Monday, September 18, 2017

किताबों की दुनिया -143

कल मेरे लफ़्ज़ों में मेरी जान रहेगी 
दुनिया जब देखेगी तो हैरान रहेगी 

जब दिल से तस्वीर तेरी हट जाएगी 
जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी

रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा 
मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी 

हिज्र को शब् से ऐसी तो उम्मीद न थी 
पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी 
हिज्र =विरह , शब् =रात 

अब क्या लिखूं ? कैसे लिखूं ? कहाँ से लिखूं ? हमारे आज के शायर उर्दू साहित्य की वो कद्दावर शख्सियत रहे हैं जिनके के बारे में लिखने की सोचना ही बहुत बड़ी बात है। हिंदी पाठक भले ही उनके नाम से ज्यादा वाकिफ़ न हों लेकिन जिस किसी को भी उर्दू अदब में जरा सी दिलचस्पी है वो जनाब "मुग़न्नी तबस्सुम " के नाम से अनजान नहीं होगा। हम आज उनकी ग़ज़लों की किताब "मिटटी मिटटी मेरा दिल " पर बात करेंगे जिसका एक एक शेर रुक रुक कर पढ़ने, पढ़वाने और दिल में बसाने लायक है। इस किताब को वाणी प्रकाशन ने सन 2002 में शाया किया था।


मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया में खोया रहा 
कब रात ढली कब चाँद बुझा मालूम नहीं 

जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी 
क्यों मेरे दिल में दर्द उठा मालूम नहीं 

ये जान गए हंसने की सज़ा अब मिलती है 
इस रोने का अंजाम है क्या मालूम नहीं 

सच कहूं तो "जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी " जैसा सुरीला सरल मिसरा उर्दू शायरी में बड़ी मुश्किल से ढूंढें मिलता है और ऐसे मिसरे इस किताब के वर्क वर्क में बिखरे हुए हैं। आप सर धुनते रहिये और बस पढ़ते रहिये। शायरी की ज़बान ऐसी मीठी जैसे शहद और क्यों न हो आखिर मुग़न्नी तबस्सुम उस्मानिया विश्वविद्यालय , हैदराबाद के ऐसे होनहार तालिबे-इल्म थे जो बाद में उसी यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे।

बेमानी सा लगता है घर जाना भी 
दीवारों से टकराना मर जाना भी 

रस्ता तकते रहना सारी रात कभी 
आहट सुनकर क़दमों की डर जाना भी 

बादल अब जो खेल तमाशे करता है 
उसने मेरी नाव डुबो कर जाना भी

मोहम्मद अब्दुल गनी जो "मुग़न्नी तबस्सुम" के नाम से जाने जाते हैं का जन्म 19 जून 1930 को हैदराबाद में हुआ। मात्र 14 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने शायरी शुरू कर दी. मशहूर शायर अल्लामा इक़बाल साहब की शायरी से वो बहुत प्रभावित हुए। उर्दू की प्रगतिशील विचारधारा को अपनाते हुए उन्होंने ने लेखन कार्य किया और थोड़े समय तक आधुनिक विचारधारा के समर्थक भी रहे लेकिन बाद में फिर प्रगतिशील विचारधारा की और मुड़ गए.

आसमाँ पर है अजब चाँद सितारों का समां 
दिल में देखो तो यहाँ रात का मंज़र है अलग 

पास तेरे हूँ कि क़तरा है निहाँ दरिया में 
दूर तुझसे हूँ कि सहरा से समंदर है अलग 

फुर्सते उम्र है कम, हर्फ़े तमन्ना सुन लो 
बात शिकवों की न पूछो कि वो दफ्तर है अलग
फुर्सते उम्र =ज़िन्दगी की फुर्सत , हर्फ़े तमन्ना =इच्छा की बात 

ज़िन्दगी के तजुर्बों को सीधे सरल अंदाज़ में शायरी में ढालने का हुनर जैसा तबस्सुम साहब के यहाँ मिलता है वैसा और कहीं मिलना मुश्किल है। उनके बारे में प्रोफ़ेसर शमीम ईफानफ़ी फरमाते हैं की "मुग़न्नी साहब निहायत धीमे अंदाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए अपनी बात कहते हैं जो खरामा खरामा हमारे ज़ेहन में घर करती है और इसलिए न तो बोझ बनती है और न ही चौंकाती है , उनके अशआरों से अपनत्व का अहसाह उभरता है और हमें अपने आगोश में ले लेता है।"

तपते सहरा में ये खुशबू साथ कहाँ से आई
जिक्र ज़माने का था तेरी बात कहाँ से आई 

दिल मिटटी था आँखों में सौगात कहाँ से आई 
सावन बीत चला था ये बरसात कहाँ से आई 

बीते लम्हें टूटे भी तो याद बने या ख़्वाब 
परछाईं थी परछाईं फिर हाथ कहाँ से आई 

प्रोफ़ेसर तबस्सुम द्वारा "फ़ानी बदायूनी " पर किया गया शोध कार्य उर्दू में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की हैसियत से जाना जाता है। एक आलोचक के रूप में जैसी प्रतिष्ठा मुगन्नि साहब ने पायी उसकी मिसाल ढूंढनी मुश्किल है। उर्दू साहित्य को नयी दिशा और उसके मयार में लगातार इज़ाफ़ा करने के उद्देश्य के लिए वो मुईनुद्दीन क़ादरी ज़ोर साहब द्वारा 1930 में हैदराबाद में स्थापित "इदारा-ऐ-अदबियत-ऐ-उर्दू" के साथ आखरी सांस तक जुड़े रहे। उर्दू भाषा में उनके द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका "सबरस" बहुत लोकप्रिय हुई ,उन्होंने नए लेखकों को प्रोत्साहन देने की गरज़ से छमाही पत्रिका "शेर-औ-हिक़मत" का संपादन भी सफलता पूर्वक किया।

तरस गया हूँ मैं सूरज की रौशनी के लिए 
वो दी है सायए दीवार ने सज़ा मुझको 

जो देखिये तो इसी से है ज़िन्दगी मेरी
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझको 

उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया 
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझको 

एक बहुत लम्बी फेहरिस्त है उनकी विभिन्न विषयों जैसे शायरी , आलोचना , शोध ,जीवनी ,संकलन और संपादन पर प्रकाशित लगभग 23 किताबों की, जिनका नाम यहाँ देना संभव नहीं अलबत्ता शायरी पर उनकी ये किताबें बहुत मकबूल हैं जो उर्दू में हैं "'" : "नवा-ऐ-तल्ख़ (1946)", "पहली किरण का बोझ (1980)"' "मिटटी मिटटी मेरा दिल (1991) और " दर्द के खेमे के आसपास(2002)" .इसके अलावा देश विदेश के रिसालों में उनके लेखों की संख्या तो सैंकड़ों में है। लन्दन और अमेरिका की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटीज के तालिब-ऐ-इल्मों को वो उर्दू अदब के ढेरों विषयों पर हुए सेमिनारों में भाषण देने जाते थे।

तारे डूबें तो अच्छा है, चाँद बुझे तो बेहतर है 
कोई नहीं आएगा यहाँ, अब आँख लगे तो बेहतर है 

आइना वीरान खड़ा है ,अनजाना सा लगता है 
हमने चुप साधी है वो भी कुछ न कहे तो बेहतर है 

ख़्वाब में तुझसे मिलते हैं और बात दुआ में करते हैं 
तू भी हमको देखे और कुछ बोल सके तो बेहतर है 

उर्दू के इस खिदमतगार को उत्तर प्रदेश , बिहार , पश्चिमी बंगाल ,आंध्र प्रदेश , दिल्ली आदि अनेकों उर्दू अकादमियों के अलावा महाराष्ट साहित्य अकादमी ने भी पुरुस्कृत किया है। जनाब "स्वाधीन" जिन्होंने इस किताब को हिंदी में लिप्यांतर किया है लिखते हैं कि " इस शायर ने देश काल और इतिहास को अलग-थलग नहीं करते हुए अपने उस आदमी के साथ एकमेल कर दिया है जो रोज उसके भीतर जागा रहता है "

चढ़े हुए थे जो दरिया उतर गए अब तो 
मुहब्बतों के ज़माने गुज़र गए अब तो

न आहटें हैं, न दस्तक, न चाप क़दमों की 
नवाहे- जाँ से सदा के हुनर गए अब तो 
 नवाहे जाँ=प्राणो का विस्तार

सबा के साथ गयी बूए पैरहन उसकी 
ज़मीं की गोद में गेसू बिखर गए अब तो 
सबा=हवा , बुए पैरहन =गंध के वस्त्र गेसू =बाल 

उर्दू अदब का ये रौशन सितारा अपनी ज़िन्दगी के सत्तर से अधिक बरस तक अदब की खिदमत करते हुए आखिर 15 फरवरी 2012 की शाम को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुख़सत हो गया और पीछे छोड़ गया उनकी बसाई अदब की एक ऐसी पुरअसर दुनिया जो सदियों तक ज़िंदा रहेगी। डॉक्टर तबस्सुम जैसे शख्सियत कभी कहीं जाती नहीं हमेशा हमारे आसपास अपनी किताबों और रिसालों में मौजूद रहती है।
"मिटटी मिटटी मेरा दिल" में उनकी सिर्फ 60 ग़ज़लें संकलित हैं जिनमें कुल जमा 250-300 शेर होंगे लेकिन एक भी ऐसा शेर नहीं है जिसे यहाँ आपको पढ़वाने की मेरी इच्छा न हो, अफ़सोस ऐसा करना संभव नहीं। मेरी गुज़ारिश है कि आप इस किताब को वाणी प्रकाशन दिल्ली से मंगवा कर पढ़ें और देखें कि उर्दू शायरी का जादू किस तरह सर चढ़ कर बोलता है।
उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता हूँ और फिर आपसे अगली किताब की तलाश करने को रुखसत होता हूँ :

एक अहदे विसाल चार सू है 
और दर्दे फ़िराक़ कू-ब-कू है
अहदे विसाल =मिलान का वादा , चार सू =चरों तरफ़, दर्दे फ़िराक़=जुदाई का दर्द , कू-ब -कू =गली गली 

जो सो न सके वो आँख हूँ मैं 
जो टूट गयी वो नींद तू है  

मैं सोच रहा हूँ, तू नहीं है
मैं देख रहा हूँ और तू है 

दुनिया के सारे सवाल मुझ पर
चुप हूँ कि मेरा जवाब तू है

Monday, September 11, 2017

किताबों की दुनिया - 142

जो मंज़र आँख पर है ,लम्हा लम्हा 
मिरे सीने के अंदर खुल रहा है 

कभी खुद मौज साहिल बन गयी है 
कभी साहिल, कफ़-ऐ-दरिया हुआ है 
कफ़-ऐ-दरिया=नदी की हथेली 

पलट कर आएगा बादल की सूरत 
इसी खातिर तो दरिया बह रहा है 

महकते हैं जहां खुशबू के साये 
तसव्वुर भी वहां तस्वीर-सा है 

जो "किताबों की दुनिया" के नियमित पाठक हैं उन्हें तो पता है, लेकिन जो कभी कभार भूले भटके पढ़ने आते हैं उन्हें शायद नहीं पता होगा कि इस श्रृंखला में सरहद पार के मकबूल जिन शायरों /शायराओं की ग़ज़ल की किताबों का अब तक जिक्र किया गया है उनके नाम हैं : "नासिर काज़मी "," परवीन शाकिर ","शाहिदा हसन","शकेब जलाली", "इफ़्तिख़ार आरिफ़", "मुज़फ्फर वारसी ", "अशरफ़ गिल ","ज़फर इकबाल","इरफ़ाना अज़ीज़"," जॉन एलिया",और जनाब "मुनीर नियाज़ी", इसी फेहरिश्त में हम आज एक और शायर की किताब को जोड़ने जा रहे हैं जिनका नाम इन सब से थोड़ा सा कम मकबूल जरूर है क्यूंकि इनकी ग़ज़लों को तब के मशहूर ग़ज़ल गायकों ने अपनी आवाज़ नहीं दी लेकिन जिनकी शायरी का मयार इस फेहरिश्त में आये सभी नामों से उन्नीस नहीं है।

खिले जो फूल उसे क़दमों में रोंदती है क्यों 
हवा से कोई तो पूछो कि सरफिरी है क्यों 

मलाल यूँ भी रहा यार से बिछुड़ने का 
कि उससे कह न सके हम उदास जी है क्यों 

अजीब लम्स-ऐ-खुनक है हवा की पोरों में 
जो तू नहीं है तो फिर दर्द में कमी है क्यों 
लम्स-ऐ-खुनक=ठंडा स्पर्श 

आधुनिक उर्दू शायरी को नया रंग रूप प्रदान करने में जिन पाकिस्तानी शायरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है उनमें हमारी श्रृंखला के आज के शायर जनाब " तौसीफ़ तबस्सुम" का नाम बहुत ऊपर है ,आज हम उनकी किताब "घर की खुशबू " का जिक्र करने जा रहे हैं जिसे डायमंड बुक्स ने सन 2006 में शाया किया था. तौसीफ़ साहब का नाम मैंने सब से पहले सतपाल ख़्याल साहब के ब्लॉग "आज की ग़ज़ल" में सन 2010 में पढ़ा था उसके बाद उनकी ग़ज़लें रेख़्ता की साइट पर पढ़ कर इस किताब को अमेजन से ऑन लाइन मंगवा लिया।


यही हुआ कि हवा ले गयी उड़ा के मुझे 
तुझे तो कुछ न मिला ख़ाक में मिला के मुझे 

चिराग़ था तो किसी ताक़ ही में बुझ रहता 
ये क्या किया कि हवाले किया हवा के मुझे 

हो इक अदा तो उसे नाम दूँ तमन्ना का 
हज़ार रंग हैं इस शोला-ऐ-हिना के मुझे 

बलन्द शाख़ से उलझा था चाँद पिछले पहर 
गुज़र गया है कोई ख़्वाब सा दिखा के मुझे 

बदायूं उत्तर प्रदेश के सहसवान गाँव में 3 अगस्त 1928 को जन्में तौसीफ साहब ने प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में ग्रहण की और फिर देश विभाजन के बाद 21 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान चले गए और वहीँ गोर्डन कालेज रावलपिंडी से एम ऐ. की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1857 के ग़दर के वक्त के प्रसिद्ध शायर "मुनीर शिकोहाबादी" की शायरी पर गहरायी से शोध किया और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। "मुनीर "न सिर्फ शायर थे बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक भी थे , अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखने के कारण उन्हें सात साल की काले पानी की सज़ा भी हुई। "मुनीर" साहब की शायरी पर किये गए उनके शोध ग्रन्थ की बहुत सराहना हुई।

करेगा कोई तो इस तीरा-खाकदाँ से रिहा 
बदल ही जाएगी ज़ंजीर खुद से कहता हूँ 
तीरा-खाकदाँ =संसार 

छुआ तो रह गया पोरों पे लम्स खुशबू का 
सो आज तक वही दर्दे-फ़िराक़ सहता हूँ 

मिरा लहू मिरा दुश्मन पुकारता है मुझे 
मैं अपने आप से सहमा हुआ सा रहता हूँ 

आम बोलचाल की शब्दावली से अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देने और उसे साधारण जन की आवाज़ बना देने वाले तौसीफ़ तबस्सुम मुख्यतः ग़ज़ल के शायर हैं। "घर की खुशबू" हिंदी में छपने वाला उनका एक मात्र मजमुआ है जिसमें उनकी लगभग 75 ग़ज़लें और 20 नज़्में संकलित हैं। तौसीफ साहब ने शायरी भारत में रहते हुए शुरू कर दी थी जो उनके पाकिस्तान चले जाने के बाद परवान चढ़ी। 1952 बाद पकिस्तान का शायद ही कोई ऐसा अदबी रिसाला हो जिसमें तौसीफ़ साहब का कलाम न छपा हो।

जो सरबलन्द थे ,उन्हें फेंका है ख़ाक पर
जो ख़ाक पर थे उनको उठा ले गयी हवा

मिटटी से रंग,शाख़ से पत्ते, गुलों से बू
जो भी हवा के साथ गया, ले गयी हवा

पतझड़ में शाख़ शाख़ थी तलवार की तरह
हैरत है कैसे खुद को बचा ले गयी हवा

तौसीफ़ साहब की शायरी रिवायती होते हुए भी बिलकुल अलग हट के है। उनके यहाँ जो दर्शन और प्रतीक मिलते हैं वो और कहीं ढूंढने मुश्किल हैं ,हालाँकि उनका मानना है कि ग़ज़ल लेखन सबसे आसान फन है जो चलते फिरते भी निभाया जा सकता है जबकि नज़्म कहने में ज्यादा वक्त लगता है और अगर कहीं कहानी उपन्यास याने नस्र में कुछः कहना हो तो सबसे ज्यादा वक्त लगता है। उनकी शायरी के बारे में राजस्थान के प्रसिद्ध शायर राजेंद्र स्वर्णकार जी ने सतपाल जी के ब्लॉग पर कमेंट करते हुए बहुत सही लिखा है कि " जनाब तौसीफ़ तबस्सुम के कलाम से रू ब रू होना अपने आप में ज़ियारत जैसा है । उनका कलाम उस्तादाना है और जब तक एक ग़ज़ल को चार पांच बार न पढ़ लिया जाय तब तक तश्नगी-ऐ-सुखन बढ़ती ही रहती है " आईये फिर से उनकी शायरी की और मुड़ें :

आवाज़ों के फेर में कैसे हाल खुलेगा भीतर का 
दिल के अंदर हू का आलम, बाहर शोर समंदर का 
हू =ईश्वर 

बहता दरिया, उड़ता पंछी, दोनों ही सैलानी थे 
आँख के रस्ते क़ैद है दिल में इक-इक मंज़र बाहर का 

पहली बार सफर पर निकले, घर की खुशबू साथ चली 
झुकी मुँडेरें कच्चा रस्ता, रोग बने, रस्ते भर का 

" घर की खुशबू " की नज़्मों और ग़ज़लों को हिंदी लिपि में प्रस्तुत करने का सारा श्रेय सुरेश कुमार जी और डायमंड बुक्स को जाता है. सुरेश जी किताब की भूमिका में लिखते हैं कि तौसीफ साहब की शायरी को पढ़ते हुए हमें ऐसा बिलकुल महसूस नहीं होता कि हम किसी दूसरे मुल्क के शायर की रचनाएँ पढ़ रहे हैं। उनकी शायरी में आज भी भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है क्यूंकि भले ही सरहदों ने मुल्क को दो हिस्सों में बाँट दिया हो लेकिन दोनों देशों के नागरिकों खास तौर पर आम इंसान की समस्याएं और हालात लगभग एक जैसे ही हैं तभी हमें वहां की शायरी में भी खुद की आवाज़ सुनाई देती है।

सुनो कवी तौसीफ़ तबस्सुम इस दुःख से क्या पाओगे 
सपना लिखते-लिखते आखिर खुद सपना हो जाओगे 

हर खिड़की में फूल खिले हैं पीले पीले चेहरों के 
कैसी सरसों फूली है, क्या ऐसे में घर जाओगे 

इतने रंगों में क्या तुमको एक रंग मन भाया है 
भेद ये अपने जी का कैसे औरों को समझाओगे 

दिल की बाज़ी हार के रोये हो तो ये भी सुन रक्खो 
और अभी तुम प्यार करोगे और अभी पछताओगे 

तौसीफ़ साहब ने जो लिखा बहुत पुख्ता और मयारी लिखा। उन्हें उनकी "कोई एक सितारा " किताब पर अल्लामा इक़बाल हिजरा अवार्ड से और उर्दू साहित्य में दिए उनके योगदान के लिए पाकिस्तान के "प्रेजिडेंट अवार्ड " से भी नवाज़ा गया। अगर आप गंभीर शायरी के रसिया हैं तो आपको उनकी हिंदी में छपी ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। उनकी चुनिंदा ग़ज़लों और नज़्मों को आप रेख़्ता की साइट पर भी पढ़ सकते हैं.
अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले मैं आईये उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता चलता हूँ :

दिल था पहलू में तो कहते थे तमन्ना क्या है 
अब वो आँखों में तलातुम है कि दरिया क्या है 
तलातुम :बाढ़ 

शौक़ कहता है कि हर जिस्म को सिजदा कीजे 
आँख कहती है कि तूने अभी देखा क्या है 

क्या ये सच है कि खिजाँ में भी चमन खिलता है 
मेरे दामन में लहू है तो महकता क्या है 

 सच कहूं तो आप को तौसीफ़ साहब की चंद ग़ज़लों से शेर पढ़वा कर मुझे तसल्ली नहीं मिली लेकिन अब पूरी की पूरी किताब तो यहाँ पेश नहीं की जा सकती न इसलिए तो सोचा चलो आपको कुछ फुटकर शेर भी पढ़वाता चलूँ , अच्छा लगे तो बताइए जरूर : 

सुना है अस्ल-ऐ-गुलिस्तां सिवा-ऐ-ख़ाक नहीं 
अगर ये सच है तो खुशबू कहाँ से आती है 
अस्ल-ऐ-गुलिस्तां=उपवन का आधार , सिवा-ऐ-ख़ाक =मिटटी के अतिरिक्त
 *** 
याद आएँगी बहुत नींद से बोझिल पलकें 
शाम के साथ ये दुःख और घनेरा होगा 
 *** 
ज़िन्दगी ख़्वाब के साये में बसर हो जाती 
सोचा होता तुझे ,ऐ काश न देखा होता 
 *** 
ज़ीस्त तपते हुए सहरा का सफर थी शायद 
 साया होता तो मुसाफ़िर कहीं ठहरा होता
 *** 
नश्शा-ऐ-कुर्ब से आँखों का गुलाबी होना 
 खून में उठती हुई लहर से डरना उसका 
नश्शा-ऐ-कुर्ब=निकटता का नशा 
   *** 
आइना हँसता है,हँसने दो,मिरे चेहरे पर
सैंकड़ों ज़ख्म हैं हाथों से छुपाऊँ कैसे 
 *** 
अगर ये होश की दीवार गिर जाये 
 मज़ा आये तमाशा देखने में 
 *** 
बरसे जो खुल के अब्र तो दिल का कँवल खिले 
 कब तक मिज़ा-मिज़ा पे समन्दर उठाइये 
 अब्र=बादल, मिज़ा-मिज़ा=पलक-पलक 
 *** 
आईना रूठ गया चेहरे से
 इस मकाँ में नहीं रहता कोई 
 *** 
जो मुझको छोड़ गया इतना बेख़बर तो न था
 जो हमसफ़र है, मिरा दर्द जानता ही नहीं 
 *** 
जो भी गुज़रनी है आँखों पर काश इक बार गुज़र जाये 
 सर्द हवा में जुल्म तो ये है पत्ता-पत्ता गिरता है

Monday, September 4, 2017

किताबों की दुनिया -141

तुम्हारी याद में आँखों से जब बरसात होती है 
तो खुशबू में नहाई चाँद-सी वो रात होती है 

किसी से हम मुख़ातिब हों कोई हो रूबरू अपने 
तुम्हीं को देखते हैं और तुम्हीं से बात होती है 

हमारे पास तो ले देके बस है दर्द की दौलत 
बड़े आराम से अपनी बसर औक़ात होती है 

मान लीजिये कि आप "कौन बनेगा करोड़पति " कार्यक्रम की हॉट सीट पे बैठे हैं और अमिताभ बच्चन आपसे पूछें कि दिल्ली में उर्दू की प्रथम महिला पत्रकार का नाम बताएं जो अपने समय की बेहतरीन शायरा भी रहीं हैं ,तो आप क्या जवाब देंगे ? आपके पास नाम बताने के लिए चार ऑप्शन भी अगर नहीं हैं तो हो सकता है कि अगर आप हिंदी भाषी हैं तो शायद इस सवाल पर सर खुजाएँ और किसी लाइफ लाइन जैसे "फोन ऐ फ्रेंड" या "ऑडियंस पोल" का चुनाव करें पर उर्दू प्रेमी और पुराने लोग मुमकिन है कि इसका जवाब दे पाएं।

गुमां यक़ीन की हद तक कभी नहीं आया 
भरोसा अपनी समझ पर मुझे ज़ियादा था 

न जाने कैसे हुई मात बादशाह को भी 
हमारे पास तो ले-देके इक पियादा था

तुम्हारे दौर से 'सर्वत' निबाह कर न सकी 
कि उसके पास रिवायत का इक लबादा था 

मक्ते में शायरा का नाम आने से हो सकता है आप में से कुछ को उनका का नाम याद आ गया हो लेकिन जिन्हें नहीं आया उन्हें बता दूँ कि हमारी आज की शायरा है 28 नवम्बर 1949 को दिल्ली में जन्मी " नूरजहां सर्वत " जिनकी किताब " बेनाम शजर " की बात आज हम करेंगे। ये किताब वाणी प्रकाशन से सन 2000 में प्रकाशित हुई थी।


वक़्त, अल्फ़ाज़ का मफ़हूम बदल देता है 
देखते-देखते हर बात पुरानी होगी 
मफ़हूम =अर्थ 

बेज़बाँ कर गया मुझको तो सवालों का हुजूम 
ज़िन्दगी आज तुझे बात बनानी होगी 

कर रही है जो मेरे अक्स को धुंधला 'सर्वत ' 
मैंने दुनिया की कोई बात न मानी होगी

'सर्वत' साहिबा ने अपनी तालीम की शुरुआत दिल्ली के बुलबुली खन्ना सीनियर सेकण्डरी स्कूल से की और फिर दिल्ली कालेज अजमेरी गेट से बी.ऐ. की डिग्री हासिल की। दिल्ली विश्विद्यालय से 1971 में उन्होंने एम.ऐ की डिग्री डिस्टिंक्शन से हासिल की। नूरजहां अपने समय की बहुत मेधावी छात्र रहीं। उन्होंने अपनी विलक्षण योग्यता का परिचय "जवाहर लाल नेहरू" यूनिवर्सिटी और उसके बाद ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में लेक्चरर के पद पर छात्रों को पढ़ाते हुए दिया।

याद है उससे बिछुड़ने का समां 
शाख़ से फूल जुदा हो जैसे 

हर क़दम सहते हैं लम्हों का अज़ाब 
ज़िन्दगी कोई खता हो जैसे 
अज़ाब =यातना 

ज़िन्दगी यूँ है गुरेज़ाँ 'सर्वत' 
हमने कुछ मांग लिया हो जैसे 
गुरेज़ाँ =दूर दूर रहना 

कुछ समय तक वो आल इण्डिया रेडिओ के साथ रहीं और रेडिओ के लिए विभिन्न क्षेत्र से जुड़े लोगों से गुफ़्तगू की ज़िम्मेवारी सफलता से निभाई। सन 1980 से उन्होंने "कौमी एकता" अखबार के साथ बतौर पत्रकार काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने बाद में उस पत्रिका के रविवारीय संस्करण के संपादक की हैसियत से भी काम संभाला। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी निडरता और खुले विचारों ने सबको प्रभावित किया। मुंबई के "इंक़लाब " अखबार के दिल्ली रेजिडेंट संपादक पद पर भी उन्होंने काम किया और और इस तरह उन्होंने दिल्ली की प्रथम महिला संपादक होने का श्रेय हासिल किया।

गुरुर से सर उठा रहे थे, वो जश्ने-हस्ती मना रहे थे 
हवा ने खींचा जब अपना दामन, हवा हुए फिर हुबाब सारे 
हुबाब=बुलबुला 

वो खुशबुओं का लिबास पहने, मिला कुछ ऐसे कि एक पल में 
पड़े हुए थे जो जिस्मो-जां पर, उतर गए वो नकाब सारे 

सवाल सादा सा ज़िन्दगी से, किया था हमने भी एक 'सर्वत' 
वो पत्थरों की हुई है बारिश, कि मिल गए हैं जवाब सारे 

नूरजहां 'सर्वत'साहिबा के लिए प्रो शारिब रदौलवी साहब ने लिखा है कि "सर्वत उर्दू की एक अच्छी और मक़बूल शायरा हैं। उर्दू में ख़ासतौर से हिन्दुस्तान में शायरा का तसव्वुर बड़ा अजीब है, रिवायती किस्म के अशआर, मुतारन्नुम आवाज़, निजी कैफ़ियतों से आरी (रिक्त) शायरी। लेकिन 'नूरजहां' इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ हैं। पत्रकार की हैसियत से ज़िन्दगी को उन्होंने बहुत करीब से देखा है तभी इन अनुभवों ने उनकी शायरी में एक अजीब किस्म की बेचैनी और कर्ब पैदा कर दिया है। 

तन्हाइयों की बर्फ कि पिघली नहीं हनोज़ 
यादों के ऐतबार की भी धूप छंट गयी 

हमने वफ़ा निभाई बड़ी तम्कनत के साथ 
अपने ही बल पे ज़िंदा रहे उम्र कट गयी
तम्कनत = गर्व

'सर्वत' हरेक रुत में लपेटे रहे जिसे 
वो नामुराद आस की चादर भी फट गयी

 "बेनाम शजर" नूरजहां साहिबा का एक मात्र मजमुआ है जो 1995 में उर्दू में शाया हुआ और सन 2000 में वाणी प्रकाशन से हिंदी में। इस किताब में 'सर्वत' जी की 34 ग़ज़लें और 42 नज़्में संकलित हैं। उनकी नज़्में भी ग़ज़लों की तरह पूरी दुनिया में मकबूल हुईं। उन्होंने अपनी ही तरह की अलग सी शैली की में कही गयी ग़ज़लों और नज़्मों से पूरी दुनिया के उर्दू प्रेमियों को अपना दीवाना बना दिया। दुनिया के हर ऐसे देश में जहाँ उर्दू बोली या समझी जाती है उन्होंने अपने फ़न का झंडा गाड़ा है।

तय करो अपना सफर तन्हाइयों की छाँव में 
भीड़ में कोई तुम्हें क्यों रास्ता देने लगा 

कुरबतों की आंच में जलने से कुछ हासिल न था 
कैसे-कैसे लुत्फ़ अब ये फ़ासला देने लगा 
कुर्बत=निकटता

'सर्वत' साहिबा इस किताब की भूमिका में लिखती है कि 'शायरी की असल बुनियाद एहसासो-फ़िक्र है लेकिन आज का इंसान संवेदनाओं और कोमल भावनाओं से कोसों दूर हो गया है , इंसानी रिश्ते बेमानी हो गए हैं ,तहज़ीब के धागे में पिरोये मोती बिखर के टूट चुके हैं। हमारे बीच बड़ा से बड़ा हादसा यूँ गुज़र जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। किसी को किसी के लिए सोचने ठहरने की फुर्सत नहीं है ऐसे हालात में शायरी बहुत मुश्किल हो गयी है , अगर इंसान इसी तरह फ़िक्रों-एहसास से दूर होता चला गया तो शायरी नामुमकिन हो जाएगी।

भुला चुके थे मगर ये मुआमला कब था 
उसे न याद करें इतना हौसला कब था 

सहारा बख़्श दिया हमको यादे-माज़ी ने 
तुम्हारे दौर में जीने का वलवला कब था 
यादे-माज़ी =अतीत की याद ; वलवला =उत्साह 

उजाले जिसने बिखेरे हैं मेरी राहों में 
तिरि सदा थी सितारों का काफला कब था 

प्रोफ़ेसर 'गोपी चंद नारंग' साहब फरमाते हैं कि " नूरजहां सर्वत ' के यहाँ तुरंत चकाचौंध कर देने वाली दुनिया नहीं है, मानवीय रिश्तों के उतार चढ़ाव और दर्द का ऐसा धुंधला-धुंधला उजाला अवश्य है जो रूह में उतर जाता है और किसी न किसी कैफियत का पता देता है। ये शायरी जरुरत की पैदावार नहीं अंदर की आवाज़ है।

दिल्ली उर्दू अकेडमी ने उन्हें उर्दू की खिदमत करने पर अवार्ड भी दिया था। अपनी शायरी से उर्दू अदब को मालामाल कर देने वाली इस शायरा ने मात्र 60 साल की उम्र में ,17 अप्रेल 2010 को, इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके पत्रकारिता और उर्दू अदब के क्षेत्र में दिए योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता और ना ही उनके द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थान को कभी भरा जा सकता है।

बहुत डूबे रहे मन की चुभन में 
ज़रा अब जा के देखें अंजुमन में 

हुए हैं शहर इंसानों से खाली 
कि तहज़ीबें बसी हैं जा के बन में 

भला आईने को इसकी खबर क्या
कि कितना खोट है किस-किस के मन में 

कहूं क्या उसमें किस दर्ज़ा कशिश थी 
कि 'सर्वत' खो गयी जिसकी लगन में 

इस किताब की प्राप्ति के लिए आप वाणी प्रकाशन को लिखें जिसका पता और नंबर मैंने अपनी पिछली बहुत सी पोस्ट में दिया है। अगर वाणी से ये किताब नहीं मिले तो आप इस लिंक को कॉपी करें और गूगल कर लें ये लिंक आपको आन लाइन ऑर्डर करने की सुविधा देगा



हर उर्दू शायरी के दीवाने के पास ये किताब होनी चाहिए क्यों की इसमें कुछ ऐसी नज़्में हैं जो संग्रहणीय हैं और जिन्हें मैंने भी ज़ाहिर नहीं किया है. आखिर थोड़ा सस्पेंस भी बना रहना जरूरी है न। अगली किताब की तलाश से पहले चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर और पढ़वाता चलता हूँ :

आपबीती में भला किसको मज़ा आएगा
दास्ताँ अपनी यहाँ किसको सुनाने निकले

कितने कमज़र्फ थे वो लोग जो अपने घर से
बेबसी अपनी ज़माने को दिखाने निकले
कमज़र्फ =ओछे

दिल की दुनिया में अभी तक हैं अकेले 'सर्वत'
हम तो नादान रहे लोग सयाने निकले

Monday, August 28, 2017

किताबों की दुनिया - 140

शेर एक तितली है
ज़ेहन के गुलिस्ताँ की रंग-रंग दुनिया में
पंखुड़ी से पर लेकर
नाचता ही रहता है

शायर एक बच्चा है
ज़ेहन के गुलिस्ताँ की रंग-रंग दुनिया में
उस हंसीं पैरों वाली बेक़रार तितली के पीछे-पीछे चलता है
गिरता है
संभलता है
आस्तीन फटती है
दामन-ओ-गिरेबाँ के तार झनझनाते हैं
टूट टूट जाते हैं

धीरे धीरे लफ़्ज़ों की उँगलियाँ संभलती हैं
और वो हसीं तितली
उन पे बैठ जाती है
अपने पर हिलाती है
रंग छोड़ जाती है

ये नज़्म उस शायर की है जिन पर इतना कुछ लिखा जा सकता है कि ऐसी एक नहीं ढेरों पोस्ट्स लिखें तो भी कम पड़ेगीं। उनके लिए तो ये कहना भी मुश्किल है कि वो नस्र के बादशाह थे या शायरी के सुलतान ? इंसान ऐसे कि फांसी के तख़्ते पर खड़े हो कर सच बोलें और जिस काम को दिल न माने वो किसी भी कीमत पर करने को तैयार न हों। टी.वी सीरियल हों या फ़िल्में उन्होंने जिस विधा में लिखा अपनी अमिट छाप छोड़ दी। खूबसूरत इतने की लड़कियां उनकी तस्वीर अपने तकिये के नीचे रख के सोया करती थीं इस से पहले इस तरह के किस्से सिर्फ और सिर्फ मज़ाज़ के लिए मशहूर थे।

ये फ़न-ए-शेर है बेहिसों के बस का नहीं 
हो दिल में आग तो अलफ़ाज़ से धुआं निकले 

तुम्हारी बज़्म नहीं ये हमारी दुनिया है 
तुम आस्तीन चढ़ाये हुए कहाँ निकले 

कई उफ़क़ कई रातें कई दरीचे हैं 
तुम्हारे शहर में सूरज कहाँ कहाँ निकले 

क्रीम कलर की शेरवानी सफ़ेद कुरता पायजामा और उस पर पान से लाल होंठ उनकी पहचान थी। पोलियो के कारण उनके एक पाँव में खराबी आ गयी जिसकी वजह से वो लचक कर चलते थे लेकिन जिधर से गुजरते, देखने वालों के चेहरे उधर ही मुड़ जाया करते थे। लोगों ने उनके मुँह से शायद ही उनका कलाम सुना हो क्यूँकि वो कभी मुशायरे में नहीं जाते थे , क्यों नहीं जाते थे ये भी बताता हूँ , आप पहले उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर तो जरा पढ़ें :

जख्म-ए-दिल का ये शजर सबसे जुदा होता है 
धूप लगती है तो ये और हरा होता है 

अब सियासत की दुकानों का ये दस्तूर हुआ 
वही सिक्का नहीं चलता जो खरा होता है 

अब कोई रास्ता पूछे कि न पूछे उससे 
वरना हर शख़्स में इक राहनुमा होता है 

तो बताता हूँ की वो मुशायरों में क्यों नहीं जाते थे , हुआ यूँ कि हमारे आज के शायर साहब की बेगम को घुड़सवारी का बेहद शौक था इसके चलते उनके कभी घुटने छिलते कभी कमर तो कभी हाथ जख्मी हो जाते तो कभी गर्दन में बल पड़ जाता ,रोज रोज होने वाले इन हादसों से तंग आ कर उन्होंने अपनी बेग़म को घुड़सवारी से तौबा कर लेने का फ़रमान सुना दिया , अब साहब वो बेग़म ही क्या जो शौहर की बात आँख मूँद कर मान ले तो उन्होंने पलट वार करते हुए उनसे ये वादा लिया कि वो भी कभी किसी मुशायरे में नहीं जाएंगे। बस उसके बाद न बेगम घोड़े पे बैठीं न ये हजरत मुशायरा पढ़ने कहीं गए जबकि उनके पास पूरी दुनिया से बुलावे आते थे। अब वक्त आ गया है कि आप पर हमारे आज के शायर का नाम जाहिर कर दिया जाय लेकिन उसके पहले उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पढ़िए जिसने उन्हें और जगजीत दोनों को जबरदस्त मकबूलियत बक्शी :

हम तो हैं परदेस में ,देश में निकला होगा चाँद 
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चाँद 

जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात 
उनमें शायद अब ऑंसू का क़तरा होगा चाँद 

रात ने ऐसा पेच लड़ाया टूटी हाथ की डोर 
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद 

चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते 
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद 

आया कुछ याद ? चलिए मैं ही बता देता हूँ क्यूंकि "किताबों की दुनिया" कोई सस्पेंस थ्रिलर तो है नहीं जिसमें कातिल का नाम आखरी पन्ने पर पता चलता है, तो हमारे आज के शायर हैं डाक्टर " राही मासूम रज़ा " साहब जिनकी ग़ज़लों और नज़्मों की किताब " ख्यालों के कारवाँ " का जिक्र आज हम करने जा रहे हैं।इस किताब में उनकी चुनिंदा ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन किया है जनाब "सुरेश कुमार " साहब ने और प्रकाशित किया है "डायमंड बुक्स " नै दिल्ली ने।


इस सफर में नींद ऐसी खो गयी
हम न सोये रात थक कर सो गयी

हाय इस परछाइयों के शहर में
दिल-सी ज़िंदा इक हकीकत खो गयी

हमने जब हँसकर कहा मम्नून हैं 
ज़िन्दगी जैसे पशेमाँ हो गयी 
मम्नून - आभारी 

"राही" साहब को अधिकतर लोग उनके कालजयी टी.वी. सीरियल "महाभारत" ,जो 2 अक्टूबर 1988 से 24 जून 1990 तक हर रविवार को सुबह 10 बजे से 11 बजे तक दूरदर्शन से लगातार प्रसारित होता रहा ,के लेखक के रूप में अधिक जानते हैं। "महाभारत" की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रसारण के एक घंटे के दौरान पूरा कामकाज ठप्प हो जाता था सड़कें वीरान हो जाया करती थीं और लोग टी वी से चिपक जाया करते थे। "महाभारत" ने एक ऐसी भाषा को जन्म दिया जिसे पहले कभी सुना नहीं गया था। लोग हैरत में थे कि कैसे एकदम नयी शैली में रचे गए संवादों के बल पर एक गैर हिन्दू ने इस महाकाव्य को देश के घर घर में इतना लोकप्रिय बना दिया जिसकी मिसाल ढूंढें नहीं मिलती।

प्यास बुनियाद है जीने की बुझा लें कैसे 
हमने ये ख़्वाब न देखे हैं न दिखलाये हैं 

याद जिस चीज को कहते हैं वो परछाईं है 
और साये भी किसी शख़्स के हाथ आये हैं 

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आये हैं 

ज़मीन पर पेट के बल लेट कर गाव तकियों के सहारे कोहनी टिकाये राही साहब एक साथ तीन-चार फिल्मों ,टी.वी. सीरियल की स्क्रिप्ट लिखा करते थे। एक बार उन्हें एक प्रोडूसर अपनी फिल्म की कहानी लिखवाने एक महीने के लिए कश्मीर ले गया वहां के शानदार होटल में पूरा महीना बिना एक लफ्ज़ लिखे वो वापस आ गए और घर आते ही अपने निराले पोज़ में लेट कर कहानी लिख डाली। "महाभारत" की अपार सफलता ने उनके घर के बाहर टी.वी फिल्म वालों की लाइन लगवादी लेकिन उन्होंने कभी पैसे के लिए अपनी कलम नहीं बेची जिसपे मेहरबान हुए उसके लिए महज़ एक पान की एवज़ में फ़िल्मी स्क्रिप्ट लिख के दे दी।

ये खुशबू है किसी मौजूदगी की 
अभी शायद कोई उठ कर गया है 

सलीब आवाज़ की कन्धों पे रख लो 
कि सन्नाटा हर आँगन में खड़ा है 

ये राही तो अजब इंसान निकला 
हमेशा किसलिए सच बोलता है 

मजे की बात है की जब जब उन्होंने हिंदी में लिखा तो हिंदी वाले उन्हें हिंदी का लेखक समझने लगे और जब कलम उर्दू में चलाई तो उर्दू वाले उनके मुरीद हो गए। भाषा पर ऐसा अधिकार बिरलों को ही होता है। उनका उपन्यास " आधा गाँव" हिंदी साहित्य में मील के पत्थर की हैसियत रखता है। ये उपन्यास जिला गाज़ीपुर के "गंगोली" गाँव की कहानी बयां करता है जहाँ 1 सितम्बर 1927 को उनका जन्म हुआ था। बाद में गाज़ीपुर में उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को चुना और हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

महफ़िल वाले जल्दी में हैं जाने की 
फिर हम क्यों तौहीन करें अफ़साने की 

या तो उसके ज़ख्मों का मरहम लाओ 
या फिर हालत मत पूछो दीवाने की 

नासेह साहब आप तो अपनी हद में रहें 
मंज़िल पीछे छूट गयी समझाने की 

डॉक्टरेट करने के बाद वे वहीँ यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगे लेकिन अपने प्रगतिशील विचारों के चलते उनकी पटरी अलीगढ के दकियानूसी लोगों के साथ बैठी नहीं और वो किस्मत आजमाने मुंबई आ गए। मुंबई में उनके पाँव ज़माने में उनके दोस्तों जिनमें अभिनेता भारत भूषण , लेखक कमलेश्वर और धर्मवीर भारती उल्लेखनीय हैं ,ने बहुत मदद की। मुंबई में ही साहित्य की लगातार साहित्य की सेवा करते हुए वो 15 मार्च 1992 को मात्र 64 साल की उम्र में इस दुनिया-ए-फ़ानी से रुख़सत हो गए। अपने पीछे वो साहित्य का बहुत बड़ा खज़ाना छोड़ गए हैं जिसे आगे आने वाली पीढ़ियां पढ़ उन पर गर्व करेंगी। 

 बैठ के उसके नाम कोई खत ही लिखिए 
रात को यूँ ही जागते रहना ठीक नहीं 

जुल्म का सहना भी आदत बन सकता है 
उसके भी हर जुल्म को सहना ठीक नहीं 

बादल झील में देख रहे हैं अपना हुस्न 
इस मौसम में घर पर रहना ठीक नहीं 

 मैंने शुरू में ही कहा था कि राही जी जैसी कद्दावर शख्सियत के बारे में जितना लिखा जाय कम ही होगा लेकिन पोस्ट की अपनी एक सीमा है इसलिए कहीं तो विराम देना ही पड़ेगा। आप तो इस किताब को डायमंड बुक्स वालों से मंगवा लें और फिर इत्मीनान से पढ़ें , इसमें संकलित राही साहब की नज़्में भी लाजवाब हैं।
चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पेशे खिदमत हैं :

बाहर आते डरते हैं अपने-अपने अफ़साने से 
कल तक जो दीवाने थे अब लगते हैं दीवाने से 

सबके पास कई नासेह हैं और सभी समझाते हैं 
अक्सर लोग बिगड़ जाते हैं बहुतों के समझाने से 

क्यों इतने मगरूर हो राही क्यों इतने इतराते हो
गंगा-तट वीरान न होगा इक उनके उठ जाने से

Monday, August 21, 2017

किताबों की दुनिया - 139

गर्दने खिदमत में हाज़िर हैं हमारी लीजिये 
भोंतरे ही ठीक हैं, चाकू न पैने कीजिये 

दाना-पानी तक को ये पिंजरा नहीं खोला गया 
जब से मैंने कह दिया है -मेरे डैने दीजिये 

हम हुए सुकरात सारे दोस्तों के बीच में
'एक प्याला और' कोई कह रहा था लीजिये 

आपको चेहरे नहीं बिखरी मिलेंगी बोटियाँ 
आदमी को आदमी के सामने तो कीजिये 

जब कभी भी हिंदी ग़ज़ल की बात होती है तो सिर्फ एक नाम सबसे पहले हमारे ज़ेहन में आता है और वो है -दुष्यंत कुमार का जबकि उनकी तरह ही कानपुर का एक युवा शायर ऐसी ही धारदार तल्ख़ ग़ज़लें हिंदी में निरंतर कह रहा था। दुष्यंत उस उस वक्त हिंदी की लोकप्रिय पत्रिका 'सरिता' में छपने के साथ साथ अपनी चुटीली भाषा के कारण, जो उनसे पहले हिंदी ग़ज़लों में बहुत कम या न के बराबर नज़र आयी थी , चर्चित हो गए । आज हम किताबों की दुनिया में हिंदी ग़ज़ल के एक उसी तरह के बागी तेवरों वाले सशक्त हस्ताक्षर 'विजय किशोर मानव' की ग़ज़लों की किताब "आँखें खोलो " की बात करेंगे जिसे किताब घर प्रकाशन वालों ने सन 2005 में प्रकाशित किया था।


कुनबों के दरबार हमारी बस्ती में 
उनके ही अखबार हमारी बस्ती में 

आज राजधानी जाने की जल्दी में 
मिलता हर फनकार हमारी बस्ती में 

सुनें हवा की या आँखों की फ़िक्र करें 
तिनके हैं लाचार हमारी बस्ती में 

घास फूस के घर अलाव दरवाज़े पर 
आंधी के आसार हमारी बस्ती में 

रवायती और रोमांटिक शायरी जिसमें गुलशन फूल खुशबू तितली झील नदी पहाड़ समंदर दिल चाँद सितारे रात नींद ख़्वाब जैसे मखमली लफ़्ज़ों का भरपूर इस्तेमाल होता है से किनारा करते हुए विजय किशोर जी ने अपनी ग़ज़लों में ज़िन्दगी और समाज की तल्ख़ हकीकतों पर सीधे चोट करते हुए खुरदरे लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किया और लाजवाब शायरी की। उनकी शायरी हमारे समाज का आईना हैं।

बारूद, नक़ाबें , सलीब, माचिसें तमाम 
क्या क्या जमा किये हैं हमारे शहर में लोग 

पांवों पे पेट, पीठ पर निशान पाँव के 
कंधे पर घर लिए हैं हमारे शहर में लोग 

इंसान गुमशुदा है फरेबों के ठिकाने 
फिर होंठ क्यों सिये हैं हमारे शहर में लोग 

जनाब शेर जंग गर्ग ने किताब के फ्लैप पर लिखा है कि "आँखें खोलो की ग़ज़लों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मानव ने ग़ज़ल की प्रचलित बहरों के साथ साथ नए अंदाज़ एवं नए रंग में भी कई ग़ज़लें कही हैं। इस लिहाज़ से उन्होंने ग़ज़ल को भी घिसे-पिटे ढांचे से एक हद तक बाहर निकाला है। उनकी ग़ज़लों में ऐसी अनेक पंक्तियाँ हैं जो उनके भाषाई बांकपन, गहन संवेदनशीलता एवं सहज कथन कौशल को उजागर करती है।"

बेड़ी न हथकड़ी है, दिखती नहीं सलाखें 
हर मोड़ पर जेलें हैं हम किस शहर में हैं 

सच कह के चूर होते आईने खौफ में हैं 
हर हाथ में ढेले हैं हम किस शहर में हैं 

ये कौन से जलवे हैं ये कैसा उजाला है 
सब आग से खेले हैं हम किस शहर में हैं 

9 अक्टूबर 1950 को कानपूर के रामकृष्ण नगर मुहल्ले में जन्में विजय जी ने भौतिकी रसायन शास्त्र और गणित विषयों से स्नातक की डिग्री हासिल की और प्रिंट मिडिया से जुड़ गए और लगभग 25 वर्षों तक हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की प्रसिद्ध पत्रिका कादम्बिनी के एग्जीक्यूटिव एडिटर रहे। उनका लेखन इस दौरान सतत चलता रहा। अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर उन्होंने गीत ग़ज़ल कहानी तथा समीक्षा जैसी विधाओं पर दक्षता हासिल की जिसके फलस्वरूप उनकी हर विधा की रचनाओं का देश की लगभग सभी छोटी बड़ी पत्र -पत्रिकाओं में लगभग तीन दशकों से अब तक प्रकाशन होता आ रहा है।

युग का सच बारूदी गंधें 
खुशबू के फव्वारे झूठे 

सब के मुंह पर पूंछ लगी है 
इंकलाब के नारे झूठे 

अब सच्चे लगते बाज़ीगर 
गाँधी गौतम सारे झूठे 

नौकरी के झमेले से मुक्त हो कर विजय जी ने अपनी प्रतिभा का झंडा एस्ट्रोलॉजी के क्षेत्र में गाड़ दिया। मैंने किताबों की दुनिया की श्रृंखला के लिए कम से कम 200 -300 शायरों के बारे में तो पढ़ा ही होगा लेकिन मेरी नज़र में ऐसा कोई शायर नहीं गुज़रा जिसने शायरी के अलावा इंसान की बीमारी, नौकरी, शिक्षा , पारिवारिक समस्याओं ,व्यापार या रिश्तों के सुधार के लिए भविष्यवाणियां की हों और उनसे निबटने के रास्ते सुझाये हों। विजय जी ने हिंदी साहित्य के अध्ययन के अलावा वेदों पुराने और रहस्यमय विज्ञान का गहन अध्ययन किया और ज्योतिष विज्ञान में महारत हासिल कर ली।

बगुले चलें यहाँ हंसो की चाल सुना तुमने 
लोहे की तलवार काठ की ढाल सुना तुमने 

दांव-पेच के दाम बढे कौड़ी में दीन-धरम 
लोग कि जैसे धेले में हर माल सुना तुमने 

बेशुमार फुटपाथ घूम आये अपने चूल्हे 
कारिंदों के महल बनें हर साल सुना तुमने

"आँखे खोलो" ग़ज़ल संग्रह की भूमिका में विजय जी का हिंदी ग़ज़ल पर लिखा आलेख भी पढ़ने लायक है। उन्होंने बहुत सारगर्भित ढंग से हिंदी ग़ज़ल की यात्रा की विवेचना की है।अपनी ग़ज़लों के बारे में उनका कहना है कि " मेरी ग़ज़लें हिंदी की हैं। इस अर्थ में भी कि इनमें मैट्रिक छंद का अनुशासन है, पूरी रवानी है काफियों का निर्वाह हिंदी गीतों की तर्ज़ पर है और इन ग़ज़लों में विषय वस्तु के अनेक प्रयोग हैं।

बौने हुए विराट हमारे गाँव में 
बगुले हैं सम्राट हमारे गाँव में 

घर घर लगे धर्म कांटे लेकिन 
नकली सारे बाँट हमारे गाँव में 

मुखिया का कुरता है रेशम का 
भीड़ पहनती टाट हमारे गाँव में 

आपको ऐसी अनेक अलग मिज़ाज़ की ढेरों ग़ज़लें इस संग्रह में पढ़ने को मिलेंगी , इस किताब को पढ़ने के लिए आपको किताब घर प्रकाशन को उनके अंसारी रोड दरियागंज वाले पते पर लिखना पड़ेगा या फिर उन्हें उनके फोन न (+91) 11-23271844 पर पूछना पड़ेगा , आप किताब घर वालों को पर ईमेल करके भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ,सबसे बढ़िया तो ये है कि आप विजय जी को उनके मोबाईल न. 098107 43193 पर संपर्क इन लाजवाब ग़ज़लों के लिए पहले बधाई दें और फिर किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। चलते चलते उनकी एक और ग़ज़ल के चंद शेर आपको पढ़वाता चलता हूँ :

कब से ये शोर है शहर भर में 
हो रही भोर है शहर भर में 

सलाम, सजदे हाँ हुज़ूरी का 
आज भी जोर है शहर भर में 

एक मादा है कोई भी औरत 
मर्द हर ओर है शहर भर में

Monday, August 14, 2017

किताबों की दुनिया - 138

मेरा चेहरा वही ,वही हूँ मैं 
बात इतनी है वक्त दुश्मन है 

आ गयी फिर ख़ुशी मिरे दिल में 
ये मेरी शायरी की सौतन है 

चंद कतरे हैं मेरी आँखों में 
मेरा सावन भी कितना निर्धन है 

ये तो इत्तेफ़ाक़ ही है -आप इसे हसीन कहें तो आपकी मर्ज़ी लेकिन ये है इत्तेफ़ाक़ ही। आपको बताऊंगा तो आप भी कहेंगे क्या ग़ज़ब का इत्तेफ़ाक़ है। बताइये आज तारीख़ क्या है ? जी हाँ चौदह अगस्त सोमवार और चौदह अगस्त के दिन याने आज ,मैं जिस शायर की किताब की चर्चा मैं करने वाला हूँ वो भी चौदह अगस्त को पैदा हुए थे ,बात यहीं रुक जाती वहां तक भी ठीक था लेकिन रुकी नहीं आज याने चौदह अगस्त को ख़ाकसार का भी जनम दिन है। यूँ जन्मदिन का जीवन में कोई विशेष महत्त्व नहीं होता ,जिसने जनम लेना है वो आज नहीं तो कल लेगा ही, जनम लेने और जनम देने वाले का इस क्रिया में कोई विशेष योगदान नहीं होता। ये सब प्रकृति के नियमानुसार होता है। पर इस पोस्ट की तिथि का पोस्ट के शायर की जन्म तिथि और ब्लॉग लेखक की जनम तिथि के साथ पड़ना महज एक संजोग है जो पहली बार इस 8 साल पुरानी श्रृंखला में हो रहा है।

इस तथ्यहीन बात को यहीं छोड़ आईये आज उनकी ग़ज़लों की किताब से कुछ और ग़ज़लों के शेर पढ़ते हैं :-

थोड़ी सस्ती है थोड़ी महंगी है 
ज़िन्दगी भी तो खीर टेढ़ी है 

जब लिपटता है चाँद से सूरज 
बर्फ जलती है आग बुझती है 

एक जुगनू बता गया मुझको 
तीरगी उससे खौफ खाती है 

तुझसे बिछुड़ा तो हो गया शायर 
तुझसे बेहतर तेरी जुदाई है 

जुदाई को वस्ल से बेहतर बताने वाले हमारे आज के अलबेले शायर हैं जनाब 'शाहजहाँ 'शाद' साहब जिनकी किताब 'हम' की बात आज हम करेंगे। 14 अगस्त 1961 को शाहजहाँ शाद साहब सूबा-ए-उत्तर प्रदेश में मर्दुम-खेज जिला गाज़ीपुर के महेंद्र गाँव में पैदा हुए ,इल्मो- अदब के शहर आज़मगढ़ में पल-बढ़ एवम लिख कर रोजी रोटी की तलाश में सूबा-ए-गुजरात के हीरों की मंडी वाले शहर सूरत में बस गए और हीरे की तरह तराशे चमकदार शेर कहने लगे।


वो सलीके से जान लेते हैं 
हम जिन्हें अपना मान लेते हैं 

एक डाली पे फिर नहीं रहते 
जब परिंदे उड़ान लेते हैं 

लोग झूठी अना की इक चादर 
ओढ़ लेते हैं तान लेते हैं

'शाद' इन्साफ यूँ भी होता है 
बेजुबां से बयान लेते हैं 

जनाब 'अहद प्रकाश' ने इस किताब की एक भूमिका में उनके लिए लिखा है कि " किसी किसी पर ग़ज़ल मेहरबान होती है और खुदा का शुक्र है कि शाहजहाँ 'शाद' पर भी ग़ज़ल मेहरबान है। 'शाद' मोहब्बत और इंसानियत के शायर हैं। उनके शेरों में आम आदमी का दिल धड़कता है, सच्चे और मीठे शेर कहने में उनका शुमार होता है। उनके शेरों में हमारी आप बीती मिलती है।

सपनों की जागीर हमारी 
इतने भी कंगाल नहीं हम 

ये मौसम ही रोने का है 
मत समझो, खुशहाल नहीं हम 

जो भी चाहे पकडे, झूले 
उन पेड़ो की डाल नहीं हम 

'शाद' अपने बारे में कहते हैं की ' शायरी भी अजीब शै या बीमारी है। कब, कहाँ और कैसे अपनी जुल्फों का असीर बना ले कुछ कहा नहीं जा सकता। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैं तकरीबन उम्र के 45 साल पूरे करने के बाद इस खूबसूरत बीमारी में मुब्तिला हुआ और अब तो ऐसा महसूस हो रहा है कि यह मर्ज़ आखिरी उम्र तक मेरे साथ ही रहेगा "

आप कहते हैं छोड़ दूँ पीना 
आप क्या मयकशी समझते हैं 

क्यों बुलाते हो प्यार से उनको 
वो जुबाँ दूसरी समझते हैं 

हम भटकते रहे हैं सहरा में 
'शाद' हम तिश्नगी समझते हैं 

 भले ही शाद साहब ने 45 साल की उम्र से शेर कहना शुरू किया हो लेकिन मुझे लगता है कि शायरी उनके जहन में होश सँभालते ही पनपने लग गयी होगी , अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो महज चार पांच साल के छोटे से वक़्फ़े में उनके चार शेरी मजमुए 'वो' सन 2013 में 'तुम' सन 2014 में 'हम' सन 2015 में और 'कागज़ी फूल' सन 2016 में मन्ज़रे आम पर नहीं आ पाते। चार सालों में चार मजमुए इस बात का सबूत हैं कि बरसों से रुकी हुई शायरी की नदिया एक दिन बाँध तोड़ कर जबरदस्त रफ़्तार से बह निकली। हाल ही में गुजरात सरकार द्वारा उनके शेरी मजमुए 'तुम' को सन 2014 के गुजरात साहित्य अकादमी के प्रथम पुरूस्कार के लिए चुना गया है ये सम्मान उन्हें अगले हफ्ते याने 22 अगस्त को अहमदाबाद में प्रदान किया जायेगा।

तेरे निज़ाम को जब चाहेगा बदल देगा 
मियां ये वक्त है , बिगड़ा तो फिर कुचल देगा 

जहाँ भी जाओ मोहब्बत के बीज बो देना 
कहीं तो पेड़ उगेगा कहीं तो फल देगा 

कभी न कहना 'शाद' उससे राज की बातें 
यहाँ सुनेगा वहां जा के वो उगल देगा

'शाद' साहब की फितरत में ही शेर कहना है उनकी कहने की रफ़्तार हैरत में डाल देती है वो इंटरनेट फेसबुक व्हाट्सअप और ट्वीटर पर नियमित रूप से अपने नए नए मयारी शेर पोस्ट करते रहते हैं इसका नतीजा ये है कि अदब की दुनिया में उनका नाम बहुत इज़्ज़त से लिया जाता है । ज़िन्दगी का शायद ही कोई पहलू हो जिसपर 'शाद' साहब ने शेर न कहा हो।

इतनी कुर्बत हो इस मोहब्बत में 
तुम जुबाँ दो मगर निभाएं हम 

इतना रिश्ता रहे बिछड़ के भी 
तुम पुकारो तो लौट आएं हम 

वक्त आएगा 'शाद' वो कब तक 
बेसबब तुम को याद आये हम

'हम' को 'शेरी' अकादमी, भोपाल ने प्रकाशित किया है। आप इस किताब की प्राप्ति के लिए शेरी अकादमी को उनके पते '४-आम वाली मस्जिद रोड , जहांगीर बाद , भोपाल -462008 पर लिखें या 9425377323 पर संपर्क करें। इस किताब के लिए आप शाद साहब को उनके मोबाइल न 9879506884 पर बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। हमेशा की तरह अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वा कर आपसे विदा लेता हूँ :

मेरी खुशियों की एक चाबी है 
जो तेरे पास कबसे गिरवी है 

फिर कभी प्यार-प्यार खेलेंगे 
आज जाने दे पेट खाली है 

तेरी चौखट पे मर गए कितने 
ऐ मोहब्बत तू कितनी भूकी है

'शाद' हासिल नहीं अगरचे कुछ 
पास रहने से बस तसल्ली है

Monday, August 7, 2017

किताबों की दुनिया - 137

ब्याह तो मेरा हुआ, पर दे रहा था हर कोई 
मेरे दुश्मन को बधाई रात के बारह बजे 

तब हुआ एहसास मुझको हो गयी बेटी जवान 
कंकरी जब घर पे आयी रात के बारह बजे 

और 

कहा था मैंने गंगाजल का लाया बोतल 'रम' की 
अब ढक्कन क्यों लगा रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

अभी तो तेरे पूज्य पिताजी अस्पताल पहुंचे हैं 
अभी से सर क्यों मुंडा रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

बहुत जल्द अपने भारत से होगी दूर गरीबी 
किसको उल्लू बना रहा है तू उल्लू के पठ्ठे 

सामान्य स्तिथि में, मुझे यकीन है कि, ऊपर पोस्ट किये शेर पढ़ कर आपके चेहरे पर मुस्कान जरूर आयी होगी। ये भी हो सकता है कि आपने सोचा हो कि आज "किताबों की दुनिया" में किसी मज़ाहिया ग़ज़लों की किताब का जिक्र होने वाला है। अफ़सोस ऐसा नहीं है , हमारे आज के शायर हिंदुस्तान के मशहूर हास्य कवि जरूर हैं लेकिन उनकी शायरी संजीदा और कुछ अलग से मिज़ाज़ की है। आज भले युवा पीढ़ी में उनका नाम अधिक जाना पहचाना न हो लेकिन कभी कवि सम्मेलनों में उनकी तूती बोलती थी। उनकी कुछ एक हास्य व्यंग से सरोबार ग़ज़लें अलबत्ता इस किताब में आपको पढ़ने को जरूर मिल सकती हैं ,जिसका जिक्र मैं करने वाला हूँ। शायर और उनकी किताब का नाम बताने से पहले आईये मैं आपको उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता हूँ : 

हमने मांगी थी ज़रा सी रोशनी घर के लिए 
आपने जलती हुई बस्ती के नज़राने दिए 

ज़िन्दगी खुशबू से अब तक इसलिए महरूम है 
हमने जिस्मों को चमन, रूहों को वीराने दिए 

हाथ में तेज़ाब के फ़ाहे थे मरहम की जगह 
दोस्तों ने कब हमारे ज़ख्म मुरझाने दिए 

गंभीर ग़ज़लें कहने वाले हमारे आज के शायर " माणिक वर्मा " को जब लगा कि अनेक उदगार ऐसे भी हैं जिन्हें उनके मन की बेचैनी और तल्ख़ तजुर्बतों को ग़ज़लों के माध्यम से व्यक्त नहीं किया जा सकता तब उन्होंने अपनी दिशा बदल ली और हास्य सृजन करने लगे। हास्य कविताओं के माध्यम उन्होंने अनेक गंभीर सामाजिक समस्याओं, राजनीति की बुराइयों और इंसांन की कमज़ोरियों को उजागर किया। "किताबों की दुनिया " श्रृंखला में चूँकि सिर्फ ग़ज़लों की बात होती है इसलिए हम उनकी किताब "ग़ज़ल मेरी इबादत है" में प्रकाशित ग़ज़लों की ही बात करेंगे.


सिर्फ दिखने के लिए दिखना कोई दिखना नहीं 
आदमी हो तुम अगर तो आदमी बनकर दिखो 

ज़िन्दगी की शक्ल जिसमें टूटकर बिखरे नहीं 
पत्थरों के शहर में वो आईना बनकर दिखो 

आपको महसूस होगी तब हरिक दिल की जलन 
जब किसी धागे-सा जलकर मोम के भीतर दिखो 

मुझे माणिक जी की ग़ज़ल के बारे में कही ये बात सौ प्रतिशत सही लगती है कि " ग़ज़ल कोशिशों का नाम नहीं है ! ग़ज़ल नाम है उस पके हुए फ़ल का जो पत्थरों की चोट से नहीं अपनी मर्ज़ी से अपने आप टपकता है " माणिक जी की ग़ज़लें पढ़ते वक्त उनकी इस बात का हमें ऐतबार होने लगता है। सहज सरल भाषा में किसी अल्हड़ नदी सा बहाव लिए उनकी ग़ज़लें सीधी दिल में उतर जाती हैं। उनकी ग़ज़लों में मुश्किल लफ़्ज़ों का जमावड़ा और घुमावदार दर्शन आपको ढूंढें नहीं मिलेगा।

धूप के पौधे लगा कर लोग अपने बाग़ में 
चाहते हैं गुलमुहर की छाँव रमजानी चचा 

ये भटकते पंछी मुझसे पूछते हैं क्या कहूं 
क्यों कटे बरगद के बूढ़े पाँव रमजानी चचा 

आप कहते हैं किसी के पास भी माचिस नहीं 
जल गया फिर कैसे अपना गाँव रमजानी चचा 

माणिक जी को लेखन विरासत में मिला उनके पिता स्व. प्यारे लाल वर्मा हिंदी के अतिरिक्त उर्दू फ़ारसी और अंग्रेजी के विद्वान ही नहीं बल्कि धार्मिक एवं राष्ट्रिय धारा के प्रखर कवि भी थे लेकिन दुर्भाग्य से माणिक जी जब मात्र छै वर्ष के ही थे तभी उनका देहावसान हो गया। खंडवा में जन्में माणिक जी ने शिक्षण के अतिरिक्त उर्दू की शिक्षा सेठ हारून रशीद साहब से और शायरी की मुकम्मल तालीम उस्ताद जेहन खान 'नूर' से हासिल की। बाद के दिनों में जनाब बशीर बद्र साहब ने भी उनकी रहनुमाई की।

प्रतीक्षा क्यों दधीची की करें हम 
हमारे तन में भी तो हड्डियां हैं 

जलाने हैं कई नफ़रत के रावण 
तुम्हारे पास कितनी तीलियाँ हैं 

हज़ारों इन्कलाब आये हैं लेकिन 
अभी तक झोपडी में सिसकियाँ हैं 

माणिक जी की ग़ज़लें हमें कभी कभी दुष्यंत कुमार और अदम गौंडवी साहब जैसी लगती जरूर हैं लेकिन अगर उन्हें समग्र पढ़ें तो पता लगता है कि उनके पास विषयों की अधिकता है और प्रस्तुति करण में मौलिकता है। उनकी ग़ज़लों में हिंदी अपने स्वाभाविक रूप में नज़र आती है और मुहावरों का प्रयोग भी वो अद्भुत ढंग से करते हैं. बशीर बद्र साहब फरमाते हैं कि " माणिक वर्मा जी की ग़ज़लें पुरानी यादों को ताज़ा करती हैं नए ज़माने की खूबसूरत शायराना तजुर्बों से रची बसी होती है और ऐसी ग़ज़ल बन जाती है जो ग़ज़ल हिंदी -उर्दू के सरमाये इज़ाफ़ा करती है

सूरज हुआ फकीर तुम्हारी ऐसी तैसी 
जुगनू को जागीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

झूठे आंसू बने तुम्हारे सच्चे मोती 
हम रोयें तो नीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

खाक मुहब्बत करें रोटियों के लाले हैं 
कहाँ के रांझा-हीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

जनता का है देश मगर तुमने समझा है 
अब्बा की जागीर तुम्हारी ऐसी तैसी 

दरअसल 'ग़ज़ल मेरी इबादत है ' पारम्परिक ग़ज़लों की किताब से इस मायने में अलग है कि इसमें माणिक जी की ग़ज़लों के अलावा हज़लों और एक आध नज़्मों का भी समावेश है। अगर हम हज़लों की बात करें तो उसपर एक अलग से पोस्ट लिखनी होगी। ग़ज़लों में भी वो बहुत चुटीली भाषा का प्रयोग करते हैं। डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित इस पेपर बैक में छपी इस किताब को आप अमेजन से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं वैसे डायमंड बुक्स की किताबें आपको किसी भी अच्छे बुकस्टोर से आसानी से मिल जाएँगी। गूगल ने माणिक जी तक पहुँचने में मेरा सहयोग नहीं दिया वरना मैं उनका नंबर या पोस्टल अड्रेस आप तक जरूर पहुंचा देता ,हाँ अगर किसी पाठक के पास उनका नंबर हो तो मुझे बता दे मैं उसे पोस्ट में जोड़ दूंगा। आप माणिक जी की लगभग 94 ग़ज़लों और 28 के लगभग हज़लों से सजी इस किताब को पढ़ने की जुगत करें और मैं निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में , चलते चलते उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर आप सब के लिए प्रस्तुत हैं :-

हमें दुनिया का नक्शा मत दिखाओ 
हमारा घर कहाँ है , ये बता दो 

गुलामी का असर बच्चों पे होगा 
ये पिंजरे में रखा पंछी उड़ा दो 

गरीबी देन है परमात्मा की 
जो ये पोथी कहे उसको जला दो 

और अब ये पढ़िए सोचिये मुस्कुराइए और इन शेरो को रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मुहावरों की तरह इस्तेमाल करिये।

वो तो चस्का लग गया था जाम का 
वरना मैं भी आदमी था काम का 

हैसियत सड़ियल से बैंगन की नहीं 
पूछता है भाव लंगड़े आम का 

मत करे तू इश्क मुझको देख ले 
एक क्विन्टल से हुआ दस ग्राम का 

हुक्म है सरकार का जल्दी भरो 
आज उद्घाटन है मुक्तिधाम का

Monday, July 31, 2017

किताबों की दुनिया - 136

धुंध ठिठुरन चाय स्वेटर और तुम 
मुझको तो इस रुत का चस्का लग गया 

किस तरह पीछा छुड़ाऊं चाँद से 
क्यों मिरे पीछे ये गुंडा लग गया 

बस अभी ही नींद आई है हमें 
और साज़िश में सवेरा लग गया 

उत्तर प्रदेश का एक जिला है गाज़ीपुर, हो सकता है आप जानते हों लेकिन शायद ये नहीं जानते होंगे कि वहां दुनिया का सबसे बड़ा लीगली अफीम बनाने का कारखाना है जो लगभग दो सो साल पुराना है. आप सोचते होंगे कि ग़ाज़ीपुर तक की बात तो चलो ठीक थी पर ये अफ़ीम वाली बात का क्या औचित्य है ? ठहरिये हम बताते हैं, बात दरअसल ये है कि हमारे आज के शायर की पैदाइश गाज़ीपुर की है और उनकी शायरी अफ़ीम के नशे जैसी है , जो एक बार लग जाय तो छूटता नहीं। हमारे आज के शायर की शायरी में ये तासीर घुट्टी में वहां से मिली मिट्टी से आयी है या किसी और वजह से ये शोध का विषय हो सकता है पर इस में कोई संदेह नहीं कि पाठक पर इसका नशा जब चढ़ता है तो फिर उतरने का नाम नहीं लेता।

खुली आँखें तो देखा हर तरफ थीं 
हमारे ख़्वाब से निकली हुई तुम 

तुम्हारे बाद मेरे साथ होगी 
तुम्हारे लम्स में महकी हुई तुम 

है बाहर तेज़ बारिश और घर में 
घटाओं की तरह छाई हुई तुम 

मैं अपनी आग में 'आतिश' घिरा था 
वहीँ नज़दीक थी पिघली हुई तुम 

अपने अशआरों में चाँद ,शाम ,याद, नदी ,शब ,नींद, ख़्वाब,सहर, समंदर , साहिल ,झील ,सूरज और दिल आदि लफ़्ज़ों से तिलिस्म रचने वाले हमारे आज के युवा शायर का नाम है स्वप्निल तिवारी 'आतिश' जिनके लिए उनके उस्ताद मोहतरम जनाब तुफैल चतुर्वेदी ने एक जगह लिखा है "स्वप्निल आपकी ग़ज़ल पढ़ना लफ़्ज़ों की पेन्टिंग देखने का ख़ूबसूरत काम है विद्यापति ने भगवान कृष्ण के लिये अपनी एक कविता में कहा है ‘तोहि सरिस तोहि माधव’ यानी माधव तुम्हारी उपमा केवल तुमसे ही दी जा सकती है। वही आपकी ग़ज़ल का हाल है आप कहां से लाते हैं ये लफ़्ज़ ? ? ? ? ?आपके शेर शब्द-चित्र बनाते हैं। सीधे-साधे लफ़्ज़, छोटे-छोटे बिम्ब मगर एक बड़े कोलाज को शक्ल देते हुए।“
आईये हाल ही में प्रकाशित हुई उनकी किताब "चाँद डिनर पर बैठा है " की बात करते हैं जिसने शायरी की दुनिया में धूम मचा दी।


सुना है जलाये गए शहर कल 
धुआं तक नहीं लेकिन अखबार में 

कहानी वहां है जहाँ मौत ही 
नई जान डालेगी किरदार में 

अब इनके लिए आँखें पैदा करो 
नए ख़्वाब आये हैं बाजार में 

संभल कर मिरि नींद को छू सहर 
हैं सपने इसी कांच के जार में 

लाजवाब शायर और बेहतरीन समीक्षक जनाब मयंक अवस्थी साहब ने उनके बारे में टिप्पणी करते हुए 'लफ़्ज़' के पोर्टल पर लिखा था कि "एक चीज़ काबिले गौर ये भी है कि बेहद जटिल विचारों को भी 'स्वप्निल' की भाषा सुलझा कर आसान कर देती है यही हुनर यही शीशागरी बार बार मुंह से वाह वाह निकलवाती है और इसी तस्वीरी सिफत के लिये ज़माना उनका मुरीद है सबसे कमाल की बात तो ये है कि स्वप्निल के अशार मे हताशा भी धनक रंग मिलती है.

देखते रहने से ही शायद ख़ुदा इक शक्ल ले 
सोचता हूँ और ख़ला में देखता रहता हूँ मैं 

चुन के रख लेता हूँ वक्फ़ा भीगने का मैं तेरे 
बारिशों के बाद उसमें भीगता रहता हूँ मैं 

देखकर तुझको पिघलते हैं ग़मों के ग्लेशियर 
सामने हो तू तो आँखों तक भरा रहता हूँ मैं 

वज्ह अगले पल ही कुछ से और कुछ हो जाती है 
क्या बताऊँ किसलिए इतना डरा रहता हूँ मैं 

मयंक अवस्थी जी आगे लिखते हैं कि "स्वप्निल कुदरत के जब भी नज़दीक जाते हैं बहुत उजली और बहुत खूबसूरत तस्वीर शेर मे ले कर आते हैं !! गज़लो की अगर मिस इण्डिया प्रतियोगिता हो तो स्वप्निल की ग़ज़लें निश्चित रूप से ये क्राउन पहनेगी !! कहाँ कहाँ के मनाज़िर हैं स्वप्निल के पास !!! और कितने शेडस हैं ??!! सभी एक से बढकर एक !!यह तय है कि लफ़्ज़ स्वप्निल के इख़्तियार में रहते हैं और वो उनसे जैसा चाहते हैं वैसा मआनी निकाल लेते हैं – यह हुनर और फन ईश्वरीय देन भी है और रियाज़ ने इसमें इज़ाफा किया है . उनके खयाल नए नहीं हैं लेकिन जिस खूबी से वो कहते हैं वो काबिले तारीफ है "

शाम होते ही उदासी चल पड़ी चुनने उन्हें 
दिन के साहिल पर पड़ी हैं ग़म की मारी मछलियां 

दिल के दरिया में जो आयी शाम चारा फेंकने 
सतह पर आने लगीं यादों की सारी मछलियां 

इक जज़ीरा बस वही सारे समंदर में है पर 
ताक में बैठी हुई हैं वां शिकारी मछलियां 

6 अक्टूबर 1985 को जन्में मंझले कद और गठीले बदन के स्वप्निल ने बलिया के ऐ एस बी एस इंटर कॉलेज से स्कूलिंग करने के बाद आई. एम्. एस. गाज़ियाबाद से बी एस सी बॉयोटेक की डिग्री हासिल की लेकिन इस क्षेत्र में काम करने की रूचि उनमें पैदा नहीं हुई। नौकरी के बारे उन्होंने सोचा नहीं और अपने दिल की आवाज़ पर वो काम करने लगे जो उन्हें बहुत प्रिय है याने स्वतंत्र लेखन का। फक्कड़ प्रकृति के स्वप्निल पहली नज़र में ही हर किसी को अपने से लगते हैं उनकी चश्मे से झांकती आँखें वो मंज़र देख लेती हैं जो आम इंसान को दिखाई ही नहीं देते। मैं उनके बारे में ज्यादा नहीं कहूंगा क्यूंकि वो मुझे बहुत प्रिय हैं और उनके बारे में लिखते वक्त मैं अतिरेक से शायद बच न पाऊं इसलिए आईये उनके वो शेर पढ़ते हैं जो उन्हें भीड़ से अलग रख कर स्वप्निल बनाते हैं :

उसका मुझसे यूँ ही लड़ लेना और 
घर की चीजों से शिकायत करना 

इस से पहले के उसे देखो तुम 
ठीक से सीख लो हैरत करना 

मेरे ता'वीज़ में जो काग़ज़ है 
उस पे लिखा है 'मुहब्बत' करना 

किताब की भूमिका में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक विमल चंद्र पांडेय ने लिखा है कि "जिस तारीक वक़्त में स्वप्निल ग़ज़लें कह रहे हैं, मुनासिब ही है कि उनकी ता'वीज़ में रखे कागज़ पर मोहब्बत करने की नसीहत लिखी हुई है। ये कागज़ दरअस्ल शायर का ज़ेहन है जिसमें वो पूरे जहाँ की मोहब्बतें लेकर फिक्रमंद घूम रहे हैं कि कोई बोट ऐसी भी हो जो समंदर को फतह करे। स्वप्निल की भाषा किसी भी तरह के आग्रह और दबाव से मुक्त है और उनकी ग़ज़लें एक शायर की अवाम से गुफ्तगू वाली आमफ़हम भाषा अख्तियार कर हमारे सामने आती है जो बेहद अपनी सी लगती है "

ये वक्त लम्बे दिनों का है सो ये रातें अब 
बढ़ा रही है उदासी ही रातरानी की 

तिरा ख्याल हुआ कैनवस पे मेहमाँ 
कल तमाम रंगों ने मिलजुल के बेज़बानी की 

गुनाहे-इश्क किया और कोई सज़ा न हुई 
जरूर तुम ने सुबूतों से छेड़खानी की 

"चाँद डिनर पर बैठा है " किताब का साइज भी उसमें छपी ग़ज़लों की तरह अलग और दिलकश है "एनीबुक" ने इस किताब को जिसमें स्वप्निल की लगभग 150 से अधिक ग़ज़लें हैं ,बहुत ही आकर्षक अंदाज़ में प्रकाशित किया है। इसके पहले संस्करण के तुरंत बाद दूसरे संस्करण का मन्ज़रे आम पर आना इसकी लोकप्रियता का ठोस प्रमाण है। सबसे पहले ये किताब उर्दू में प्रकाशित हो कर धूम मचा चुकी है इसका हिंदी संस्करण तो बहुत महीनों बाद प्रकाशित हुआ। इसमें छपी लगभग सभी ग़ज़लें ऐसी हैं जिन्हें बार बार पढ़ने का, उनमें डूब जाने का मन करता है, अगर मुझे इस पोस्ट की लम्बाई और आपके कीमती वक्त का ध्यान नहीं होता तो यकीनन उनकी सभी ग़ज़लें आपको यहीं पढ़वा देता।

कोई मौसम हो ये फबता है तुझपर 
तेरा ये पैरहन माँ ने सिया क्या 

नए पत्ते ने पूछा है चमन से 
ख़िज़ाँ का भी यही है रास्ता क्या 

है पुर-असरार तेरी मुस्कराहट 
तिरा ही नाम है मोनालिसा क्या 

जड़ा है मुस्कुराता चाँद इसमें 
तो फिर ये रात है शिव की जटा क्या

'स्वप्निल' और उन जैसे आज के बहुत से युवा शायरों की शायरी ताज़ी हवा के झौंके जैसी है। मेरी गुज़ारिश है कि बुजुर्ग शायरों को उन्हें आज शायरी में हो रहे बदलाव को समझने लिए और नए शायरी सीखने वाले युवाओं को लफ्ज़ बरतने का हुनर सीखने के लिए ,पढ़ना चाहिए। बदलाव जरूरी है वो चाहे ज़िन्दगी में हो चाहे शायरी में। बदलाव बिना साहस और हौंसले के लाया नहीं जा सकता और जिनमें साहस और हौंसले की कमी है वो लीक पर ही चलते रहते हैं बिना अपने पदचिन्ह छोड़े। स्वप्निल और उनके हमराह कई युवा शायर शायरी में बदलाव ला रहे हैं जो काबीले तारीफ़ है।

सूत हैं घर के हर कोने में 
मकड़ी पूरी बुनकर निकली 

ताज़ादम होने को उदासी 
लेकर ग़म का शॉवर निकली 

जब भी चोर मिरे घर आये 
एक हंसी ही ज़ेवर निकली 

 'स्वप्निल' ,जो इनदिनों मुंबई में रहते हुए फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले और गीत लिख रहे हैं ,को सोशल मिडिया से जुड़े लोग तो पढ़ते ही आये हैं अब उनकी किताब आने से वो लोग जो सोशल मिडिया से नहीं जुड़े हैं ,भी उन्हें पढ़ सकते हैं. एक बात तो है कम्यूटर लैपटॉप या मोबाइल पर ग़ज़ल पढ़ने का वो मज़ा नहीं आता जो हाथ में किताब लेकर पढ़ने में आता है। अगर आप को शायरी से जरा सी भी मोहब्बत है तो देर मत कीजिये एनीबुक के पराग अग्रवाल से उनके मोबाइल न 9971698930 पर संपर्क कीजिये और किताब हासिल करने का आसान तरीका पूछिए, ये नहीं करना चाहते तो अमेजन से मंगवा लीजिये और हाँ स्वप्निल को उनके मोबाइल न 9425624247 पर बधाई देना मत भूलिए। मन तो नहीं कर रहा लेकिन अगली किताब की तलाश में निकलना ही पड़ेगा ,चलते चलते स्वप्निल की पहचान बन चुके उनके ये अशआर पढ़वाता चलता हूँ :-

अक्स मिरा आईने में 
लेकर पत्थर बैठा है 

उसकी नींदों पर इक ख़ाब 
तितली बन कर बैठा है 

रात की टेबल बुक करके 
 चाँद डिनर पर बैठा है