Monday, July 17, 2017

किताबों की दुनिया -134

"बीकानेर" - जिसका नाम लोकप्रिय बनाने में "बीकानेरवाला" के नाम से जगह जगह खुले रेस्टॉरेंट ने अहम् भूमिका निभाई है , राजस्थान का पाकिस्तान की सीमा से लगा एक अलमस्त शहर है। लगभग 8-10 लाख की जनसँख्या वाले बीकानेर शहर को आप शायद इसके स्वादिष्ट रसगुल्ले और चटपटी भुजिया सेव के कारण जानते होंगे लेकिन ये नहीं जानते होंगे कि इसके लगभग 500 साल पुराने इतिहास में एक बार भी साम्प्रदायिक दंगा फ़साद होने की वारदात दर्ज नहीं है। यहाँ के लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब की सिर्फ बात ही नहीं करते बल्कि इसे जीते हैं और बड़ी बेफिक्री से अपना जीवन यापन करते हैं । हमारे आज के शायर इसी बीकानेर के निवासी है और गंगा जमुनी तहज़ीब को अपने अशआर में बहुत ख़ूबसूरती से पिरोते हैं :

वो जिनके जलने से हरसू धुआँ-धुआं हो जाय 
चिराग़ ऐसे जहाँ भी जलें, बुझा देना 

तुम्हें लगे कि यहाँ शान्ति हो गई क़ायम 
तो क्या हुआ कोई अफ़वाह फिर उड़ा देना 

ज़रूरत आपको जब भी पड़े उजाले की 
मैं कह रहा हूँ मेरा आशियाँ जला देना 

जिन्हें समझ ही नहीं इम्तिहान लेने की 
'अदीब' उनको कोई इम्तिहान क्या देना 

एक जुलाई 1963 को बीकानेर में जन्में ,जनाब 'ज़ाकिर अदीब" साहब जिनकी किताब "मैं अभी कहाँ बोला" की बात आज हम करेंगे, का नाम मैंने पहले नहीं सुना था। ये किताब मुझे जयपुर के प्रसिद्ध शायर जनाब 'लोकेश साहिल' साहब की निजी लाइब्रेरी में दिखाई दी। एक-आध पृष्ठ पलटने और कुछ अशआर पढ़ने के बाद ही मुझे लगा कि ये किताब मुझे पूरी पढ़नी चाहिए क्यों की इसमें हिंदी के शब्दों का उर्दू के साथ प्रयोग और गहरे भावों को सरलता से अशआरों में ढालने का हुनर अद्भुत लगा।


मुझको अना परस्त वो कहते हैं तो कहें 
क्यों सरफिरों के सामने सर को झुकाऊं मैं 

ले जा रहे हैं इसलिए मुन्सिफ़ के सामने 
मेरी खता नहीं है मगर मान जाऊं मैं 

पहलू में मेरे दिल है ये अहसास है मुझे 
तुम चाहते हो क्यों इसे पत्थर बनाऊं मैं 

मैंने या हो सकता है आपने भी ज़ाकिर भाई का कलाम या नाम न सुना पढ़ा हो लेकिन अपने शहर बीकानेर में उनकी मौजूदगी के बिना किसी नसिश्त या मुशायरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अहमद अली खां जो राजस्थान उर्दू अकादमी के संस्थापक सदस्य हैं लिखते हैं कि "ज़ाकिर के निकट अलफ़ाज़ की जोड़-तोड़ या क़ाफ़िया पैमाई का नाम शायरी नहीं है, शायरी को वो अहसासो-ज़ज़्बात की भरपूर तर्जुमानी का बेहतरीन ज़रीआ समझता है, इसके शेरों में इस किस्म के अलफ़ाज़ जा-ब-जा मिलते हैं जो अलामत का काम और मा'नी की लहरें पैदा करते हैं "

उसे न घेर सकेंगे अँधेरे ग़ुरबत के 
हैं प्रज्वलित किसी घर में अगर हुनर के चिराग़ 

हमें भरोसा है इक रोज़ दूर कर देंगे 
तुम्हारे घर के अँधेरे हमारे घर के चिराग 

ये आरज़ू है कि ताज़िन्दगी रहें रोशन 
मेरी दुआओं की देहलीज़ पर असर के चिराग 

ज़माना याद रखेगा उसे हमेशा 'अदीब' 
वतन की राह में जिसने जलाये सर के चिराग

 "तुम्हारे घर के अँधेरे हमारे घर के चिराग " मिसरा अपने आप में कौमी एकता का जबरदस्त सन्देश देता है , जिस तरह इक बेहद अहम् बात को बिना लफ़्फ़ाज़ी के बहुत सरलता से 'ज़ाकिर' साहब ने बयां किया है वो बेजोड़ है।इस बात को कहने में हमारे हुक्मरां घंटो भाषण देते हुए भी असरदार ढंग से अवाम को नहीं कह पाते उसी बात को एक अच्छी शायरी एक मिसरे में कह देती है। ज़ाकिर साहब की शायरी की इस किताब में मुझे में ऐसे कई मिसरे पढ़ने में आये हैं जो सीधे दिल में उतर जाते हैं। भले ही ज़ाकिर भाई आज सोशल मिडिया के जरुरत से ज्यादा प्रचलित दौर में शामिल नहीं हैं क्यूंकि वो फेसबुक या ट्वीटर से कोसों दूर हैं लेकिन फिर भी उनकी शायरी की पहुँच दूर दूर तक है। फूल की खुशबू अपने चाहने वालों तक पहुँचने के लिए फेसबुक व्हाट्स ऐप या टवीटर की मोहताज़ नहीं होती।

इक्क्सीसवीं सदी का बहुत शोर था मगर 
इसमें किसी के चेहरे पे कुछ ताज़गी रही ? 

कांधों से सर गया अरे जाना ही था उसे 
दस्तार बच गई यही ख़ुशक़िस्मती रही 

जुगनू थे तेरी याद के हमराह इस क़दर 
जैसे सफ़र में साथ कोई रौशनी रही 

रक्खूँ न क्यों ख़्याल क़लम के वक़ार का 
अब तक मेरे क़लम से मेरी ज़िन्दगी रही 

 ज़ाकिर भाई ने क़लम के वक़ार का खूब ख़्याल रखा है तभी डा. मोहम्मद हुसैन, जो राजस्थान उर्दू अकादमी के सदस्य हैं उनके बारे में कहते हैं कि "ज़ाकिर बुनियादी तौर पर एक प्रतिरोधी शायर हैं ये प्रतिरोध राजनितिक और सामाजिक स्तर पर की जाने वाली नाइंसाफियों के ख़िलाफ़ अधिक तीव्र है। वो ज़ात के खोल में बंद नहीं हैं बल्कि समाज के दुःख दर्द से सरोकार रखते हैं। ज़ाकिर अगरचे अपनी प्रतिक्रिया को तुरंत अभिव्यक्त करते हैं फिर भी उन्हें शिकायत है कि " मैं अभी कहाँ बोला ", इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनके सीने में कैसे-कैसे तूफ़ान अंगड़ाई ले रहे होंगे, जिन्हें वो दबाये बैठे हैं।

जमीं निगल नहीं सकती हमें किसी सूरत 
हमारे सर पे अभी आसमान बाक़ी है 

उड़ान भरने नहीं दे रहा है अब मौसम 
परों में वरना अभी तक उड़ान बाक़ी है 

खुलेंगे राज़ कई और इस अदालत में 
मियां अभी तो हमारा बयान बाक़ी है 

अमीरे- शहर की नींदें उचाटता है "अदीब" 
अभी जो शहर में मेरा मकान बाक़ी है 

 ज़ाकिर भाई को शायरी विरासत में मिली है उनके वालिद जनाब 'रफ़ीक अहमद रफ़ीक साहब बहुत मकबूल शायर थे। जहाँ घुट्टी में मिली शायरी की बदौलत उन्होंने 18 -19 साल की उम्र से ही शेर कहने शुरू कर दिए वहीँ उन्हें जनाब दीन मोहम्मद 'मस्तान' बीकानेरी ,जनाब अहमद अली खां 'मंसूर चुरूवी और जनाब 'शमीम' बीकानेरी साहब जैसे उस्ताद मिले जिन्होंने उन्हें अपने रास्ते से कभी भटकने नहीं दिया, उनकी शायरी में जो लफ्ज़ बरतने का सलीका, नए विचारों को अपने शेरों का हिस्सा बनाने का हुनर, परम्परा का ख़्याल और नए रुझान की झलक दिखाई देती है वो इन्हीं उस्तादों की बदौलत है।

बच्चे नहीं थे घर में तो खामोश था ये घर 
लेकिन वो आये घर में तो घर बोलने लगा 

हमदर्द अपना जान लिया उसको दोस्तो 
कोई मेरे ख़िलाफ़ अगर बोलने लगा 

पतझड़ का दौर था तो वो गुमसुम खड़ा रहा 
फूटी जो कोपलें तो शजर बोलने लगा 

मैं फन के रास्ते पे था चुपचाप अग्रसर 
फिर यूँ हुआ कि मेरा हुनर बोलने लगा 

ज़ाकिर साहब के इसी हुनर का एहतराम करते हुए बीकानेर जिला प्रशासन ने उन्हें 2002 के स्वतंत्रता दिवस पर सम्मानित किया और 2011 के गणत्रंत्र दिवस पर नगर निगम बीकानेर ने उन्हें सम्मानित किया। ज़ाकिर साहब राजस्थान उर्दू अकादमी के सदस्य हैं , मस्तान अकेडमी बीकानेर के संस्थापक सदस्य हैं , कमेटी बज़्मे-मुसलमा, बीकानेर के कन्वीनर और समवेत बीकानेर संयुक्त सचिव हैं। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय राज. बीकानेर में कार्यरत ज़ाकिर भाई बीकानेर की साहित्यिक विधियों की जान हैं. अपनी भावनाओं और एहसास को सच्चाई और ईमानदारी के साथ शेरों में ढाल कर लोगों तक पहुँचाने में सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

अभी से किसलिए हंगामा हो गया बरपा 
हिले न लब ही मेरे मैं अभी कहाँ बोला 

जब अपने चेहरे को देखा है उसने हैरत से 
तब आईना जो बज़ाहिर है बेज़बाँ, बोला 

अमीरे-शहर की अपनी ज़बान क्या थी ''अदीब" 
वो जब भी बोला किसी ग़ैर की ज़बां बोला 

 " मैं अभी कहाँ बोला " किताब कामेश्वर प्रकाशन बीकानेर ने प्रकाशित की है जिसे आप उनके तेलीवाड़ा चौक ,बीकानेर -334005 पर लिख कर मंगवा सकते हैं या फिर इसे मंगवाने का तरीका ज़ाकिर साहब को उनके फोन न 09461012509 पर बधाई देते हुए पूछ सकते हैं। दिलकश कवर में हार्ड बाउंड वाली इस 80 पृष्ठों वाली किताब में ज़ाकिर साहब की लगभग 65 ग़ज़लें शामिल हैं। अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर आपको पढ़वा देता हूँ :

इक दूजे के दुश्मन हैं 
साया-सहरा, पानी-आग 

सावन की ऋतु आते ही 
हो जाता है पानी आग 

सब्र के छींटे पड़ते ही 
हो गयी पानी पानी आग

Monday, July 10, 2017

किताबों की दुनिया - 133

सिर्फ बातों से ही मैं कितना भरम रक्खूँगा 
सामने आ कि मुझे होश हुआ जाता है 

कुछ तो रफ़्तार भी कछुवे की तरह है अपनी 
और कुछ वक्त भी खरगोश हुआ जाता है 

सोने वाले हमें किस्सा तो सुनाते पूरा 
यार ऐसे कहीं ख़ामोश हुआ जाता है 

जयपुर के लाजवाब शायर जनाब 'लोकेश सिंह 'साहिल' साहब ने मुझसे बातचीत के दौरान एक बार कहा कि "पुराने दौर में अगर 'ऐ नरगिसे मस्ताना ---" या " निगाहे गरामी दुआ है आपकी ---" या "हम हैं मताये कूचा --" जैसे गाने फिल्मों के लिए लिखे गए तो सिर्फ इसलिए क्यूंकि उस वक्त उर्दू मुल्क की ज़बान थी ,सरकारी या गैर सरकारी काम उर्दू में होते थे लोग उर्दू अखबार या रिसाले शौक से पढ़ते थे। आज हालात जुदा हैं आज इस तरह के गाने नहीं लिखे जा सकते क्यूंकि आज उर्दू की तो बात दूर की है लोग ढंग से हिंदी भी नहीं बोल पाते।

दरार और तिरे मेरे दरमियाँ आ जाय 
तिरी तरह जो मिरे मुँह में भी जबाँ आ जाय 

ये और बात कि खुद में सिमट के रहता हूँ 
उठाऊं हाथ तो बाहों में आसमाँ आ जाय 

मिरे पड़ोस में जलती हैं लकड़ियां गीली 
न जाने कब मिरे कमरे में धुआँ आ जाय 

ज्यादातर युवा आज जो ज़बान बोलते हैं वो न उर्दू है न हिंदी और ना ही अंग्रेजी , तभी फ़िल्मी गानों की ही नहीं कविता या शायरी की ज़बान भी बदल गयी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं ,भाषा तो सिर्फ आपके ख्याल दूसरों तक प्रभावी रूप से पहुँचाने का माध्यम भर है अगर आप आसान समझी जा सकने वाली ज़बान में बात कहेंगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगे और अगर आप भाषा की शुद्धि या भारी भरकम लफ़्ज़ों को बरतने को ही अहम् मानेंगे तो आपका लिखा या तो आप पढ़ेंगे या फिर आप जैसे मुठ्ठी भर लोग।"

छत दुआ देगी किसी के लिए ज़ीना बन जा 
डूबता देख किसी को तो सफ़ीना बन जा 

ज़िन्दगी देती नहीं सबको सुनहरे मौके 
तुझको अंगूठी मिली है तो नगीना बन जा 

शौक़ खुशबू में नहाने का बहुत है जो तुझे 
आ मिरे जिस्म से मिल मेरा पसीना बन जा 

मैं भी साहिल साहब की बात से सहमत हूँ और ये भी मानता हूँ -जो जरूरी नहीं सभी को मंज़ूर हो --कि सरल सीधी ज़बान में असरदार बात कहना बहुत मुश्किल हुनर है जो उस्तादों की रहनुमाई और सतत साधना से हासिल होता है।भाषा आसान हो और बात ऐसी हो की सुनने पढ़ने वाले के मुंह से अपने आप वाह निकल जाय तो ये सोने में सुहागा जैसा मामला होगा। शायरी में अचानक आये सोशल मिडिया वाले इस विस्फोटक दौर में शायरी किसी सैलाब की तरह सब को अपने आगोश में लिए हुए है। फेसबुक या व्हाट्सअप जहाँ देखो वहीँ शायरी ऐ.के फोर्टी सेवन की बन्दूक से निकली गोलियों की तरह तड़ातड़ लोगों पर दागी जा रही है। ये सुखद स्थिति भी है और दुखद भी। सुखद इसलिए क्यूंकि हमें कुछ बेहतरीन युवा और नामचीन शायरों को आसानी से पढ़ने सुनने का मौका मिल रहा है और दुखद बात -- अभी इसे जाने दीजिये इस पर चर्चा फिर कभी -- आप तो ये शेर पढ़ें : ।

तन-मन डोले, बर्तन बोले, छन-छन करता तेल है पैसा 
घर से बाहर तक की दुनिया जो भी है सब खेल है पैसा 

जेब में आकर आँख दिखाए , मूंछ बढाए , ताव धराये 
लाठी खड़के, गोली तड़के थाना-चौकी-जेल है पैसा 

तेरा है न मेरा है ये सदियों से इक फेरा है ये 
इस स्टेशन उस स्टेशन आती जाती रेल है पैसा 

जो शायर- साहिल साहब की बात को ज़ेहन में रखते हुए- आम बोलचाल की भाषा को अपनी शायरी की ज़बान बनाते हैं वो जल्द मकबूलियत हासिल कर सबके चहेते बन जाते हैं। अगर आपके पास साफ़ सुथरी ज़बान है और ख्यालों में पुख्तगी है तो फिर आपकी तरक्की को कोई नहीं रोक सकता-हमारे आज के शायर सीधी सरल भाषा में असरदार बात करने वालों की फेहरिश्त में आते हैं-- नाम है " शकील आज़मी " जिनकी देवनागरी में मंजुल पब्लिशिंग हाउस भोपाल से प्रकाशित किताब " परों को खोल " की बात हम करेंगे। "शकील" आज अदब और मुशायरों की दुनिया में एक चमकता हुआ नाम है।


हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
यहाँ तो फूल में भी ताज़गी बहुत कम है

जहाँ है प्यास वहां सब गिलास ख़ाली हैं
जहाँ नदी है वहां तिश्नगी बहुत कम है

ये मौसमों का नगर है यहाँ के लोगों में
हवस ज़ियादा है और आशिक़ी बहुत कम है

20 अप्रेल 1971 को सहरिया ,आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश में जन्में शकील मुंबई में रहते हैं. मात्र 13 साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल कहने वाले शकील ने अपना पहला मुशायरा जावेद अख्तर ,निदा फ़ाज़ली और बशीर बद्र जैसे दिग्गज शायरों के साथ सूरत में पढ़ा, तब वो महज़ 23 साल के थे। उस मुशायरे में शकील अपने कलाम की सादगी, ताज़गी और कहने के अंदाज़ से छा गए। उसके बाद शकील ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनकी शायरी की खुशबू पूरे हिन्दुस्तान से होती हुई सरहद के पार तक पहुँचने लगी। विदेशों से बुलावों का ताँता लग गया। वो जहाँ जहाँ गए वहीँ के लोगों को अपनी शायरी का दीवाना बना दिया। ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। कैफ़ी आज़मी साहब का ये बयान काबिले गौर है " शकील वहां से शायरी शुरू कर रहे हैं जहाँ पहुँच कर मेरी शायरी दम तोड़ने वाली है। उनकी शायरी में जो ताज़ाकारी है उसने खास तौर से मुझे मुतास्सिर किया है "

मैं अकेला कई लोगों से लड़ नहीं सकता 
इसलिए खुद से झगड़ना मिरी मजबूरी है 

वरना मर जाएगा बच्चा ही मिरे अन्दर का 
तितलियाँ रोज पकड़ना मिरी मजबूरी है 

कहाँ मिटटी का दिया और कहाँ तेज़ हवा 
जलते रहना है तो लड़ना मिरी मजबूरी है 

उर्दू के बहुत बड़े स्कॉलर "गोपी चंद नारंग" साहब ने कहा है कि " शकील आज़मी के यहाँ अहसास की जो आग नज़र आती है वो नयी नस्ल के बहुत कम शायरों यहाँ मिलती है " शकील साहब की उर्दू में "धूप दरिया" (1996 ), "ऐश ट्रे" (2000 ), "रास्ता बुलाता है "(2005 ), "ख़िज़ाँ मौसम रुका हुआ है "(2010), " मिटटी में आसमान"(2012), "पोखर में सिंघाड़े"(2014) किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं , "परों को खोल " देवनागरी में उनका पहला संकलन है। इसमें उनकी लगभग 85 ग़ज़लें ,40 के करीब नज़्में और 20 से अधिक फ़िल्मी अशआर भी संकलित हैं.
शकील की शायरी की छोटी सी बानगी प्रस्तुत करती है ये किताब, जो पाठक को उन्हें और और पढ़ने की प्यास जगा देती है। ये किताब अमेजन पर उपलब्ध है। आप चाहें तो शकील साहब को उनके मोबाईल न 9820277932 पर फोन करके मुबारक बाद देते हुए किताब पाने का आसान रास्ता पूछ सकते हैं।

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है 
ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है 

कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो 
जो इश्क करता है कब ख़ानदान देखता है 

मैं जब मकान के बाहर क़दम निकलता हूँ 
अजब निगाह से मुझको मकान देखता है 

अपनी शायरी के छोटे से सफर में अब तक शकील साहब ने ढेरों अवार्ड हासिल किये हैं जिनमें गुजरात गौरव अवार्ड गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी , कैफ़ी आज़मी अवार्ड , उत्तर प्रदेश उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड, बिहार उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड और महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड उल्लेखनीय हैं। इन अवार्ड्स के साथ जो सबसे बड़ा अवार्ड उन्हें मिला है वो है अपने श्रोताओं और पाठकों का प्यार। वो जहाँ जाते हैं उनके दीवाने हमेशा वहां मौजूद हो जाते हैं।

फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है 
तू नहीं है तो ज़माना भी बुरा लगता है 

ऊब जाता हूँ ख़मोशी से भी कुछ देर के बाद 
देर तक शोर मचाना भी बुरा लगता है 

इतना खोया हुआ रहता हूँ ख्यालों में तिरे 
पास मेरे तिरा आना भी बुरा लगता है 

अब बिछुड़ जा कि बहुत देर से हम साथ में हैं 
पेट भर जाए तो खाना भी बुरा लगता है 

लगभग 20 सालों के छोटे से इस अदबी सफर में जो शोहरत शकील को मिली है वो किसी के लिए भी हैरत की बात हो सकती है। उनके प्रति उनके प्रशंशकों की भीड़ का राज़ है उनकी सादा बयानी , इंसानी फितरत और मसाइल से जुड़े उनके अशआर जो सबको अपने से लगते हैं।मजे की बात ये है शोहरत ने उन्हें सबका दोस्त हमदर्द और बेहतरीन इंसान बना दिया है। मुहम्मद अलवी साहब उनके लिए कहते हैं " शकील आज़मी की शायरी में उनका अपना रंग है जो दिल को भाता है ,इस कम उम्र में ये पुख्तगी बहुत कम लोगों को नसीब होती है "
शकील की ग़ज़ल के इन चंद अशआरों को आपकी नज़र कर के मैं अब निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में :

आगे परियों का देश हो शायद
दूर तक राह में चमेली है 

अब भी सोते में ऐसा लगता है 
सर के नीचे तिरी हथेली है 

रंग के तजरबे में हमने 'शकील' 
एक तितली की जान ले ली है

Monday, July 3, 2017

किताबों की दुनिया -132

अमिताभ बच्चन की एक पुरानी फिल्म " नसीब" का ये गाना शायद नयी पीढ़ी ने न सुना हो लेकिन हम जैसे पुराने लोग इसे अब भी कभी कभी गुनगुना लेते हैं " ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है...." ये गाना महज़ गाना नहीं एक सच्चाई है , दरअसल सच तो ये है कि ज़िन्दगी हर घड़ी इम्तिहान लेती है और मजे की बात ये है कि ये इम्तिहान सब के लिए एक सा नहीं होता ,किसी को बहुत सरल पेपर मिलता है तो किसी की किस्मत में हमेशा कठिन पेपर ही आता है। सरल पेपर वाले खुश होते हैं और कठिन पेपर वाले इम्तिहान में पास होने के तनाव में रहते हैं। लेकिन... लेकिन.... लेकिन.... कुछ लोग ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास फेल की चिंता किये बगैर बैठते हैं और पास या फेल दोनों स्थितियों में प्रसन्न रहते हैं , ज़ाहिर सी बात है ऐसे लोग विरले ही होते हैं।

लोग हमसे पूछते हैं साथ क्या ले जाएंगे 
हाथ ख़ाली आए थे भर कर दुआ ले जाएंगे 

हाँ, बग़ावत भी करेंगे ज़िन्दगी के वास्ते 
इस मुहीम में सर हथेली पर कटा ले जाएंगे

है बहुत कुछ ख़ुल्द में, मुमकिन हुआ तो देखिये 
वापसी में साथ अपने इक ख़ुदा ले जाएंगे 
ख़ुल्द =स्वर्ग 

ख़ुल्द से अपने साथ इक खुदा को ले जाने वाले और ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास फेल की चिंता किये बगैर हर स्थिति में मस्त रहने वाले हमारे आज के लाजवाब शायर हैं जनाब 'सुरेश स्वप्निल' साहब, लाजवाब इसलिए क्यूंकि इनकी शायरी मुझे लाजवाब लगी, उन्ही की एक छोटी सी पेपर बैक में "दखल प्रकाशन , पड़पड़ गंज दिल्ली" से छपी ग़ज़ल की किताब "सलीब तय है "की चर्चा आज हम करेंगे।


 मिट गयी तहज़ीब जबसे क़ैस-औ-फ़रहाद की 
रोज करते-तोड़ते हैं लोग वादा इश्क का 

कुछ बहारों की अना तो कुछ गुरुरे-बागबां 
आशिके-गुलशन सजाते हैं जनाज़ा इश्क का 

साफ़ कहिये आपको अब रास हम आते नहीं 
क्या ज़रूरी है किया जाए दिखावा इश्क का 

अगर कहूं कि मैं सुरेश जी को जानता हूँ तो ये बात झूठ होगी, मैं ही क्या मेरे बहुत से परिचित जो दिन रात शायरी ओढ़ते बिछाते हैं भी सुरेश जी के बारे में पूछने पर चुप्पी साध गए। ग़ज़ल के बड़े बड़े मठाधीश भी उनका नाम सुन कर बगलें झांकते नज़र आये , भला हो मेरी आदत का जिसके तहत मैं अनजान शायरों की किताब उठा कर उलटता पलटता हूँ मुझे ये किताब इसी साल के विश्व पुस्तक मेले दिल्ली में दिखाई दी जिसे मैंने उल्टा पलटा और खरीद लिया।।
उन्हें कोई जाने भी कैसे ? अत्यधिक संकोची स्वभाव के सुरेश जी को अपने आपको बेचने की कला शायद आती नहीं, तभी वो कहते हैं की " मुशायरों-कवि सम्मेलनों में लोग न बुलाते हैं, न मैं जाता हूं I " फेसबुक पर उनकी रचनाएँ और विचार जरूर पढ़ने को मिल जाते हैं।

वो आज शहंशाह सही, हम भी क्या करें 
होता नहीं है इश्क हमें ताज़दार से 

अल्लाह से कहें कि कहें आईने से हम 
उम्मीद नहीं और किसी ग़म-गुसार से 

आएँगे तिरि ख़ुल्द भी देखेंगे किसी दिन 
फ़ुर्सत कभी मिले जो ग़मे-रोज़गार से 

10 मार्च 1958 को झाँसी उत्तर प्रदेश में जन्में सुरेश साहब को ग़मे-रोज़गार से कभी फ़ुर्सत नहीं मिली ,रोज़ी-रोटी के लिए पहला जतन उन्होंने महज़ 5 (पांच) साल की उम्र में फुटपाथ पर बैठ कर भुट्टे बेचने से किया।सुरेश जी उन लोगों में शुमार रहे जिनको ज़िन्दगी ने इम्तिहान में कभी आसान सवाल नहीं दिए। उनकी क्षमताओं और धैर्य की हर पल परीक्षा ली। थोड़ा होश सँभालने पर कुछ दिन एक बैंक की केंटीन में लोगों को पानी चाय नमकीन बिस्कुट आदि पकड़ाने वाले छोटू की नौकरी की। बारह साल के सुरेश ने अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के काम से किसी तरह गुज़ारा किया। इन सब अभावों के बावजूद उनकी आगे पढ़ते रहने की ललक कम नहीं हुई।

हम जरा और झुक गए होते 
अर्श के मोल बिक गए होते 

साथ देते तिरि हुकूमत का 
तो बहुत दूर तक गए होते 

राह की मुश्किलें गिनी होतीं 
सोचते और थक गए होते 

सच में सुरेश जी ने पीछे मुड़ कर देखा ही नहीं ,राह की मुश्किलों को याद भी नहीं रखा और आगे बढ़ते रहे। सोलह साल की उम्र में उन्होंने पत्रकारिता क्षेत्र का दामन थामा और 19 वर्ष की अवस्था में भोपाल के एक निजी विद्यालय में शिक्षक की नौकरी के साथ साथ सब्ज़ी और अखबार भी बेचे। ये सब करते हुए वो लगातार पढ़ते रहे और उन्होंने हिंदी साहित्य में एम्.ऐ के अलावा अर्थ शास्त्र में भी एम्.ऐ किया। जब 20 वर्ष के हुए तो एक बैंक में क्लर्की करना शुरू किया लेकिन उनका मन वहां रमा नहीं , जैसे तैसे लगभग दस साल वहां गुज़ारे और फिर एक दिन बैंक की नौकरी को राम राम बोल कर 1989 में पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में निर्देशन का कोर्स करने चले गए।

तहज़ीब तिरे शह्र से कुछ दूर रुक गयी 
मिलते हैं लोग रस्म-अदाई के वास्ते 

अच्छे दिनों से क़ब्ल हमें अक़्ल आ गयी 
कासा मँगा लिया है गदाई के वास्ते 
क़ब्ल=पहले ,कासा=भिक्षा पात्र , गदाई =भिक्षा-वृत्ति 

फ़रमाने-शाह है कि सर-ब-सज्द सब रहें 
वो कत्ल कर रहे हैं भलाई के वास्ते 
सर-ब-सज्द =नतमस्तक 

रिश्वत से मुअज़्जिन की जिन्हें नौकरी मिली 
देते हैं अज़ाँ नेक कमाई के वास्ते 
मुअज़्जिन=अज़ान देने वाला 

विचारों से वामपंथी,नास्तिक और घोर अराजकतावादी सुरेश साहब ने कुछ समय पूना फिल्म संसथान में फिल्म शोध अधिकारी की नौकरी की अचानक नौकरी शब्द से मोह भांग हो गया। वो अपने बारे में कहते हैं कि " मैं एक बेहद मामूली इंसान हूं, किसी भी आम मज़दूर की तरह I फ़िलहाल, अनुवाद से रोज़ी-रोटी चला रहा हूं। "
लेखन उनका शौक है ,अभिव्यक्ति का माध्यम है । उन्होंने अब तक लगभग 300 कवितायेँ 50 के करीब व्यंग आलेख, कुछ कहानियां और तीन चार नाटक लिखे हैं। उन्होंने पहली ग़ज़ल 1975 में लिखी,बाद में 1996 में उर्दू ग़ज़लगोई की तरफ़ तवज्जो देना शुरू किया . ब्लॉग 'साझा आसमान' 2012 में और 'साझी धरती' उसके कुछ समय बाद लिखना शुरू किया.
"सलीब तय है" उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी मुख्य रूप से सन 2013 -14 में लिखी ग़ज़लें संगृहीत हैं।

मुश्किलें दर मुश्किलें आती रहीं 
जिस्म दिल ने कर दिया फ़ौलाद का 

मुफ़लिसी में कर रहा है शायरी 
क्या कलेजा है दिल-बर्बाद का 

वक्त मुंसिफ है, इसे मत छेड़िये 
सर कटेगा एक दिन जल्लाद का 

उनकी शायरी में वामपंथी तेवर बहुत उभर कर सामने आते हैं , व्यवस्था से उनकी सीधी टकराने की प्रवृति पढ़ने वाले को प्रभावित कर जाती है। इस किताब की लगभग 90 ग़ज़लों में से अधिकांश छोटी बहर में हैं और बहुत असरदार हैं. आज के हालात की नुमाइंदगी भी उनकी ग़ज़लें बहुत बेलौस अंदाज़ में करती हैं।

हो बात एक दिन की तो झेल लें जिगर पर 
जुल्मो-सितम ख़ुदा के दस्तूर हो न जाएँ 

सीरत से तरबियत से हैं आदतन लुटेरे 
ये रहनुमा वतन के नासूर हो न जाएँ 

अशआर पर हमारे सरकार की नज़र है 
सच बोल कर किसी दिन मंसूर हो न जाएँ 

जुझारू प्रवृति के सुरेश जी अपने बारे में आगे कहते हैं "अपनी रचनाओं के प्रसार-प्रचार के लिए कुछ नहीं करता I मित्र गण अपने पत्र-पत्रिकाओं में मेरे ब्लॉग्स से रचनाएं चुन कर छाप लेते हैं I सूचना आम तौर पर छपने के बाद मिलती है, कई बार कभी नहीं मिलती I " सुरेश जी विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं, कविता, कहानियां, नाटक लिखने के अलावा उन्होंने दर्ज़नो नाटकों का निर्देशन किया है और कइयों में अभिनय भी। अभिनय की कार्य-शालाएं भी उन्होंने आयोजित की हैं.

लगो न शाह के मुँह ,दूर रहो हाकिम से 
ज़रा बताएं कि हम क्या करें सलाहों का

ख़्याल नेक नहीं है तिरि अदालत का 
मिज़ाज ठीक नहीं है मिरे गवाहों का 

कहीं बहार न बादे-सबा, न अच्छे दिन 
फ़रेब है हुज़ूर आपकी निगाहों का 

उनके और उनकी शायरी के बारे में मात्र एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं। मेरी आप से गुज़ारिश है कि आप उनकी किताब "दख़ल प्रकाशन से ,08375072473 पर फोन करके मंगवाएं या सुरेश जी को मोबाइल न.09425624247 पर बधाई देते हुए इसे आसानी से मंगवाने का रास्ता पूछें।
और अब चलते चलते आप उनकी एक ग़ज़ल के कुछ शेर पढ़ते हुए अगली किताब की खोज में निकलने के लिए मुझे इज़ाज़त दें :-

अपने अंदर बच्चा रह 
गुरबानी सा सच्चा रह 

तूफाँ है पतवार उठा
गिर्दाबों से लड़ता रह
गिर्दाबों =भंवर

जिन्सों की महँगाई में 
खुशफ़हमी-सा सस्ता रह 
जिन्सों=वस्तु 

मुफ़लिस है लाचार नहीं 
सजता और सँवरता रह

‪#‎हिन्दी_ब्लॉगिंग‬

Saturday, July 1, 2017

अगर भीग जाने की चाहत नहीं है

" आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम ....गुज़रा ज़माना ब्लॉग्गिंग का " --- मैं तो ब्लॉग्गिंग से गया ही नहीं, बस ये गाना गाता रहा " तेरा पीछा न मैं छोडूंगा सोनिये --भेज दे चाहे जेल में " कुछ हलचल फिर से दिखाई दे रही है आज ब्लॉग्गिंग पर कितने दिन रहेगी कोई नहीं जानता --जैसे अच्छे दिन कब आएंगे कोई नहीं जानता। अब आ ही गए हैं तो एक पुरानी सी ग़ज़ल को धो पौंछ कर फिर से पेश कर रहा हूँ , पढ़ कर जो टिपियाये उसका भला और जो ना टिपियाये उसका भी भला।




नहीं है अरे ये बग़ावत नहीं है 
मुझे सर झुकाने की आदत नहीं है 

छुपाये हुए हैं वही लोग खंजर 
जो कहते किसी से अदावत नहीं है 

करूँ क्या परों का अगर इनसे मुझको 
फ़लक़ नापने की इज़ाज़त नहीं है 

इसी का नया नाम जम्हूरियत है 
यहाँ सर किसी का सलामत नहीं है 

तुम्हारे दिए ज़ख्म गर मैं भुला दूँ 
अमानत में क्या ये खयानत नहीं है 

अकेले नहीं तुम मियां इस जहाँ में 
किसे ज़िन्दगी से शिकायत नहीं है 

घटाओं का 'नीरज' भला क्या करोगे 
अगर भीग जाने की चाहत नहीं है

Monday, June 26, 2017

किताबों की दुनिया -131

आसमानों की बुलंदी में कहाँ आया ख्याल 
इक नशेमन भी बना लूँ चार तिनके जोड़कर 

बेयक़ीनी ने ये कैसा ख़ौफ़ मुझमें भर दिया 
अब कहीं जाता नहीं मैं खुद को तनहा छोड़कर 

कम से कम दस्तक ही देकर देख लेता एक बार 
मुझमें दाख़िल क्यों हुआ वो शख़्स मुझको तोड़कर 

ये बाकमाल लहज़ा , लफ़्ज़ों को बरतने का ये हुनर और कहन का ये दिलचस्प अंदाज़, शायरी के दीवाने बखूबी जानते हैं कि ये लखनऊ स्कूल की देन है जो जनाब 'मीर तकी मीर' साहब से शुरू हुई. इसी 'लखनऊ स्कूल' की गंगा जमुनी तहज़ीब की गौरव शाली परम्परा को उनके बाद सौदा ,नासिख़ ,मज़ाज़ ,जोश, आनंद नारायण मुल्ला ,वाली आसी, कृष्ण बिहारी नूर जैसे शायरों ने आगे बढ़ाया और अब उसी परम्परा को मुनव्वर राणा, भारत भूषण पंत और ख़ुशबीर सिंह 'शाद' के साथ युवा शायर अभिषेक शुक्ला और मनीष शुक्ला बहुत ख़ूबसूरती से आगे बढ़ा रहे हैं।
हमारे आज के मोतबर शायर हैं जनाब ' ख़ुशबीर सिंह 'शाद' "साहब जिनकी हाल ही में देवनागरी लिपि में एनीबुक द्वारा प्रकाशित किताब 'शहर के शोर से जुदा' की बात हम करेंगे।


ये भी मुमकिन है कि खुद ही बुझ गए हों चराग़ 
बेगुनाही किसलिए अपनी हवा साबित करे 

तेरे सजदे भी रवा, तेरी इबादत भी क़ुबूल 
शर्त ये है ख़ुद को तू पहले ख़ुदा साबित करे 

अपने ख़द्दो- खाल की ख़ुद ही गवाही दूंगा मैं 
क्यों मिरि पहचान कोई दूसरा साबित करे 

लखनऊ स्कूल की गंगा जमुनी शायरी की तहज़ीब को 'ख़ुशबीर' साहब ने अपने उस्ताद 'वाली आसी' साहब की शागिर्दी में सीखा। जनाब 'वाली आसी' साहब के बारे में हम 'भारत भूषण पंत' साहब की किताब 'बेचेहरगी' की चर्चा के दौरान बता चुके हैं , उनके शागिर्दों में मुनव्वर राणा भी शामिल थे। मुशायरों के मंच पर अंधड़ की तरह चल रही शायरी के बीच 'शाद' साहब की शायरी सुबह के वक्त मंद मंद चलती पुरवाई की तरह महसूस होती है।

हो तो गए बहाल तअल्लुक़ सभी मगर  
दिल में जो इक ख़लिश थी पुरानी, नहीं गयी 

वो रात इक कनीज़ के सपनो की रात थी 
उस रात ख़्वाब गाह में रानी नहीं गयी 

लफ़्ज़ों को फिर गवाह बनाया गया है 'शाद' 
अश्कों की इक दलील भी मानी नहीं गयी 

4 सितम्बर 1954 को सीतापुर उत्तर प्रदेश में जन्में 'शाद' ने अपनी पढाई 'सिटी मोंटेसरी स्कूल' लखनऊ और 'क्राइस्ट चर्च कॉलेज' लखनऊ से की। उनके पिता चाहते थे कि वो उनकी आलमबाग ,जहाँ वो रहते थे, वाली प्रिंटिंग प्रेस को संभालें लेकिन उनका भाग्य उन्हें कोई दूसरी ही दिशा में ले गया। बचपन से ही उन्हें कविताओं से प्रेम था तभी उन्होंने हिंदी के लगभग सभी कवियों की रचनाओं को पढ़ डाला। शायरी की तरफ झुकाव हुआ तो उन्होंने 'सुल्तान खान 'साहब से बाकायदा उर्दू की तालीम ली। धीरे धीरे शेर कहने लगे। अमीनाबाद में उन दिनों साहित्य प्रेमियों की महफ़िल लगा करती थी ,वहीँ 'शाद' साहब ने जनाब 'वाली आसी' साहब को अपने शेर सुनाये। उनके शेरों और कहन से प्रभावित हो कर 'वाली आसी ' साहब ने उन्हें अपनी शागिर्दी में रख लिया।

मैं आज़िज़ आ चुका हूँ अपनी गैरत की नसीहत से 
ये कहती है कि जो करना वो मुझसे पूछ कर करना

मिरि मिटटी तुझे चूमूँ कि आँखों से लगाऊं मैं 
तिरा ही हौसला है एक कोंपल को शजर करना

बहुत समझाया मैंने हाशियों की क्या जरुरत है 
मगर वो चाहता था दास्ताँ को मुख़्तसर करना 

मुझे मालूम है मेरे बिना वो रह नहीं सकता 
कहीं भटका हुआ मिल जाय तो मुझको ख़बर करना 

अपनी पहली किताब 'जाने कब ये मौसम बदले' जो 1992 में शाया हुई थी के बाद उन्होंने मुड़ कर नहीं देखा और लगातार शेर कहते रहे नतीज़ा ये हुआ कि अब तक उनके नौ मज़्मुए शाया हो चुके हैं जिन में से तीन तो उर्दू अकेडमी उत्तर प्रदेश द्वारा पुरुस्कृत हो चुके हैं। उनकी शेष किताबों के उन्वान इस तरह हैं "गीली मिटटी (1998) ", 'ज़रा ये धूप ढल जाय (2005)", "बेख्वाबियाँ (2007) ","जहाँ तक ज़िन्दगी है (2009)","बिखरने से जरा पहले (2011)", "लहू की धूप (2012)", "बात अंदर के मौसम की (2014)" इसके अलावा उनकी एक किताब "चलो कुछ रंग ही बिखरे (2000)" को पाकिस्तान के जाने माने प्रकाशक 'वेलकम बुक पोर्ट' ने प्रकाशित किया है।

मिरि दरियादिली उतरे हुए दरिया की सूरत है 
ये हसरत ही रही दिल में किसी के काम आऊं मैं 

ये कैसी कश्मकश ठहरी हमारे दरमियाँ दुनिया 
न मुझको रास आये तू, न तुझको रास आऊं मैं 

किसी दिन लुत्फ़ लूँ मैं भी तिरे हैरान होने का 
किसी दिन बिन बताये ही तिरी महफ़िल में आऊं मैं 

बस इक ज़िद ही तो हाइल है हमारे दरमियाँ वरना 
अगर पहले मनाये वो तो शायद मान जाऊं मैं 

बहुत ही कम शायर हैं जो मुशायरों में सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए अपनी शायरी से समझौता नहीं करते और ख़ास तौर पर ऐसे शायर जिनकी रोज़ी रोटी ही इस से चलती हो वो तो बहुत ही संभल कर मंच पर अपनी रचनाएँ सुनाते हैं। जनाब ख़ुशबीर सिंह साहब अपवाद हैं उन्होंने कभी शायरी के मेयार से समझौता नहीं किया,तालियां बटोरने के लिए हलकी शायरी नहीं की क्यूंकि इसकी उन्हें कभी जरुरत ही महसूस नहीं हुई। उनकी शायरी इतनी खूबसूरत और दिलकश होती है कि श्रोता बार बार तालियां बजाते हुए और और सुनने की फरमाइश करते हैं। हक़ीक़त ये है कि आज भी लोग अच्छी शायरी के दीवाने हैं लेकिन क्यूंकि अच्छा कहने वाले बहुत कम हैं इसलिए वो लफ़्फ़ाज़ी सुनने के लिए मज़बूर हैं।

तिरि कुर्बत भी मुझको रास हो ऐसा नहीं फिर भी 
अकेलेपन से डरता हूँ मुझे तनहा न छोड़ा कर 
कुर्बत =समीपता 

नहीं ! अच्छा नहीं लगता मुझे यूँ मुन्तशिर होना
मेरी लहरों में अपनी याद के पत्थर न फेंका कर 
मुन्तशिर = बिखर हुआ 

तुझे अलफ़ाज़ के पैकर ही में हर बात दिखती है 
कभी खामोशियों को भी सुना कर और समझा कर 

'शाद' साहब के चाहने वाले पूरी दुनिया में फैले हुए हैं उन्हें 'अमेरिका , यूनाइटेड अरब एमिराईट , पाकिस्तान ,दोहा, ओमान, बेहरीन,दुबई, अबू धाबी और सिंगापुर आदि में अपनी शायरी सुनाने का मौका मिल चुका है. उनके इंटरव्यू और शायरी भारत और पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों और पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती है। दोनों मुल्कों के टी वी पर भी उन्हें चाव से देखा सुना जाता है। दूरदर्शन पंजाबी ने तो उन पर एक वृत्त चित्र का निर्माण कर उसे प्रदर्शित भी किया है। जम्मू यूनिवर्सिटी ने एक विद्यार्थी को उनके साहित्य पर शोध के लिए 'एम् फिल' की डिग्री प्रदान की है।

किसी के बस में कहाँ था कि आग से खेले 
मिरे क़रीब कोई इक मिरे सिवा न गया 

मैं एक फूल की वुसअत में रह के जी लेता 
मगर हवा ने पुकारा तो फिर रहा न गया 
वुसअत =फैलाव 

था मेरे गिर्द बहुत शोर मेरे होने का 
मैं जब तलक तेरी खामोशियों में आ न गया 

'शाद' साहब को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए जो पुरूस्कार मिले हैं अगर उनकी गिनती की जाय तो ये पोस्ट छोटी पड़ जाएगी सारे तो नहीं लेकिन कुछ चुनिंदा पुरूस्कार इस तरह हैं नार्थ अमेरिका की अंजुमन-ऐ-तरक्की द्वारा पोएट ऑफ दी ईयर अवॉर्ड ,अमेरिकन इस्लामिक कांग्रेस अवार्ड ,हसरत मोहानी अवॉर्ड पकिस्तान ,जश्ने अदब ऐज़ाज़ अवॉर्ड श्री गोपी चंद नारंग द्वारा,लोक लिखारी अवॉर्ड पंजाब ,और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया 'यश भारती' अवॉर्ड।

उसी वुसअत से जिसके पार जाना गैर मुमकिन था 
मैं आगे बढ़ गया हद्दे-नज़र से मश्विरा करके 
वुसअत = फैलाव 

मसाइल ज़िन्दगी के खुद ब खुद आसान हो जाएँ 
कभी देखो किसी आशुफ्ता सर से मश्विरा करके 
मसाइल =समस्या , आशुफ्ता सर =पागल, सिरफिरा 

जवाँ बच्चों की अपनी ज़िन्दगी है उनसे क्या शिकवा 
जुदा होते हैं क्या पत्ते शजर से मश्विरा करके 

"शहर के शोर से जुदा" में 'शाद' साहब की लगभग 90 ग़ज़लें संग्रहित हैं , एनीबुक के पराग अग्रवाल ने गागर में सागर भरने का प्रयास किया है जिसमें वो बहुत हद तक क़ामयाब भी हुए हैं. 'शाद' साहब के कलाम को किसी भी एक किताब में समेटा ही नहीं जा सकता ,इस किताब में पराग साहब ने ग़ज़लों ने बाद उनकी कुछ और ग़ज़लों के फुटकर शेर भी प्रकाशित किये हैं जिनमें से अधिकतर उनकी पहचान बन चुके हैं। किताब में मुश्किल उर्दू लफ़्ज़ों का हिंदी में अर्थ न देना आम पाठक को अखर सकता है, हो सकता है कि अगले संस्करण में इस कमी को प्रकाशक द्वारा पूरा लिया जाय।
इस किताब की प्राप्ति के लिए आप पराग को उनके मोबाइल 9971698930 पर संपर्क करें और 'शाद'साहब को, जो अब जालंधर रहते हैं, उनके मोबाइल 09872011882 पर संपर्क कर दिल से बधाई दें। वैसे ये किताब अमेज़न पर भी उपलब्ध है

आईये आपको चलते चलते ख़ुशबीर साहब के कुछ ऐसे शेर पढ़वाता हूँ जो उनकी पहचान बन चुके हैं :-

मिरी मर्ज़ी के मुझको रंग देदे 
तो फिर तस्वीर मेरी ज़िम्मेवारी 
*** 
कैसी बेरंगियों से गुज़रा हूँ 
ज़िन्दगी तुझमें रंग भरते हुए 
*** 
थकन जो जिस्म की होती उतार भी लेते 
तमाम रूह थका दी है इस सफर ने तो 
*** 
तुमने इक बात कही दिल पे क़यामत टूटी 
इक शरर कम तो नहीं आग लगाने के लिए 
*** 
मुठ्ठी में किर्चियों को ज़रा देर भींच लो 
फिर उसके बाद पूछना कैसे जिया हूँ मैं 
*** 
ये तेरा ताज नहीं है हमारी पगड़ी है 
ये सर के साथ ही उतरेगी सर का हिस्सा है

Monday, June 19, 2017

किताबों की दुनिया -130

आज आत्म प्रशंशा, आत्म मुग्धता और आत्म स्तुति के इस संक्रमक दौर में जहाँ हर बौना अपने आपको अमिताभ से ऊंचा और हर तुक्के बाज़ अपने को ग़ालिबो मीर से बेहतर मानता हो अगर कोई ताल ठोक कर सोशल मीडिया के सार्वजनिक मंच पर ये कहे कि "मैं बेतुका ,बेहूदा, बदतमीज़, वाहियात ,अनपढ़ ,गँवार,ज़ाहिल और मुँहफट हूँ " तो आप हैरान नहीं हो जायेंगे ?
हमारे आज के शायर अपने बारे में ऐसा बयान सनसनी फैलाने के कारण नहीं दे रहे बल्कि ऐसा कहना उनकी निराली शख्शियत का हिस्सा है।

फिर तुझे सोच लिया हो जैसे 
तार बिजली का छुआ हो जैसे 

धड़कनें तेज़ हुई जाती हैं 
कोई ज़ीने पे चढ़ा हो जैसे 

लाख अपने को समेटा हमने 
फिर भी कुछ छूट गया हो जैसे 

याद बस याद फ़क्त याद ही याद 
और सब भूल गया हो जैसे 

हमारे आज के शायर हैं जनाब "शमीम अब्बास" साहब जिनकी किताब "बाँट लें,आ कायनात" का जिक्र हम करेंगे। हिंदी पाठकों के लिए शमीम साहब का नाम शायद बहुत अधिक जाना पहचाना न हो लेकिन उर्दू शायरी से मोहब्बत करने वाले हर शख्श ने उन्हें पढ़ कर बिजली के तार को छू लेने जैसे अनुभव जरूर हासिल किये होंगे क्योंकि इनके शेर कभी कभी जोर का झटका धीरे से देते हैं । किताब के फ्लैप पर ब्रेकेट में लिखा है "उर्दू ग़ज़लें" जबकि इस किताब की ग़ज़लें न उर्दू और न हिंदी में बल्कि उस ज़बान में हैं जिसे हम रोजमर्रा की ज़िन्दगी में इस्तेमाल करते हैं।


प्यारे तेरा मेरा रिश्ता 
इक उड़ती तितली और बच्चा 

उस ने हामी भर ली आखिर 
बिल्ली के भागों छींका टूटा 

तेरी कहानी कहते कहते 
अच्छे अच्छे का दम फूला 

दुनिया भर के शग्ल पड़े हैं 
पर जिसको हो तेरा चस्का 

सन 1948 में फैज़ाबाद उत्तर प्रदेश में जन्में शमीम साहब जब कुल 2 साल के थे तो परिवार के साथ मुंबई आ बसे और तब से अब तक मुंबई में भिंडी बाजार की जामा मस्जिद के पास बड़े ही सुकून से रह रहे हैं। हाईस्कूल के बाद मुंबई के ही महाराष्ट्र कॉलेज से उन्होंने तालीम हासिल की और वहीँ छुटपुट काम करते हुए शायरी करने लगे। पूछने पर वो हँसते हुए कहते हुए कहते हैं कि वो खालिस मुम्बइया टपोरी हैं। निहायत दिलचस्प शख्सियत के मालिक शमीम साहब न केवल अपने आचार व्यवहार में बल्कि शायरी करने में भी बेहद बिंदास हैं.

ये नहीं ये भी नहीं और वो नहीं वो भी नहीं 
दूसरा तुझसा कोई मिल जाए मुमकिन ही नहीं 

तू पसारे पाँव बैठा है मेरे लफ़्ज़ों में यूँ 
अब कोई आए कहाँ कोई जगह खाली नहीं 

इम्तेहां मेरा न ले इतना कि रिश्ता टूट जाए 
तू बहुत कुछ है ये माना कम मगर मैं भी नहीं 

क्या है तू और क्या नहीं जैसा है क्या वैसा है तू
बात हर पहलू से की तुझ पर मगर चिपकी नहीं 

इस तरह का लहज़ा, रंग और तेवर इस से पहले उर्दू शायरी में पढ़ा सुना नहीं गया। शमीम साहब ने अपनी खुद की ज़मीन तलाश की, वो ज़बान इस्तेमाल की जो सुनने पढ़ने वाले को अपनी लगी। उर्दू शायरी की सदियों पुरानी रिवायत को तोड़ना कोई आसान काम नहीं था लेकिन शमीम साहब ने ये काम बहुत दिलकश अंदाज़ में किया और छा गए। अपने चाहने वालों में 'दादा' के नाम से मशहूर और नौजवान शायरों के चहेते शमीम साहब की शिरकत के बिना मुंबई की कोई नशिस्त मुकम्मल नहीं मानी जाती

छाई रहती है घनी छाँव मुसलसल कहिये 
बेसमर पेड़ है इक याद का पीपल कहिये 

सर्दियाँ हों तो रज़ाई की जगह होता है 
गर्मियां हो तो उसी शख्स को मलमल कहिये 

छुइए उस को तो मरमर सा बदन होता है 
जब बरतीये तो यही लगता है दलदल कहिये 

शमीम साहब ने "रेख्ता" की साइट पर फ़रहत एहसास साहब को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि बचपन में बड़े और प्रसिद्द शायरों की शायरी पढ़ते या सुनते हुए उन्हें लगता था कि उर्दू शायरी की भाषा बहुत औपचारिक है, वो सोचते थे कि क्यों हम आम बोलचाल की भाषा में बेतकल्लुफी से जैसे हम अपने यार दोस्तों से या घर में भाई अम्मी से या बाजार में दुकानदार से या दुकानदार हम से बात करते हैं , शायरी नहीं कर सकते ?

इतने बखेड़े पाल लिए कब फुरसत मिलती है 
आज की तय दोनों में थी अब कल पर रख्खी है 

वो अपने झंझट में फंसा मैं अपने झमेले में 
वक्त न उसके पास है और न मुझको छुट्टी है 

अच्छे खासे लोगों से यह बस्ती है आबाद 
तेरे सिवा जाने क्यूँ अपनी सब से कट्टी है 

लगा तो तीर नहीं तो तुक्का सीधी सी है बात 
कोशिश वोशिश काहे की अंधे की लाठी है 

ये सोच उस वक्त बहुत क्रांतिकारी थी क्यूंकि इस तरह पहले किसी ने या तो सोचा नहीं था या फिर उसे अमल में लाने का जोखिम नहीं उठाया था हालाँकि कुछ हद तक अल्वी साहब ने ये कोशिश की जरूर लेकिन वो शमीम साहब की तरह बिंदास नहीं हो पाए .शमीम साहब ने ये ज़ोखिम उठाया और खूब उठाया जिसकी वजह से शुरू में उन्हें नकारा गया लेकिन धीरे धीरे दाद के साथ हौसला अफ़ज़ाही भी मिलने लगी और फिर तो वो खुल कर अपना जलवा दिखने लगे।

यूँ ही ये ज़िन्दगी चलती रही है
तवायफ़ भी कहीं बेवा हुई है 

किसी जानिब किसी जानिब बढूं मैं 
तुम्हारी याद रस्ता काटती है 

लगाए घात बैठी है तमन्ना 
जहाँ मौका मिले मुंह मारती है 

शमीम साहब के बड़े भाई शफ़ीक़ अब्बास साहब भी बहुत बड़े शायर हैं लेकिन उनकी शायरी की जो ज़बान है वो शमीम साहब से बिलकुल अलहदा है।"शमीम" साहब फरमाते है की जो ज़बान वो इस्तेमाल करते हैं वो उनकी माँ की ज़बान है जिसे वो अपने साथ रदौली उत्तरप्रदेश से ले आयीं और जो बरसों बरस मुंबई में रहने के बावजूद भी उनके होंठो पे रही। शमीम साहब कहते हैं कि उनकी शायरी में जो फ़िक्र आती है, ख्याल आते हैं वो उनकी ही ज़बान में जिसे वो रोजमर्रा की गुफ्तगू में इस्तेमाल करते हैं, आते हैं , उन्हें लफ्ज़ तलाशने नहीं पड़ते वो इसी ज़बान में सोचते हैं और कहते हैं।

मुद्दतों बाद रात दर्द उठा 
ज़िन्दगी तेरा कुछ पता तो चला 

तुम मदावे की शक्ल आ धमके 
मैं कुढ़न का मज़ा भी ले न सका 
मदावे : इलाज़ , कुढ़न : कष्ट , तकलीफ 

यह तो तय है कि रात था कोई 
तू नहीं था तो कौन था बतला 

आज किस मुंह से तुम को झुठलाएं 
हम को पहचानते नहीं ! अच्छा 

उर्दू में शमीम साहब की शायरी के शायद दो मज़मुए आ चुके हैं ,"बाँट लें, आ क़ायनात " शायद मेरी समझ में उनका हिंदी में पहला मज़्मुआ है जिसे "हलक फाउंडेशन ,12, इंद्रप्रस्थ, फ्लाईओवर ब्रिज अँधेरी (पूर्व) मुंबई ने शाया किया है. मुझे तो ये किताब जयपुर के बेजोड़ नामवर शायर और गीतकार जनाब लोकेश सिंह 'साहिल' साहब की मेहरबानी से पढ़ने को मिली है लेकिन आप इस किताब की प्राप्ति के लिए शमीम साहब को उनके घर 022-28113418 पर या उनके मोबाईल न 9029492884 पर संपर्क करके पूछ सकते हैं।दिल्ली में तुफैल साहब के यहाँ "लफ्ज़" के सन 2015 में हुए मुशायरे में उनसे एक बार बात हुई थी।बेहद हंसमुख दोस्ताना तबियत के मालिक शमीम साहब यकीनन किताब के बारे में आपकी जरूर मदद करेंगे।

लफ़्ज़ों चंगुल में फंस कर रह जाता है ख्याल 
बात उलझ कर रह जाती है हाय रे मज़बूरी 

तेरे कर्ब ने आनन् फानन मौसम बदला है 
हर सू पेड़ घनेरे हैं और सूरज में खुनकी 
कर्ब =निकटता , खुनकी =शीतलता 

जाने क्या है जब जब उस से नज़रें पलटी हैं 
सारे शहर की कोई गुल कर देता है बिजली 

पेपर बैक में छपी इस छोटी सी किताब में शमीम साहब की लगभग 84 ग़ज़लें और फुटकर शेर हैं। हिंदी में उनकी इन ग़ज़लों और शेरों का जिसने भी तर्जुमा किया है उसने या फिर प्रकाशक ने हिज्जों की बहुत सी गलतियां की हैं जो शमीम साहब की लाजवाब शायरी को पढ़ते वक्त अखरती हैं।हर कमी के बावजूद ये किताब हाथ में लेने के बाद किसी भी शायरी प्रेमी के लिए पूरी ख़तम किये बिना छोड़नी मुश्किल है। उनके बहुत से शेर पढ़ने वाले के दिलो दिमाग में हमेशा से बस जाने वाले हैं. आप इस किताब को मंगवाने का जतन करें तब तक मैं उनकी एक बहुत मकबूल ग़ज़ल के ये शेर पढ़वा कर अगली किताब की तलाश में निकलता हूँ.

मिल न मिल मर्ज़ी तेरी
चित तेरी पट भी तेरी 

बाँट ले आ कायनात 
तू मेरा बाकी तेरी 

उसके बिन ऐ ज़िन्दगी 
ऐसी की तैसी तेरी 

इक मेरी भी मान ले 
मैंने सब रक्खी तेरी 

मैं सभी पर खुल चुका 
बंद है मुठ्ठी तेरी

Monday, June 12, 2017

किताबों की दुनिया - 129

उर्दू के बेहतरीन शायरों की शायरी का हिंदी में लिप्यंतरण हो चुका है और हो भी रहा है। हिंदी का एक विशाल पाठक वर्ग है जो शायरी से उतनी ही मोहब्बत करता है जितनी कि उर्दू पढ़ने समझने वाले लोग। इसी सिलसिले में एक और लाजवाब शायर की किताब बाजार में आयी है ,जो बहुत पहले आ जानी चाहिए थी पर चलिए देर आये दुरुस्त आये या यूँ कहें-" देर लगी आने में तुमको शुकर है फिर भी आये तो ".... ये शायर यूँ तो जन्में हिन्दुस्तान में, जा बसे पकिस्तान में, लेकिन ऐसा कहना गलत होगा क्योंकि शायर किसी मुल्क का नहीं होता उसे सरहदों या ज़ुबानों की हद में नहीं बाँधा जा सकता, वो तो अपने उन सभी पाठकों का होता है जो दुनिया में कहीं भी बसे हों, कारण आपको इस शायर की एक ग़ज़ल के इन शेरों में मिल जायेगा :--

सारे मंज़र एक जैसे, सारी बातें एक-सी 
सारे दिन हैं एक से और सारी रातें एक-सी 

बेनतीजा बेसमर जंगो-जदल सूदो-जियाँ 
सारी जीतें एक जैसी, सारी मातें एक-सी 
बेनतीजा=परिणामहीन , बेसमर=फल रहित, जंगो-जदल=लड़ाई-झगड़ा, सूदो-जियाँ=लाभ-हानि 

अब किसी में अगले वक़्तों की वफ़ा बाक़ी नहीं 
सब कबीले एक हैं अब, सारी जातें एक-सी

एक ही रुख़ की असीरी ख़्वाब है शहरों का अब 
उनके मातम एक-से, उनकी बरातें एक-सी 
असीरी =बाध्यता ,मज़बूरी 

 "गाँव कनेक्शन " ब्लॉग पर इस शायर के बारे में जो जानकारी मिलती है वो इस तरह है "साल 1928 में पंजाब के होशियारपुर में मुहम्मद फ़तह खान के घर में एक बेटे ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया मुहम्मद मुनीर खान नियाज़ी। साल भर ही गुज़रा था कि फ़तह खान साहब का इंतकाल हो गया। ज़रा सी उम्र में वालिद के इंतकाल से मुनीर के घर के हालात बदल गए। जब मुनीर बड़ा हुआ तो उसने अपना नाम बदल लिया अब वो मुहम्मद मुनीर खान नियाज़ी नहीं, सिर्फ मुनीर नियाज़ी हो गया।
पाकिस्तान की जदीद शायरी में मुनीर नियाज़ी, फैज़ अहमद फैज़ और नूनकीम राशिद के बाद आने वाला नाम है। उनका लहजा बेहद नर्म और ख्याल मख़मल की तरह मुलायम थे। न उनकी आवाज़ में कभी तल्खी सुनी गई न उनकी शायरी में। बड़ी से बड़ी बात को बिना हंगामे के आसानी से कहने के लिए पहचाने जाने वाले मुनीर नियाज़ी की शायरी में एक नयापन है। उनकी शायरी में ज़बान की ऐसी रिवायत है कि जिसमें कई मुल्की और ग़ैरमुल्की ज़बानों की विरासत मिलती है।"

आज हम उनकी किताब "देर कर देता हूँ मैं" जिसे वाणी प्रकाशन ने "दास्ताँ कहते कहते " श्रृंखला के अंतर्गत पेपरबैक में छापा है की बात करेंगे



कल मैंने उसको देखा तो देखा नहीं गया 
मुझसे बिछुड़ के वो भी बहुत ग़म से चूर था 

शामे-फ़िराक़ आयी तो दिल डूबने लगा 
हमको भी अपने आप पे कितना गुरूर था 

निकला जो चाँद, आयी महक तेज़ सी ' मुनीर ' 
मेरे सिवा भी बाग़ में कोई जरूर था 

ज़िन्दगी के बेशुमार रंग अपनी पूरी पॉजिटिविटी के साथ जिस तरह मुनीर साहब की शायरी में दिखाई देते हैं वैसे और किसी शायर की शायरी में नहीं। हिंदी पाठकों में उनका नाम अभी तक उतना लोकप्रिय नहीं हुआ जितना कि उनके समकालीन शायरों का हुआ है इसका कारण खोजने के लिए आपको मुनीर साहब को पढ़ना पड़ेगा। आप पाएंगे कि मुनीर नियाज़ी की शायरी चौंकाती नहीं बल्कि उनकी ही तरह धीरे धीरे मद्धम ठहरे हुए लहज़े में ख़ामोशी से अपनी बात कहती है। आज के तड़क भड़क और शोरोगुल वाले माहौल में ख़ामोशी की आवाज़ को सुनने के लिए धीरज चाहिए , जो है नहीं।

तुझसे बिछुड़ कर क्या हूँ मैं, अब बाहर आ कर देख 
हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख 

दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप 
कौन है इस सुनसान गली में, पास बुला कर देख 

शायद कोई देखने वाला हो जाए हैरान 
कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख 

तू भी मुनीर अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख 
बाहर से तो देख लिया अब अंदर जा कर देख 

उनकी शायरी में कुछ खास लफ्ज़ जैसे हवा, शाम जंगल बार बार आते हैं। परवीन शाक़िर साहिबा के साथ एक गुफ़्तगू में उन्होंने बताया कि उनकी शायरी में एक नए शहर का तसव्वुर आता है एक ऐसा शहर जो इस शहर से जिसमें वो रह रहे हैं बिलकुल अलग हो जिसमें मुहब्बत की फ़िज़ां हो नफ़रत दुःख उदासी का नामों निशाँ न हो जिसकी हवाएं अलग हों गुलशन अलग हो बहारें अलग हों। ये तसव्वुर हर अच्छे इंसान का होता है और उसे पता होता है कि इसका पूरा होना मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं इसीलिए वो ताउम्र वो इसे पाने की कोशिश में लगा रहता है !

एक नगर ऐसा बस जाए जिसमें नफ़रत कहीं न हो 
आपस में धोखा करने की, ज़ुल्म की ताक़त कहीं न हो 

उसके मकीं हों और तरह के, मस्कन और तरह के हों 
उसकी हवाएं और तरह की ,गुलशन और तरह के हों 
मकीं =निवासी , मस्कन =घर 

 मुनीर नियाज़ी साहब के 11 उर्दू और 4 पंजाबी संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें ‘तेज हवा और फूल’, ‘पहली बात ही आखिरी थी’ और ‘एक दुआ जो मैं भूल गया था’ जैसे मशहूर नाम शामिल हैं. उनकी किताबें उनकी ज़िन्दगी की मुख़्तलिफ़ मंज़िलें हैं जिन्हें उन्होंने ने अपनी किताबों की शक्ल में रक़म किया है। हिंदी में शायद पहली बार वाणी प्रकाशन की ये किताब आयी है।

उस हुस्न का शेवा है जब इश्क नज़र आये 
परदे में चले जाना शर्माए हुए रहना 

इक शाम सी कर रखना काजल के करिश्मे से 
इक चाँद सा आँखों में चमकाए हुए रहना 

आदत सी बना ली है तुमने तो 'मुनीर' अपनी 
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना 

नियाज़ी साहब बंटवारे के बाद साहिवाल में बस गये थे और सन 1949 में ‘सात रंग’ नाम के मासिक का प्रकाशन शुरु किया. बाद में आप फिल्म जगत से जुड़े और अनेकों फिल्मों में मधुर गीत लिखे. आपका लिखा मशहूर गीत ‘उस बेवफा का शहर है’ फिल्म ‘शहीद ‘ के लिये स्व. नसीम बेगम ने १९६२ में गाया. बकौल शायर इफ़्तिकार आरिफ़, मुनीर साहब उन पांच उर्दू शायरों में से एक हैं, जिनका कई यूरोपियन भाषाओं में खुब अनुवाद किया गया है. उनकी ग़ज़लों को पाकिस्तान के ग़ज़ल गायकों ने अपनी आवाज़ दी है. आप में से जो ग़ुलाम अली साहब के दीवाने हैं उन्होंने उनकी दिलकश आवाज़ में मुनीर साहब की ये ग़ज़ल जरूर सुनी होगी :-

चमन में रंगे-बहार उतरा तो मैंने देखा 
नज़र से दिल का ग़ुबार उतरा तो मैंने देखा

ख़ुमारे-मय में वो चेहरा कुछ और लग रहा था 
दमे-सहर जब खुमार उतरा तो मैंने देखा 
ख़ुमारे-मय=शराब का खुमार , दमे-सहर=सुबह के वक्त 

इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझको 
मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैंने देखा

मुनीर साहब ज़िन्दगी भर शायरी के किसी कैम्प में शामिल नहीं हुए उनके अनुसार सिर्फ कमज़ोर विचारधारा और सोच के इंसान ही अपना एक ग्रुप बनाते हैं जिन्हें अपने फ़न पर ऐतबार होता है वो अकेले ही चलते हैं। बहुत धीर गंभीर तबियत के मालिक मुनीर साहब जब मंच से अपनी बेहद लोकप्रिय नज़्म "हमेशा देर कर देता हूँ मैं" -सुनाते थे तो इस छोटी सी नज़्म को सुनते वक़्त शायद ही कोई इंसान हो जिसकी आँखें नहीं भर आती थी। मेरी आपसे गुज़ारिश है कि यदि आपने इस नज़्म को उनकी ज़बानी नहीं सुना है तो एक बार यू ट्यूब पर इसे सर्च करके देखें और सुनें :-

हमेशा देर कर देता हूँ मैं 
जरूरी बात करनी हो कोई वादा निभाना हो 
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं 
मदद करनी हो उसकी, यार की ढारस बँधाना हो 
बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो 
देरीना = पुराने 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं 
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो 
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं 
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो 
हक़ीक़त और थी कुछ उसको जा के ये बताना हो 
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में i

इस किताब की भूमिका में प्रसिद्ध शायर 'शीन काफ़ निज़ाम' साहब लिखते हैं कि 'मुनीर की शायरी में बनावट और बुनावट नहीं सीधे-सीधे अहसास को अलफ़ाज़ और ज़ज़्बे को ज़बान देने का अमल है. उनकी शायरी का ग्राफ बाहर से अंदर और अंदर से अंदर की तरफ है एक ऐसी तलाश जो परेशां भी करती है और प्राप्य पर हैरान भी जो हर सच्चे और अच्छे शायर का मुकद्दर है।

इतने खामोश भी रहा न करो
ग़म जुदाई में यूँ किया न करो 

ख़्वाब होते हैं देखने के लिए 
उन में जा कर मगर रहा न करो 

कुछ न होगा गिला भी करने से 
ज़ालिमों से गिला किया न करो 

अपने रूत्बे का कुछ लिहाज़ 'मुनीर' 
यार सब को बना लिया न करो 

जनाब 'मुनीर' बरसों पाकिस्तान टीवी के लाहौर केंद्र से जुड़े रहे उन्हें 1992 में पाकिस्तान सरकार द्वारा 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस ' के खिताब से और मार्च 2005 में ‘सितार-ए-इम्तियाज’ के सम्मान से नवाज़ा गया.कौन जानता था कि मंच से गूंजती यह आवाज़ 26 दिसम्बर 2006 की रात में दिल का दौरा पड़ने से हमेशा के लिये चुप हो जायेगी. वैसे नियाज़ी साहब साँस की बीमारी से एक अर्से से परेशान थे. 

अपनी ही तेग़े-अदा से आप घायल गया 
चाँद ने पानी में देखा और पागल हो गया 

वो हवा थी शाम ही से रस्ते खाली हो गए 
वो घटा बरसी कि सारा शहर जल-थल हो गया 

मैं अकेला और सफ़र की शाम रंगों में ढली 
फिर ये मंज़र मेरी आँखों से भी ओझल हो गया 

अब कहाँ होगा वो और होगा भी तो वैसा कहाँ 
सोच कर ये बात जी कुछ और बोझल हो गया 

 "देर कर देता हूँ मैं" किताब में मुनीर साहब की लगभग 85 ग़ज़लें और 43 नज़्में संगृहीत हैं जिन्हें पढ़ कर उनकी शायरी के मैयार का अंदाज़ा होता है, उन्हें सरापा पढ़ने के लिए तो उर्दू सीखनी ही पड़ेगी क्यों की हिंदी में उनका लिखा बहुत ज्यादा उपलब्ध नहीं है।वाणी प्रकाशन ने किताब को ख़ूबसूरती से छापा है लेकिन आवरण के साइड में "मुनीर नियाज़ी" की जगह "मुनीर जियाज़ी" छाप देने की गलती अखरती है। आप इस किताब को वाणी प्रकाशन को sales@vaniprakashan.in पर मेल लिख कर या फिर अमेज़न से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं। चलते चलते उनकी ग़ज़ल के ये शेर पढ़ें, सोचें कि ये शेर किसी उर्दू शायर के हैं या हिंदी शायर के और फिर हिंदी /उर्दू ग़ज़ल की दीवार को हमेशा के लिए गिरा दें :

घुप अँधेरे में छिपे सूने बनों की ओर से 
गीत बरखा के सुनो रंगों में डूबे मोर से 

लाख पलकों को झुकाओ, लाख घूंघट में छुपो 
सामना हो कर रहेगा दिल के मोहन चोर से 

भाग कर जाएँ कहाँ इस देस से अब ऐ 'मुनीर' 
दिल बँधा है प्रेम की सुन्दर, सजीली डोर से

Monday, June 5, 2017

किताबों की दुनिया - 128/2

जॉन एलिया साहब से एक बार जब किसी ने पूछा कि आप इतने बरसों से शायरी कर रहे हैं लेकिन आपका कोई मज्मूआ अब तक शाया क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने फ़रमाया :- “अपनी शायरी का जितना मुंकिर* मैं हूं, उतना मुंकिर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी न होगा. कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी. बुरी, बेतुकी, लगती है इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा. उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं.’ *मुंकिर: खारिज करने वाला”
जॉन साहब की ये बुरी और बेतुकी शायरी शाया होने के बाद किस क़दर हंगामा बरपा देगी अगर इस का जरा सा भी गुमाँ उन्हें होता तो शायद उनकी सभी किताबें उनके जीते जी ही शाया हो गयी होतीं।

रूठा था तुझसे यानी ख़ुद अपनी ख़ुशी से मैं 
फिर उसके बाद जान न रूठा किसी से मैं 

बाँहों से मेरी वो अभी रुखसत नहीं हुआ 
पर गुम हूँ इंतेज़ार में उसके अभी से मैं 

दम भर तिरी हवस से नहीं है मुझे क़रार 
हलकान हो गया हूँ तेरी दिल-कशी से मैं 

इस तौर से हुआ था जुदा अपनी जान से 
जैसे भुला सकूंगा उसे आज ही से मैं 

जरा सोचिये ऐसे लाजवाब अशआर बिना पाठकों तक पहुंचे रद्दी के भाव बाज़ार में बिक गए होते अगर ख़ालिद अहमद अन्सारी साहब उन्हें सहेज कर किताबों की शक्ल नहीं देते। सुना है की उनके अशआर लोगों ने चुराने शुरू कर दिए थे बहुत मुमकिन है कि उनकी शायरी का अहम् तो नहीं पर थोड़ा बहुत हिस्सा ऐसे उठाईगिरों की कैद में अब भी पड़ा हो।

जीत के मुझको खुश मत होना, मैं तो इक पछतावा हूँ 
खोऊँगा, कुढ़ता ही रहूँगा , पाऊंगा , पछताऊंगा 

एह्दे-रफ़ाक़त ठीक है लेकिन मुझको ऐसा लगता है 
तुम तो मेरे साथ रहोगी , मैं तनहा रह जाऊँगा 
एह्दे-रफ़ाक़त =दोस्ती का वादा 

शाम को अक्सर बैठे बैठे, दिल कुछ डूबने लगता है 
तुम मुझको इतना मत चाहो , मैं शायद मर जाऊँगा 

एनीबुक प्रकाशन ने जॉन साहब का 'गुमान ' के बाद एक साल के अंदर ही दूसरा शेरी मज़्मूआ 'लेंकिन' जिस की बात हम अभी कर रहे हैं को जिस सादगी और ख़ूबसूरती से शाया किया है उसकी जितनी तारीफ़ की जाय कम होगी। एक नए प्रकाशक के लिए एक शायरी की किताब छापना वो भी जॉन एलिया जैसे की ,बहुत बड़ी बात है। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशक भी ये काम नहीं कर पाए जो इस नए प्रकाशक ने कर दिखाया है।


अभी इक शोर सा उठा है कहीं 
कोई खामोश हो गया है कहीं 

तुझको क्या हो गया कि चीजों को 
कहीं रखता है ढूंढता है कहीं 

तू मुझे ढूंढ मैं तुझे ढूंढूं 
कोई हम में से रह गया है कहीं 

इसी कमरे से कोई हो के विदाअ 
इसी कमरे में छुप गया है कहीं

'गुमान' या 'लेकिन' पढ़ते वक्त इस बात का एहसास होता है कि जॉन साहब का अपनी बात को कहने का सबसे जुदा अपना एक अलग अंदाज़ था ,उनकी शायरी चौंकाने वाली और एक दम नयी थी। कहना होगा कि वो ओरिजिनल शायर थे जिन्होंने किसी और की बनाई राह पर चलने से गुरेज किया और अपनी ज़मीने ईज़ाद कीं। आज तो बहुत से शायर उनकी नक़ल करते हुए मिल जायेंगे लेकिन उस वक्त ऐसी शायरी करने वाला उनके अलावा कोई दूसरा नहीं था जो मंज़र से ज्यादा पसमंज़र पर निगाहें रखते हुए शायरी करे।उनकी शायरी की जुबान भी बिलकुल अलग थी।

इक तरफ दिल है इक तरफ दुनिया 
ये कहानी बहुत पुरानी है 

क्या बताऊँ मैं अपना पासे -अना 
मैंने हंस हंस के हार मानी है 
पासे -अना =स्वाभिमान की रक्षा 

रोजमर्रा है ज़िन्दगी का अजीब 
रात है और नींद आनी है 

ज़िन्दगी किस तरह गुज़ारूं मैं 
मुझको रोज़ी नहीं कमानी है 

आज सोशल मिडिया पर उनके मुशायरे के ढेरों विडिओ रोज दिखाई देते हैं , लोग उनकी अनोखी अदाओं लम्बी जुल्फों, बात चीत के अंदाज़ की चर्चा तो करते नज़र आते हैं लेकिन उनकी शायरी की जितनी होनी चाहिए उतनी चर्चा नहीं हो रही जो कि होनी चाहिए.. वो अकेले ऐसे शायर हैं जिसे किसी ढांचे में फिट नहीं किया जा सकता। वो जिस बात को कबूल कर रहे हैं उसे ही तुरंत नकारते भी नज़र आजायेंगे बशर्ते की कोई बात उनकी पहले से कबूल की गयी बात से बेहतर हो। जॉन साहब की शायरी प्याज की परतों की तरह है जिसे अभी पूरी तरह से खोला नहीं गया है।

मुझे याँ किसी पे भरोसा नहीं 
मैं अपनी निगाहों से छुप कर छुपा 

पहुँच मुख़बिरों की सुख़न तक कहाँ 
सो मैं अपने होटों पे अक्सर छुपा 

मिरि सुन ! न रख अपने पहलु में दिल 
इसे तू किसी और के घर छुपा 

यहाँ तेरे अंदर नहीं मेरी खैर 
मिरि जां ! मुझे मेरे अंदर छुपा 

'लेक़िन' में शाया हुई ग़ज़लों में से कौनसे शेर चुनूं कौनसे छोडूं की उधेड़बुन में बहुत दिन लगा रहा आखिर हुआ ये कि अचानक पलटते हुए जिस पन्ने पर ऊँगली रखी उसी पर छपी ग़ज़ल से कुछ शेर उठा लिए और आपको पेश कर दिए - आखिर खज़ाना भी कहीं चुना जाता है ? जहाँ हाथ डालेंगे खरे सोने की खनखनाती अशर्फियाँ ही हाथ आएँगी , यकीन न हो तो अमेज़न से ऑन लाइन या फिर एनीबुक से 'लेकिन' मंगवाएं -जिसका पता मैंने अपनी पिछली पोस्ट में आपको दिया ही था - और खुद देख लें।

बोल रे जी अब साजन जी का मुखड़ा है किस दर्पण का 
मैं जो टूटा , मैं जो बिखरा , मैं था दर्पण साजन का

मुझको मेरे सारे खिलौने लाके दो मैं क्या जानूँ 
कैसी जवानी, किसकी जवानी , मैं हूँ अपने बचपन का 

उस जोगन के रूप हज़ारों , उनमें से एक रूप है तू 
जब से मैंने जोग लिया है जोगी हूँ उस जोगन का

'गुमान ' और 'लेकिन ' के बाद बात करते हैं उनकी तीसरी किताब की जो हाल में ही में " मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ" शीर्षक से प्रकाशित हुई है । वाणी प्रकाशन की इस पेपरबैक किताब में डा कुमार विश्वास ने जॉन साहब की कुछ चर्चित अधिकतर छोटी बहर की ग़ज़लों को संकलित किया है। जॉन साहब की शायरी को पूरी तरह तो नहीं लेकिन आंशिक रूप में जानने के लिहाज़ से इस किताब को पढ़ा जा सकता है।



तो क्या सचमुच जुदाई मुझसे कर ली 
तो खुद अपने को आधा कर लिया क्या 

बहुत नज़दीक आती जा रही हो 
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या 

वाणी प्रकाशन की ये किताब आपकी जॉन एलिया को पढ़ने की प्यास भड़का जरूर सकती है लेकिन बुझा नहीं सकती। कुमार साहब ने जॉन साहब की लगभग 140 ग़ज़लें इसमें संकलित की हैं जो पढ़ने वाले को अपने साथ बहा ले जाती हैं , उन्होंने ध्यान रखा है कि जॉन साहब के अपेक्षाकृत सरल अशआर हिंदी पाठकों को परोसे जाएँ

जो गुज़ारी न जा सकी हम से 
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है 

बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी
क्या मिरि नींद भी तुम्हारी है 

आप में कैसे आऊं मैं तुझ बिन 
सांस जो चल रही है,आरी है 

 जॉन साहब दरअसल एक ऐसी दुनिया का खवाब देखते रहे जहाँ धर्म की दीवारें न हों भाईचारा हो अमन चैन हो ईमानदारी हो सच्चाई हो और जब ऐसी दुनिया उन्हें नहीं मिली तो वे टूट गए खुद को शराब में डुबो कर बर्बादी की कगार पर ले आये और इस दुनिया ऐ फानी से रुखसत हो गए। उनकी शायरी में उदासी झल्लाहट गुस्सा साफ़ देखा जा सकता है।अपनी बात कहने में वो किसी से कभी नहीं डरे और जो कहा किसी परवाह के बिंदास कहा

धरम की बांसुरी से राग निकले 
वो सूराखों से काले नाग निकले 

खुदा से ले लिया जन्नत का वादा 
ये जाहिद तो बड़े ही घाघ निकले 

है आखिर आदमियत भी कोई शै 
तिरे दरबान तो बुलडाग निकले 

कुमार विश्वास किताब की भूमिका में लिखते हैं कि " बिरला होने के लिए आपमें शब्दों को निभाने की न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए , एक स्वाभिमान चाहिए , एक खुदरंग तबियत चाहिए और इस बात की सलाहियत चाहिए कि अपनी शायरी को आम आदमी से कैसे स्वीकार करवाना है। यही जॉन हैं। जॉन बिरले हैं। " बिरले ही हैं तभी तो ऐसे बिरले शेर कहें हैं उन्होंने

सोचता हूँ कि उसकी याद आखिर 
अब किसे रात भर जगाती है 

क्या सितम है कि अब तिरि सूरत 
ग़ौर करने पे याद आती है 

कौन इस घर की देखभाल करे 
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है 

हज़ारों शेर हैं जॉन साहब के जो लोगों के दिल में धड़कते हैं किस किस शेर की बात की जाय मेरी इस पोस्ट की एक सीमा है और जॉन साहब के शेरों की कोई सीमा नहीं एक कोट करो तो लगता है अरे इसे तो जरूर पढ़वाना चाहिए था क्या करें ? आप ऐसा करें इस किताब को वाणी प्रकाशन या फिर अमेज़न से ऑन लाइन मंगवा ही लें ,मेरे भरोसे जॉन साहब को पढ़ना ठीक नहीं। आपसे विदा लेने से पहले उनका एक शेर पढ़वाता चलता हूँ जो मुझे बहुत पसंद है , शायद आपको भी पसंद आये , अपनी तरह का अकेला बिरला लाजवाब बेमिसाल सच्चा शेर
 :-
कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल जू हूँ मैं 
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे 
 जू :सुन्दर