हकीकत भी" ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हो कर धूम मचा चुके हैं। लक्ष्मी जी की प्रतिभा का आंकलन महज़ एक पोस्ट में नहीं हो सकता।



बेवजह सूखे जो लम्हे थे दिलों के दरमियाँ 
आँख की बारिश उन्हें झर-झर बहाकर ले चली 

मस्तियों की गंध ले ऋतुओँ की रानी आ रही 
फ़ागुनी झंकार पतझर को बहाकर ले चली 

फिर समय की वादियों में खिल उठे हैं मन-'सुमन'
धूप, कोहरे के बुझे मंज़र बहाकर ले चली 

हल्द्वानी के एम्. बी इंटर कॉलेज से स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के बाद लक्ष्मी जी ने डी बी एस कॉलेज नैनीताल से बी एस सी तक की पढाई पूरी की और फिर इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी रुड़की से न्यूक्लियर फिजिक्स में स्नातक की डिग्री हासिल करने के पश्चात् पंतनगर यूनिवर्सिटी में कार्यरत रहे। लेखन उनका प्रिय शौक रहा इसीलिए उन्होंने अबाध लेखन किया। ग़ज़लों के अलावा उनकी कलम गीत ,नवगीत ,दोहे, मुक्तक और बाल साहित्य रचने में लगातार चल रही है।

 मैं लहज़ों की बारीकियाँ चुन रहा हूँ 
तभी तो मैं हैरान रहने लगा हूँ 

मुहब्बत, इनायत, मुरव्वत,सखावत 
मैं सब सीढ़ियों से फिसलता रहा हूँ 
मुरव्वत = दिल में किसी के लिए जगह होना। सखावत=दानशीलता 

मुझे साथ ही तुम जो ले लो तो बेहतर
मैं अपने ख्यालों में पक-सा गया हूँ 

वो आये हैं भरकम खिताबों को लेकर 
मैं हाथों को बांधे खड़ा हो गया हूँ

इस किताब पर प्रतिक्रिया देती हुई डा. निर्मला जैन लिखती हैं कि "लक्ष्मी सुमन ग़ज़लों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धरती से उनका गहरा रिश्ता है। इन्हें पढ़कर आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इनके कवि को ज़िन्दगी से प्यार है और शायरी उनकी लगन है। सहजता इन ग़ज़लों का प्राण है। कहीं कोई बनावट नहीं, शैली का ऐसा कोई करिश्मा नहीं जो पाठक के लिए दिक्कत पैदा करे। ये ग़ज़लें अनुभव से पैदा हुई हैं और सीधे पाठक के दिल में उतरती चली जाती हैं। "

दिन भर खटता रहता है वह कड़ी धूप के मैदाँ में
सुखी रहे घर इस कोशिश में रहता है घरवाला 'पेड़'

सरल हवा को दिया गरल जब मनुज के ओछे लोभों ने
नीलकंठ बन अमृत देता पी कर उसे निराला 'पेड़'

कहीं सुमन संग कलियाँ नटखट कहीं फलों संग कांटे भी
जीवन धन से हरा-भरा है सब का देखा-भाला 'पेड़' 

 लक्ष्मी सुमन जी इस किताब की भूमिका में लिखते हैं कि "यदि ग़ज़ल की भाषा में रवानी हो उसमें आम बोलचाल के शब्द ही प्रयोग किये जाएँ तभी पाठक या श्रोता उससे तारतम्य बैठा पाता है। इस संग्रह की ग़ज़लों में सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक तथा आम आदमी के सरोकार तो हैं ही पर श्रृंगार रस से ओतप्रोत कोमल अहसासों से भरे भी कई अशआर पिरोये गए हैं ,इसमें प्रकृति के कई अद्भुत करिश्में भी अपने विशेष रंग में हैं. 

बैठ सब्र की छाँव तले 
अंगूरों को खट्टा मान 

लगा फ़कीरी का तकिया 
सो जा सुख की चादर तान

'सुमन' सरीखा हँसता जा 
दर्द न काटों का पहचान 

 प्रकृति के धरती, खेत, जंगल, पहाड़, बादल, कोहरा, वर्षा,ओस, धूप,छाया, सूर्य,वृक्ष , पक्षी आदि विभिन्न अवयवों का मानवीकरण करते हुए लक्ष्मी जी ने इनके सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत किये हैं तो कभी इन्हें प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करते हुए मनुष्य जीवन के किसी सत्य का उद्घाटन किया है। किताब की भूमिका में दिवा भट्ट जो कुमाऊँ यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष हैं लिखती हैं कि "भाषा के साथ नए नए प्रयोग करना सुमन की आदत है , नए प्रयोगों के साथ भी स्वाभाविकता तथा सम्प्रेषण की सार्थकता वे कभी नहीं चूकते, खास तौर पर शब्द चयन में आंचलिक प्रयोग ताज़गी का अहसास कराते हैं :

रस भरे फलों का बनें पेड़ एकदिन 
करती हैं प्राणपण यही प्रयास 'गुठलियां' 

तोड़कर उन्हें मिलीं 'गिरी ' की लज़्ज़तें 
पत्थर को तभी आ गयीं हैं रास 'गुठलियां' 

 "ग़ज़लों की नाव में" सुमन जी की 72 ग़ज़लें संग्रहित हैं जिनमें से अधिकांश छोटी बहर में हैं , छोटी बहर के बादशाह जनाब विज्ञान व्रत जी ने सुमन जी के लिए लिखा है कि "सादगी लक्ष्मी खन्ना सुमन का स्थाई भाव है। सादा ज़बान में बात कहने के फन में शायर को महारत हासिल है। बात को इस तरह से कहना कि श्रोता , पाठक चौंक जाएँ उनका विशेष गुण है। उनकी ग़ज़लें अपनी ख़ामोशी और सादगी के साथ पाठकों के दिल में जगह बनाने में और उन्हें विशेष पहचान दिलाने में सक्षम हैं। "

वही मैं आम जन का पोस्टर हूँ 
सियासत जिसपे लिखी जा रही है 

जो ठोकर से उठी वो धूल क्या है 
ये गिर कर आँख में समझा रही है 

हवा ने कान में जाने कहा क्या 
ये क्यारी इस क़दर लहरा रही है 

इस किताब को आप अगर चाहें तो अमेजन से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं या फिर हिन्दयुग्म से उनके मोबाईल न 9873734046 या 9968755908 पर संपर्क कर सकते हैं। मेरा निवेदन तो ये ही रहेगा कि आप लक्ष्मी खन्ना सुमन जी से जो गुरुगांव (गुड़गांव ) में रहते हैं को उनके मोबाईल न 9719097992 अथवा 9312031565 पर संपर्क कर बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें और बिलकुल अलग तरह की इन ग़ज़लों की किताब को अपनी निजी लाइब्रेरी में जगह दें।
चलते चलते पढ़िए उनकी एक छोटी बहर की प्यारी सी ग़ज़ल :

मन सागर में ज्वार उठा 
आते देखा अपना 'चाँद' 

फिर अम्मी की ईद हुई 
छुट्टी पर घर आया 'चाँद' 

दाग़ छुपाने की खातिर 
शक्लें रोज बदलता 'चाँद' 

चुरा रौशनी सूरज की 
ढीठ बना मुस्काता 'चाँद' 

Monday, October 23, 2017

किताबों की दुनिया -148

आज ग़ज़ल बहुत सी भारतीय भाषाओँ में कही जा रही है लेकिन जिस भाषा के साथ ग़ज़ल का जिक्र हमेशा आएगा वो है "उर्दू'. शायरी पर बात करने से पहले आईये उसे पढ़ते हैं जो हमारे आज के शायर ने इस किताब की भूमिका में एक जगह लिखा है "दुनिया की सब सभ्यताएं भाषाओँ पर टिकी हैं। उर्दू ही एक भाषा थी जो धर्म और सभ्यता की सभी सीमाओं को पार कर चुकी थी। इस फैलती हुई भाषा को एक दम से समेट दिया गया। उर्दू एक भाषा है, वोटों की किसी संस्था में नहीं आती। लोग तो बहु या अल्पसंख्यकों में बंटे और ढूंढें जा सकते हैं लेकिन भाषा को हम कहाँ ढूंढें ? वोटो की राजनीति ने भाषा को हमसे छीन लिया और धीरे धीरे उर्दू भाषा को मुस्लिम मज़हब के साथ चस्पां कर दिया। भाषा के साथ ऐसा दुर्व्यवहार शायद ही कहीं दुनिया में हुआ होगा। उर्दू भाषा को अमीर बनाने में सिर्फ मुसलमान शायरों अदीबों और नक्कादों का ही नहीं गैर-मुस्लिम विशेषतः हिंदू शायरों अदीबों और आलोचकों का योगदान कभी भी कम नहीं रहा"

मेरे घर में सब मेहमाँ बन संवर के आते हैं
इक तेरा ही गम है जो, नंगे पाँव आता है

अब तिरा तसव्वुर भी, मुझसा हो गया शायद 
शब को खूब हँसता है, सुबह टूट जाता है 

किस तरह करूँ शिकवा वक़्त से मैं ऐ 'ज़ाहिद' 
वो भी तेरे जैसा है, यूँ ही रूठ जाता है 

हमारे शायर ने आगे लिखा है " आज के इस दौर में, मैं जिसे उर्दू ज़बान के ज़वाल का दौर मानता हूँ , उर्दू शाइरी के पौधों को सींचने वाले उस्ताद भी कम रह गए हैं। उर्दू भाषा और उर्दू लिपि लगभग लुप्त हो गयी है " शायर का ये कथन मुझे आंशिक रूप से सत्य लगता है क्यूंकि आज की नयी पीढ़ी फिर से उर्दू भाषा और उसकी लिपि में दिलचस्पी लेने लगी है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो उर्दू पढ़ने लिखने वालों में शर्तिया इज़ाफ़ा होगा। हमारे आज के शायर की मादरी ज़बान पंजाबी है और उन्होंने उर्दू किसी उस्ताद से नहीं बल्कि उर्दू के कायदे खरीद कर सीखी है और शायरी किताबों से।

क्यों बढ़ाये रखता है उसकी याद का नाखुन 
रोते रोते अपनी ही आँख में चुभो लेगा 

आँख, कान, ज़िहन-ओ-दिल बेज़बाँ नहीं कोई 
जिसपे हाथ रख दोगे, खुद-ब-खुद ही बोलेगा 

तू ख़िरद के गुलशन से फल चुरा तो लाया है 
उम्र भर तू अब खुद को खुद में ही टटोलेगा 
ख़िरद=अक्ल , बुद्धि 

 20 दिसम्बर 1950 को चम्बा हिमांचल प्रदेश में जन्में जनाब "विजय कुमार अबरोल" जो "ज़ाहिद अबरोल " के नाम से लिखते हैं हमारे आज के शायर हैं , उनकी ग़ज़लों की किताब "दरिया दरिया-साहिल साहिल " की बात हम करेंगे। इस किताब को जिसमें अबरोल साहब की 101 ग़ज़लें संकलित हैं ,सन 2014 में सभ्या प्रकाशन ,मायापुरी , नई दिल्ली ने प्रकाशित किया था। ज़ाहिद साहब ग़ज़लों के अलावा नज़्में भी लिखते हैं।


दिल में किसी के दर्द का सपना सजा के देख 
खुशबू का पेड़ है इसे घर में लगा के देख 

सच और झूठ दोनों ही दर्पण हैं तेरे पास 
किस में तिरा ये रूप निखरता है जा के देख 

जो देखना है कैसे जिया हूँ तिरे बगैर 
दोनों तरफ से मोम की बत्ती जला के देख 

मेरी हर एक याद से मुन्किर हुआ है तू 
गर खुद पे एतिमाद है मुझको भुला के देख 
मुन्किर=असहमत , एतिमाद=भरोसा 

दिलचस्प बात ये है कि "ज़ाहिद" साहब ने भौतिक विज्ञान से एम् एस सी की और उसके बाद बरसों पंजाब नेशनल बैंक में काम करते रहे याने विज्ञान और बैंक दोनों ही बातें गैर शायराना हैं उसके बावजूद उन्होंने शायरी का दामन पकडे रखा और अनवरत लिखते रहे। उनका ये शौक उनकी तालीम और नौकरी से बिलकुल मुक्तलिफ़ रहा। उन्होंने सिद्ध किया की अगर आप में हुनर और ज़ज़्बा है तो रेगिस्तान में भी आप पानी से छलछलाती नदी ला सकते हैं।

खुद को लाख बचाया हमने दिल को भी समझाया हमने
लेकिन बस में कर ही बैठा गोरे बदन का काला जादू 

बरसों तेरी याद न आई आज मगर अनजाने में ही 
मुरझाये फूलों में जैसे नींद से जाग पड़ी हो खुशबू

'ज़ाहिद"कौन से अंधियारे में फेंक आएं यह धूप बदन की 
ज़ेहन पे हर पल छाए हुए हैं इस के आरिज़ उस के गेसू 

पंजाब के ख्यातिनाम शायर जनाब 'राजेंद्र नाथ रहबर 'जो अपनी नज़्म, जिसे जगजीत सिंह साहब ने अपनी मखमली आवाज़ दी थी "तेरे खुशबू से भरे ख़त मैं जलाता कैसे " के हवाले से पूरी दुनिया में जाने जाते हैं ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि " ज़ाहिद अबरोल का कलाम सुबह की पहली किरण की तरह तरो-ताज़ा और ताबनाक है। उन्होंने एक लम्बा अदबी सफर तय किया है जिस ने उन की महबूबियत को चार चाँद लगा दिए हैं. उनके सीने में एक सच्चे फनकार का दिल धड़कता है। वो शुहरत और नामवरी की तमन्ना किये बगैर अपना साहित्यिक सफर जारी रखे हुए हैं। कलाम का बांकपन ,रंगों की बहार ,विषयों की नूतनता और अछूतपन प्रभावित करते हैं और पाठक को अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। सच्ची और उम्दा शायरी की पहचान भी यही है

दिल को जैसे डसने लगे हैं इंद्रधनुष के सातों रंग 
जब से हमने तेरी हंसी को दर्द में ढलते देखा है 

बादल, आंसू, प्यास, धुआं, अंगारा, शबनम, साया, धूप 
तेरे ग़म को जाने क्या क्या भेस बदलते देखा है

'ज़ाहिद' इस हठयोगी दिल को हमने अक्सर सुबह-ओ-शाम
नंगे पाँव ही दर्द के अंगारों पर चलते देखा है 

नज़्में 'ज़ाहिद अबरोल ' साहब का पहला प्यार हैं। उनकी नज़्मों का पहला संग्रह 1978 में और दूसरा 1986 में उर्दू और हिंदी दोनों ज़बानों में प्रकाशित हुआ। सन 2003 में उन्होंने बाहरवीं सदी के महान संत कवि शैख़ फ़रीद के पंजाबी कलाम को उर्दू और हिंदी में अनुवादित कर धूम मचा दी। उनका 'फरीदनामा' सर्वत्र सराहा गया। 'दरिया दरिया -साहिल साहिल उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जो पहले हिंदी में प्रकाशित हुआ और बाद में ये संग्रह उर्दू में भी प्रकाशित किया गया। इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें उर्दू की मुश्किल और तवील बहरों पर भी कही गयी है जो दूसरे ग़ज़ल संग्रहों में आसानी से पढ़ने में नहीं आतीं .

जी में है इक खिलौना सा बन कर कभी एक नन्हें से बच्चे का मन मोह लूँ 
जानता हूँ कि मासूम हाथों से मैं, टूट कर रेज़ा रेज़ा बिखर जाऊंगा 

तश्नगी का समुन्दर है ये ज़िन्दगी इस की हर लहर तलवार से तेज़ है 
आस की नाव के डूब जाने पे भी हौसला है मुझे पार उतर जाऊंगा

मुझको 'ज़ाहिद' इस उखड़े हुए दौर में आइनों का मुहाफ़िज़ बनाते हो क्यों 
नरम-ओ-नाज़ुक तबीयत है मेरी, कि मैं पत्थरों के तसव्वुर से डर जाऊंगा 

किताब की एक और भूमिका में जनाब बी.डी.कालिया 'हमदम' ने लिखा है कि 'ज़ाहिद साहब के शेरों यह अहसास होता है कि यदि आपको किसी भाषा से मुहब्बत है तो उसे सीखने में और भाषा के समंदर में तैरने में कोई मुश्किल सामने नहीं आ सकती। ज़ाहिद अबरोल साहित्यिक रूचि के मालिक हैं। ज़ाहिद अबरोल के कलाम में शब्द एवम अर्थ-सौंदर्य भी है और बंदिश का सौंदर्य भी। अच्छे शेर कहने के बावजूद वो सादगी और नम्रता से यह बात मानते हैं कि वो अभी भी एक विद्यार्थी हैं और उन्हें मंज़िल तक पहुँचने के लिए काफ़ी फ़ासला तय करना है

झुकने को तैयार था लेकिन जिस्म ने मुझको रोक दिया  
अपनी अना ज़िंदा रखने का बोझ जो सर पर काफ़ी था 

तीन बनाये ताकि वो इक दूजे पर धर पायें इलज़ाम 
वरना गूंगा, बहरा, अँधा, एक ही बन्दर काफ़ी था 

ग़म, दुःख, दर्द, मुसीबत,ग़ुरबत सारे यकदम टूट पड़े 
इस नाज़ुक से दिल के लिए तो एक सितमगर काफ़ी था

किताब की सौ ग़ज़लों से चुनिंदा शेर छांटना कितना मुश्किल काम है ये मैं ही जानता हूँ और ये भी जानता हूँ कि मैं हर शेर के साथ इन्साफ नहीं कर सकता इसीलिए बहुत से ऐसे शेर आप तक पहुँचाने से छूट जाते हैं जो कि यहाँ होने चाहियें थे तभी तो आपसे गुज़ारिश करता हूँ कि आप किताब मंगवा कर पढ़ें और सभी शेरों का भरपूर आनंद लें. इस किताब को मंगवाने के लिए आप ज़ाहिद साहब की शरीक-ऐ-हयात मोहतरमा रीटा अबरोल साहिबा से उनके मोबाईल न 97363 23030 पर बात करें । ज़ाहिद साहिब ने उनका ही मोबाईल न नंबर शायद इसलिए दिया है क्यूंकि उन्होंने ही ज़ाहिद साहब के अंदर के इंसान और शायर को ज़िंदा रखने में मदद की है। आप से मेरी ये गुज़ारिश है कि उनके खूबसूरत कलाम के लिए आप ज़ाहिद साहब को उनके मोबाईल न 98166 43939 पर संपर्क कर बधाई जरूर दें।

चलते चलते पेश हैं उनके कुछ चुनिंदा शेर :-

एक घर में तो फ़क़त एक जला करता था
घर में बेटे जो हुए जल उठे चूल्हे कितने 
*** 
बज़ाहिर ओढ़ रक्खा है तबस्सुम 
मगर बातिन सरापा चीखता है 
बज़ाहिर : सामने , बातिन : पीछे 
*** 
मैं नए अंदाज़ से वाकिफ हूँ लेकिन शायरी 
और भी कुछ है फ़क़त लफ़्ज़ों के जमघट के सिवा 
*** 
खत्म कर बैठा है खुद को भीड़ में 
जब तलक तन्हा था वो मरता न था 
*** 
तू मेरी कैद में है मैं भी तेरी कैद में हूँ 
देखें अब कौन किसे पहले रिहा करता है
*** 
काठ के फौलाद के हों या लहू और मांस के
एक से हैं सारे दरवाज़े कहीं दस्तक न दो

Monday, October 16, 2017

किताबों की दुनिया -147

दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा

सोना लेने जब निकले तो हर-हर ढेर में मिटटी थी
जब मिटटी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा

रात वही फिर बात हुई ना हम को नींद नहीं आयी
अपनी रूह के सन्नाटे से शोर सा इक उठता देखा

हिंदी पाठकों ने नासिर काज़मी और इब्ने इंशा का नाम जरूर सुना होगा जिन्होंने ग़ज़ल को ऐसी लय दी जिसे नई ग़ज़ल का नाम दिया जाता है लेकिन शायद अधिकांश ने जनाब खलीलुर्रहमान आज़मी साहब का नाम नहीं सुना होगा जिनका नाम भी उन दोनों शायरों के साथ ही लिया जाता है। आज़मी साहब को सन 1950 के बाद लिखी जाने वाली ग़ज़ल का इमाम कहा जाता है। आज हम उनकी किताब "ज़ंज़ीर आंसुओं की " की बात करेंगे जिसे सन 2010 में वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।



न जाने किसकी हमें उम्र भर तलाश रही 
जिसे करीब से देखा वो दूसरा निकला 

हमें तो रास न आयी किसी की महफ़िल भी 
कोई खुदा कोई हमसायए-खुदा निकला
हमसायए-खुदा=खुदा का पड़ौसी 

हमारे पास से गुज़री थी एक परछाईं 
पुकारा हमने तो सदियों का फासला निकला 

खलीलुर्रहमान आज़मी 9 अगस्त 1927 को जिला आज़मगढ़ के एक गाँव सीधा सुल्तानपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए। उनके पिता मोहम्मद शफ़ी बहुत धार्मिक प्रवृति के इंसान थे। प्रारम्भिक शिक्षा शिब्ली नेशनल हाई स्कूल से हासिल करने के बाद वह 1945 में अलीगढ आये ,1948 में बी.ऐ और उर्दू में एम् ऐ की तालीम, प्रथम स्थान प्राप्त कर,अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हासिल की। सन 1953 से वो अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बतौर लेक्चरर पढ़ाते रहे। सन 1957 में उन्होंने "उर्दू में तरक्की पसंद अदबी तहरीक " विषय पर, जो उर्दू में आज भी बेहतरीन दस्तावेज माना जाता है, पी एच.डी की डिग्री पायी। जून 1978 को ब्लड कैंसर से लम्बी लड़ाई लड़ते हुए वो दुनिया-ऐ-फ़ानी से कूच फ़रमा गए।

हाँ तू कहे तो जान की परवा नहीं मुझे
यूँ ज़िन्दगी से मुझको मोहब्बत जरूर है

अपना जो बस चले तो तुझे तुझसे मांग लें 
पर क्या करें की इश्क की फितरत ग़यूर है
ग़यूर :स्वाभिमान 

आरिज़ पे तेरे मेरी मोहब्बत की सुर्खियां 
मेरी जबीं पे तेरी वफ़ा का गुरूर है 

अपने स्कूली दिनों से आज़मी साहब ने शायरी शुरू कर दी। उनकी लिखी रचनाएँ तब की बच्चों की प्रसिद्ध पत्रिका "पयामि तालीम "में छपती रहीं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर सामान रूप से अधिकार प्राप्त था. उर्दू साहित्य की परम्परागत लेखन शैली में उन्होंने आधुनिकता के पुट का समावेश किया। प्रगतिशील आंदोलन से वो जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। वो प्रगतिशील लेखक संघ के सेक्रेटरी भी रहे।

हर खारों-ख़स से वज़अ निभाते रहे हैं हम 
यूँ ज़िन्दगी की आग जलाते रहे हैं हम 

इस की तो दाद देगा हमारा कोई रक़ीब 
जब संग उठा, तो सर भी उठाते रहे हैं हम 

ता दिल पे ज़ख़्म और न कोई नया लगे 
अपनों से अपना हाल छिपाते रहे हैं हम 

आलोचकों का विचार है कि खलीलुर्रहमान आज़मी एक ऐसे प्रगतिशील शायर थे जिन्होंने प्रगतिशीलता और आधुनिकता के दरमियान पुल का काम किया। उनकी शायरी के दो संग्रह "कागज़ी पैरहन (1955 )और "नया अहद नामा (1966 ) उनके जीवन काल में प्रकाशित हुए जबकि "ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी" 1983 में उनके देहावसान के बाद। यूँ उनकी अनेक विषयों पर दर्जनों किताबें हैं और वो सभी उर्दू साहित्य की धरोहर हैं। प्रोफ़ेसर शहरयार ने उनकी कुलियात "आसमां-ऐ-आसमां" नाम से प्रकाशित करवाई।

तमाम यादें महक रहीं हैं हर एक गुंचा खिला हुआ है
ज़माना बीता मगर गुमां है कि आज ही वो जुदा हुआ है

कुछ और रुसवा करो अभी मुझको ता कोई पर्दा रह न जाए 
मुझे मोहब्बत नहीं जुनूँ है जुनूँ का कब हक़ अदा हुआ है 

वफ़ा में बरबाद होके भी आज ज़िंदा रहने की सोचते हैं 
नए ज़माने में अहले-दिल का भी हौसला कुछ बढ़ा हुआ है 

सन 1978 में ग़ालिब सम्मान से सम्मानित खलीलुर्रहमान साहब की ये किताब हिंदी में छपी उनकी पहली किताब है जिसे शहरयार और महताब हैदर नक़वी साहब ने सम्पादित किया है। इस किताब में आज़मी साहब की लगभग 40 ग़ज़लें और इतनी ही नज़्में आदि शामिल हैं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप जैसा मैं पहले बता चूका हूँ ,आप दिल्ली के "वाणी प्रकाशन " से संपर्क कर सकते हैं चलते चलते आईये उनकी ग़ज़लों के कुछ शेर आपको पढ़वाता हूँ :-

तेरे न हो सके तो किसी के न हो सके 
ये कारोबारे-शौक़ मुक़र्रर न हो सका 
*** 
यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं 
ज़िन्दगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैंने 
*** 
क्या जाने दिल में कब से है अपने बसा हुआ 
ऐसा नगर कि जिसमें कोई रास्ता न जाए
*** 
हमने खुद अपने आप ज़माने की सैर की 
हमने क़ुबूल की न किसी रहनुमा की शर्त 
*** 
कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पाँव चूमूंगा 
ज़माना लाख करे आके संगसार मुझे 
*** 
ज़ंज़ीर आंसुओं की कहाँ टूट कर गिरी 
वो इन्तहाए-ग़म का सुकूँ कौन ले गया
*** 
उम्र भर मसरूफ हैं मरने की तैय्यारी में लोग 
एक दिन के जश्न का होता है कितना एहतमाम

Monday, October 9, 2017

किताबों की दुनिया -146

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है 
न उसको भूलना है और न उसको याद करना है 

ज़बाने कट गईं तो क्या, सलामत उँगलियाँ तो हैं 
दरो-दीवार पे' लिख दो तुम्हें फ़रियाद करना है 

बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उसकी यादों का 
कभी आबाद करना है कभी बर्बाद करना है 

तक़ाज़ा वक़्त का ये है न पीछे मुड़ के देखें हम 
सो हमको वक़्त के इस फ़ैसले पर साद करना है 
साद =सही निशाना लगाना 

बनारस के पुस्तक मेले में राजपाल पब्लिकेशन के स्टॉल पर जब अचानक इस किताब पर नज़र पड़ी तो उठा लिया और इसके आख़री फ्लैप पर लिखी इस इबारत को पढ़ कर इस किताब को खरीदने में एक लम्हा भी ज़ाया नहीं किया ,लिखा था कि "ये शायद पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी औरत का मुश्तर्का अल्मिया (एक जैसी ट्रेजिडी) है कि औरत का कोई घर नहीं होता। वो हमेशा चार रिश्तों की मुहताज रहती है बाप, भाई, शौहर और बेटा। " वैसे ये बात सिर्फ हिंदुस्तान या पाकिस्तान की औरतों की ही नहीं है बल्कि ये सच्चाई कमोबेश पूरी दुनिया की औरतों पर लागू होती है .

कैसा अजीब दुःख है कि देखा न रात भर
आँखों ने कोई ख़्वाब भी, सोने के बावजूद

उगने लगी है फिर से अंधेरों की एक फ़स्ल
तारों को इस ज़मीन पर बोने के बावजूद

खूं से लिखा हुआ है कोई नाम आज भी
क़ातिल की आस्तीन पे' धोने के बावजूद

अहसास की कमी है कि इंतिहाए- कर्ब
आँखों में अश्क ही नहीं रोने के बावजूद
इंतिहाए- कर्ब =वेदना की चरम अवस्था 

'आँखों में अश्क ही नहीं रोने के बावजूद' जैसा मिसरा किसी शायर के लिए कहना मुश्किल काम है, ऐसे मिसरे कोई शायरा ही कह सकती है। स्त्री के दुःख को पुरुष समझ तो सकता है लेकिन उसे सही ढंग से शायद बयाँ नहीं कर सकता। किताबों की दुनिया में आज जिस किताब की बात होगी वो है "पांचवी हिजरत" जिसकी शायरा हैं पाकिस्तानी मशहूर शायरा "हुमैरा राहत" साहिबा। हिंदी के पाठकों के शायद ये नाम बहुत जाना पहचाना न हो क्यों की हिंदी में छपने वाली ये उनकी पहली किताब है।


रहे-दीवानगी से डर न जाये 
तुम्हारा इश्क मुझ में मर न जाये  

 खुदा के बाद जो है आस मेरी 
वही इक शख़्स तन्हा कर न जाये 

कभी ऐसा भी कोई मु'जिज़ा हो 
कि ये महताब अपने घर न जाये
मु'जिज़ा=चमत्कार 

 1959 में जन्मी हुमैरा राहत करांची में रहती हैं, घर-बार वाली ख़ातून शायरा हैं और स्कूल में पढ़ाती हैं। अदब की दुनिया में उनका रिश्ता शायरी के साथ साथ अफ़सानानिगारी से भी है और पाकिस्तान के अदबी हल्क़ों में अलग से पहचानी जाती हैं। इस किताब की भूमिका का आग़ाज़ वो जिस अंदाज़ से करती हैं वो बेहद दिलकश है उन्होंने लिखा है " ज़िन्दगी क्या है ! लम्ह-ऐ-अज़ल से लम्ह-ऐ-अबद तक ( पैदा होने से लेकर मरने तक का क्षण ) आँख की पुतली में जमी हुई हैरत ! पहले होने की फिर न होने की। इसी हैरत के आस-पास इश्क का कारखाना है। मगर इश्क ने भी हैरत की कोख़ से जनम लिया है , इश्क का अपना एक जहान -ऐ- हैरत है. मैंने जब अपने अंदर झाँका तो उसी जहान -ऐ-हैरत में मेरी शायरी भटक रही थी सो इसी शायरी का हाथ थाम कर मैं आपकी दुनिया में चली आयी हूँ।"

  हरेक ख़्वाब की ता'बीर थोड़ी होती है 
 मुहब्बतों की ये तक़दीर थोड़ी होती है 

 सफ़र ये करते हैं इक दिल से दूसरे दिल तक 
दुखों के पांवों में ज़ंजीर थोड़ी होती है 

 दुआ को हाथ उठाओ तो ध्यांन में रखना 
 हरेक लफ़्ज़ में तासीर थोड़ी होती है 

 हुमैरा साहिबा जब सार्क सम्मेलन में भाग लेने सन 2011 में पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल के साथ आगरा तशरीफ़ लायी तो उनकी मुलाकात दिल्ली के मशहूर शायर आलोचक और अनुवादक जनाब सुरेश सलिल साहब से हुई। सुरेश जी ने जब उन्हें एक महफ़िल में अपनी ग़ज़लें और नज़्में सुनाते सुना तो सोचा कि क्यों न इनकी ग़ज़लों और नज़्मों का हिंदी अनुवाद कर उसे एक बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचाया जाय। बात हुई लेकिन अंजाम तक न पहुंची। एक लम्बे अर्से के बाद फिर से ये बात जनाब नूर ज़हीर के माध्यम से उठाई गयी ,सुरेश जी दुबारा हुमैरा साहिबा से मिले जिसका नतीजा "पांचवीं हिजरत" की शक्ल में मंज़र-ऐ-आम पर दिखाई दिया. 

 बारिश के कतरे के दुःख से नावाकिफ़ हो 
 तुम हँसते चेहरे के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 साथ किसी के रह कर के जो तनहा कटता है 
 तुम ऐसे लम्हे के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 इक लम्हे में किर्ची -किर्ची जो हो जाये 
 तुम उस आईने के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 मुहब्बत के कई कई शेड्स आपको उनकी शायरी में दिखाई देते हैं हुमैरा कहती हैं "इश्क और मोहब्बत में मामूली सा फर्क है -मुहब्बत इब्तिदा है और इश्क इन्तहा , मुहब्बत रसाई (पहुँच, प्रवेश) है और इश्क नारसाई (पहुँच से परे), मुहब्बत दुआ है और इश्क इबादत ,मुहब्बत तलब है और इश्क हैरत। बहुत सारे रंग हैं इश्क के मगर जब आँखें उन रंगों में इम्तियाज़ पर क़ादिर (चुनने पर आमादा ) हो जाती हैं तो एक ही रंग बन जाता है -आंसुओं का रंग , तिश्नगी और आबलापाई का रंग।"

हिसारे-ज़ात से बाहर निकलना चाहती हूँ मैं 
अब हर हुक्म से इंकार करना चाहती हूँ 
 हिसारे-ज़ात =ख़ुदी के दायरे से 

 ज़मीं पर घर की बुनियादें बहुत कमज़ोर ठहरीं 
 मैं अब पानी पे' घर तामीर करना चाहती हूँ 

 किसी हरफ़े-सताइश की तलब दिल में नहीं है
 मैं खुद अपने लिए सजना-सँवरना चाहती हूँ 
 हरफ़े-सताइश की तलब =किसी से सराहना पाने की इच्छा 

 हुमैरा राहत की शायरी की तीन किताबें मंज़र-ऐ-आम पर आ चुकी हैं इन्हीं सब किताबों में से चुनिंदा 46 ग़ज़लें और 37 नज़्में सुरेश सलिल जी ने हिंदी में लिप्यांतर कर इस संग्रह में संकलित की हैं। किताब को राजपाल एंड सन्ज ने प्रकाशित किया है। सभी रचनाएँ अपने अलग रंग और लहज़े के कारण पढ़ने योग्य हैं। उनके कुछ शेर देर तक ज़ेहन में घूमते रहते हैं। 

 है चलन कितना अजब ये कि मिरे अहद में लोग 
 बीज बोते नहीं मिटटी में , समर मांगते हैं 
 समर=फल 

 इस क़दर घर को उजड़ते हुए देखा है कि अब
 घर की ख़्वाइश नहीं रखते हैं खंडहर मांगते हैं 

 संगदिल धूप में उम्मीद है बारिश की हमें 
 और साहिल पे' बना रेत का घर मांगते हैं 

 हुमैरा साहिबा ने शायरी के अलावा उपन्यास और कहानियां भी लिखी है लेकिन नज़्मों की और उनका झुकाव ज्यादा है। इस किताब में संग्रहित नज़्में कमाल की हैं कुछ तो बिलकुल नयी हैं जो इस किताब के अलावा अभी तक और कहीं प्रकाशित नहीं हुई। उनका कहना है कि" नज़्म अफ़साने से ज़्यादा क़रीब होती है ,वही पहली लाइन चौका देने वाली ,एहसास की नज़ाकत, ज़ज़्बात का इज़हार और फिर आखिर में एक अबूझ अपरिभाषित सी प्यास का रह जाना। नज़्म कभी मुकम्मल नहीं होती और अफ़साना भी हमेशा अधूरा ही रहता है शायद यही वजह है कि नज़्म लिखने में मुझे ज्यादा लुत्फ़ आता है " आईये पहले उनकी कुछ एक छोटी -छोटी नज़्मों का लुत्फ़ लें : 

1. तेरा नाम
 बारिशों के मौसम में 
 छत पे' बैठ के तन्हा 
 नन्ही नन्ही बूंदों से 
 तेरा नाम लिखती हूँ 

 2. काश 
 मेरे मालिक 
 बहुत रहमो-करम 
 मुझ पर किये तूने 
 मैं तेरा शुक्र अदा करते नहीं थकती 
 मगर, बस एक छोटी सी शिकायत है
 कि मेरी ज़िन्दगी में 
 इतने सारे ' काश' 
क्यों रक्खे 

 3. सवाल 
 मुहब्बत आशना लम्हे (प्रेम पूर्ण क्षण ) 
छिपाये इक अजब सा कर्ब (वेदना ) 
लहज़े में मुझी से पूछते हैं 
ये अगर हर ख़्वाब की किस्मत में 
 मर जाना ही लिखा है 
 तो आँखें देखती क्यों हैं 

 ये तो मैंने बता ही दिया है कि अगर आपको किताब चाहिए तो राजपाल एंड सन्ज दिल्ली से संपर्क करें , उनकी एक साइट भी है जी पर जा कर आप ऑन लाइन किताब मंगवा सकते हैं अगर वहां से नहीं तो अमेजन पर भी ये किताब उपलब्ध है , वैसे है तो myshopbazzar और universalbooksellers पर भी , आप जहाँ से चाहें मंगवा लें , पढ़ें और फिर फेसबुक पर हुमैरा जी के पेज पर जा कर बधाई भी दे आएं। आपकी सुविधा के लिए मैं ऑन लाइन मंगवाने के लिए तीन लिंक दे रहा हूँ आपको इनपर क्लिक करके ऑर्डर ही करना है बस।

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 आखिर में जैसा कि हमेशा करता आया हूँ आपको उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता चलता हूँ , शेर नहीं इस बार चलिए एक नज़्म पढ़वाता हूँ उम्मीद है पसंद आएगी : 

 क्या मोहब्बत एक पल है 

 मैं दिल से पूछती हूँ 
 क्या मोहब्बत को भुलाना 
 इस कदर आसान होता है
 "चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों " 
बस इस मिसरे की ऊँगली थाम कर 
 बरसों पुराना साथ पल में तोड़ देते हैं 
 मोहब्बत एक लम्हा तो नहीं
 जो ज़िन्दगी में आये 
 और वापस चला जाय 
 मोहब्बत उम्र है 
 और उम्र जां के साथ जाती है 
 मोहब्बत आईना कब है
 मोहब्बत अक्स है 
 जब आईना गिर कर ज़मीन पर 
 टूट जाता है 
 तो अपने अक्स को टूटे हुए टुकड़ों में भी 
 महफूज़ रखता है 
 तो फिर मुमकिन नहीं कि 
 अजनबियत का लबादा ओढ़ कर
 कोई ये कह दे कि 
चलो अब लौट जाते हैं.....